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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 744, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 744

अशीतितमोऽध्यायः ७२५ विद्याप्रदश्च सृष्ट्यंतो वर्णिनां शुद्धचेतसाम् । स्थित्यंतः स्याद्गृहस्थानामेवं काम्यादिरूपतः ॥२२१॥ संहारान्तो मुनींद्राणां विरक्तानां च सर्वशः । पुनः स्थितिक्रमेणार्णान्मनोरंगुलिषु न्यसेत् ॥२२२॥ पुनश्चक्रैश्च पूर्वोक्तैः पंचांगं करयोर्न्यसेत् । ततो मूलेन पुटितान्मातृकार्णान्सबिंदुकान् ॥२२३॥ विन्यसेन्मातृकान्यासस्थानेषु प्रणतः सुधीः । ततस्तारपुटं मूलं व्यापकत्वेन विन्यसेत् ॥२२४॥ संहारसृष्टिभेदेन दशत्तत्वानि विन्यसेत् । नमोंतमूलमंत्राणंपदायाम्यानि चात्मने ॥२२५॥ मत्यंतानि च तत्त्वानि पृथिव्याद्यानि च क्रमात् । पृथ्वी जलं तथा वह्निर्वायुराकाशमेव च ॥२२६॥ अहंकारो महत्तत्त्वं प्रकृतिं पुरुषं परम् । प्रविन्स्येन्मस्तके च नेत्रयोः श्रोत्रयोर्नसोः ॥२२७॥ वदने हृदये नाभौ लिंगे जान्वोश्च पादयोः । प्रणवांतरितान्वर्णान्हृदंतान्विन्यसेन्मतोः ॥२२८॥ सृष्टिन्‍यासोऽयमाख्यातः स्थितिन्‍यासं शृणु द्विज । हृदि नाभौ ध्वजे जान्वोः पाद्योर्मस्तके पुनः ॥२२८ 1/2॥ नेत्रयोः कर्णयोर्घ्राणे वदने विन्यसेत्क्रमात् । पदोर्जान्वोलिंगदेशे नाभौ हृदि मुखे नसोः ॥२३०॥ कर्णयोर्नेत्रयोर्मूर्ध्नि संहाराख्योऽयमीरितः । सृष्ट्यंतो वर्णिनां न्यासः स्थित्यंतो गृहमेधिनाम् ॥२३१॥ यतेर्वैराग्ययुक्तस्य संहारान्तः प्रकीर्तितः । चतुर्द्धा वर्णिनां चैव गृहस्थानां च पंचधाः ॥२३२॥ यतीनां च त्रिधा न्यासः प्रोक्तोऽयं क्रमशः शुभः । केचिद्विरक्ते गृहगे संहारान्तं विदुबुधाः ॥२३३॥ विभूतिपंजरं न्यासं कुर्यादिष्टप्तये ततः । मनोर्दशावृत्तिमयं कृष्णसांनिध्यकारकम् ॥२३४॥ आधारे च ध्वजे नाभौ हृदि कंठे मुखे शये । ऊर्ध्वांच कंधरायां च नाभौ कुक्षौ तथा हृदि ॥२३५॥ करे। संहारन्यास में वामांगुष्ठ से लेकर दक्षिणांगुष्ठ तक उक्त मन्त्राक्षरों का न्यास करे। क्योंकि संहारन्यास दोषसमूह का नाश करने वाला है। शुद्ध चित्त वाले संन्यासियों के लिये उक्त न्यासद्वय के साथ सृष्टि न्यास विद्या को देने वाला है। अन्त में किया जाने वाला स्थितिन्यास गृहस्थों की कामनाओं को सफल करता है। अन्त में किया जाने वाला संहारन्यास मुनीन्द्रों और विरक्तों के लिये लाभदायक है। तदनन्तर साधक पुनः स्थितिन्यासक्रम से मंत्राक्षरों को अंगुलियों में न्यस्त करे। तदनन्तर पूर्वोक्त चक्रों से हाथों में पंचाङ्ग- न्यास करे। पश्चात् मूलमन्त्र से संपुटित तथा सबिंदुक मातृकाक्षरों का मातृकान्यासस्थानों में प्रणामपूर्वक न्यास करे। पश्चात् प्रणव संपुटित मूलमन्त्र का उच्चारण करके व्यापकन्यास करे। संहार और सृष्टि के भेद से दस तत्त्वों का विन्यास करे। मस्तक, नेत्रों, कर्णों, नासिकापुटों, मुख, हृदय, नाभि, लिंग, जानुओं तथा चरणों में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व, प्रकृति तथा पुरुष का न्यास कर मन्त्र के हृदंत अक्षरों को प्रणवान्तरित करके न्यस्त करना चाहिये। यह सृष्टिन्यास कहलाता है। अब स्थितिन्यास सुनो ॥२१९-२२८ 1/2॥ हृदय, नाभि, लिंग, जानुओं, चरणों, मस्तक, नेत्रों, कर्णों, नासिका तथा मुख में क्रमशः न्यास करने का नाम सृष्टि न्यास है। चरणों, जानुओं, लिंग, नाभि, हृदय, मुख, नासिका, कर्णों, नेत्रों तथा मस्तक में न्यास करने का नाम संहारन्यास है। संन्यासियों के लिये सृष्टिन्यास, गृहस्थों के लिये स्थितिन्यास और वैराग्ययुक्त यतियों के लिये संहारन्यास करना चाहिये। सन्यासियों को चार प्रकार के, गृहस्थों को पांच प्रकार के और यतियों को तीन प्रकार के न्यास क्रमशः करने चाहिये। कोई कहते हैं कि जो घर छोड़कर विरक्त हो गये हैं, उनके लिये संहारन्यास ही ठीक है। ॥२२९-२३३॥ इष्ट प्राप्ति के लिये विभूतिपंजरन्यास करना चाहिये। यह न्यास मन को सुस्थिर करने वाला तथा कृष्णसान्निध्यमोक्ष को देने वाला है। मूलाधार, लिंग, नाभि, हृदय, कंठ, मुख, स्कंधों, ऊरुओं, नाभि, कुक्षि, स्तनों, पार्श्वों, श्रोणियों, मस्तक, नेत्रों, कर्णों, नासापुटों, कपोलों, दक्षिण भुजा के मूल तथा अंगुलियों में न्यास कर शिर, पूर्व आदि दिशाओं, अपनी कलाओं, भुजाओं, सबन्धियों, शिर,