सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 745, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 745

७२६ नारदीयपुराणम् स्तनयोः पार्श्वयोः श्रोण्योर्मस्तके वदने तथा । नेत्रयोः कर्णयोर्नासापुटयोश्च कपोलयोः ॥२३६॥ एवं दक्षिणदोर्मूलसंध्यग्रेष्वंगुलीषु च । ततः शिरसि तत्पूर्वाद्याशासु स्वकलासु च ॥२३७॥ दोष्णोः सक्थ्नोः शिरोश्वास्यकंठहृज्जठरेषु च । मूलाधारे लिंगदेशे जानुनोः पादयोस्तथा ॥२३८॥ श्रोत्रगंडांसवक्षोजपार्श्वलिंगेषु विन्यसेत् । ऊर्वोर्जान्वोर्जंघयोश्च पादयोर्विन्यसेत्क्रमात् ॥२३९॥ विभूतिपंजराख्योऽयं न्यासः सर्वार्थसिद्धिदः । अनेन न्यासवर्येण साक्षात्कृष्णतनुर्भवेत् ॥२४०॥ मूर्तिपंजरनामानं न्यासं पूर्वोदितं न्यसेत् । ततो दशांगपंचांगौ न्यासवर्यौ न्यसे क्रमात् ॥२४१॥ हृदि मूर्ध्नि शिखायां च सर्वांगे दिक्षु पार्श्वयोः । कट्यां पृष्ठे तथा मूर्ध्नि विन्यसेद्वैष्णवोत्तमः ॥२४२॥ पंचांगानि न्यसेद्भूयश्चक्रैः प्राग्वत्समाहितः । अन्योऽप्यष्टादशार्णोक्तः कर्तव्यो न्याससंचयः ॥२४३॥ ततः किरीटमंत्रेण व्यापकं रचयेत्सुधीः । वेणुबिल्वादिमुद्रांश्च दर्शयेत्साधकोत्तमः ॥२४४॥ सुदर्शनस्य मंत्रेण कुर्याद्दिग्बंधनं ततः । अनंगुष्ठाश्च ऋजवः करशाखा भवंति चेत् ॥२४५॥ हृन्मुद्रेयं समाख्याता शिरोमुद्रा तथा भवेत् । अधोगुष्ठा तु या मुष्टिः शिखामुद्रेयमीरिता । प्रसारितांगुल्योवर्ममुद्रेयमीरिता ॥२४६॥ नाराचमुष्ट्या धृतबाहुयुग्मकांगुष्ठतर्जन्यदितो ध्वनिस्तु । विश्वग्विमुक्ता कथितास्त्रमुद्रा यत्राक्षिणी तर्जनीमध्यमे च ॥२४७॥ ओष्ठे वामकरांगुष्ठो लग्नस्तस्य कनिष्ठिका । दक्षिणांगुष्ठसंसक्ता तत्कनिष्ठा प्रसारिता ॥२४८॥


नेत्रों, मुख, कंठ, हृदय, उदर, मूलाधार, लिंग, जानुओं, चरणों, कर्णों, कपोलों, स्तनों, पाश्वों तथा लिंग में न्यास करे । पुनः ऊरुओं, जानुओं, जंघाओं तथा चरणों में क्रमशः न्यास करना चाहिये । इसीका नाम विभूतिपंजर- न्यास है । यह सकल कामनाओं को पूर्ण करता है । इस उत्तम न्यास के करने से साक्षात् कृष्ण-शरीर की प्राप्ति होती है । इसके कर लेने के बाद न्यासों में श्रेष्ठ दशांग तथा पंचांग-न्यास क्रमशः करना चाहिए ॥२३४-२४१॥ उत्तम विष्णुभक्त हृदय, मस्तक, शिखा, समस्त अङ्गों, दिशाओं, पाश्वों, कटि, पृष्ठ तथा शिखर— इन अङ्गों में एक-एक अक्षर का न्यास करे । फिर एकाग्रचित्त हो पूर्वोक्त चक्रों द्वारा पुनः पूर्ववत् पंचांगन्यास करे । अष्टादशाक्षर मन्त्र के अनुसार अन्य-अन्य न्यास भी करने चाहिये । तदनन्तर किरीटमन्त्र से व्यापकन्यास कर वेणु, बिल्व आदि मुद्रायें दिखलाये । पश्चात् सुदर्शनमन्त्र से दिग्बन्ध करे । अंगुष्ठों को छोड़कर अन्य अंगुलियों को सीधी करने का नाम हृदयमुद्रा है । शिरोमुद्रा भी इसी तरह बनाई जाती है । अंगुष्ठ को नीचे करके मुट्ठी बाँधने का नाम शिखामुद्रा है । करांगुलियों को फैला देने का नाम वर्ममुद्रा है ॥२४२-२४६॥ बाण की मुट्ठी तरह उठी हुई दोनों भुजाओं के अंगुष्ठ ओर तर्जनी से चुटकी बजाकर उसकी ध्वनि को सब ओर फैलाना, इसे अस्त्र मुद्रा कहा गया है । तर्जनी और मध्यमा-ये दो अंगुलियां नेत्र मुद्रा हैं । जहाँ तीन नेत्र का न्यास करना हो, वहाँ तर्जनी, मध्यमा के साथ अनामिका अंगुलि को भी लेकर नेत्रत्रय का प्रदर्शन कराया जाता है । बाँयें हाथ का अंगूठा ओष्ठ में लगा हो । उसकी कनिष्ठिका अंगुलि दाहिने हाथ के अंगूठे से सटी हो, दाहिने हाथ की कनिष्ठिका फैली हुई हो और उसकी तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियां कुछ सिकोड़- कर हिलाई जाती हों तो यह वेणुमुद्रा कही गई है । यह अत्यन्त गुप्त होने के साथ ही भगवान् श्रीकृष्ण को बहुत प्रिय है । वनमाला, श्रीवत्स और कौस्तुभ नामक मुद्रायें प्रसिद्ध हैं । अतः उनका वर्णन नहीं किया जाता है। बाँये अंगूठे को ऊर्ध्वमुख खड़ा करके उसे दाहिने हाथ के अंगूठे से बाँध ले और उसके अग्रभाग को दाहिने

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 745, कुल 1008 में से · BharatKosha