बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअशीतितमोऽध्यायः ७२७ तर्जनी मध्यमानामा किञ्चित्संकुच्य चालिता। वेणुमुद्रेयमुदिता सुगुप्ता प्रेयसी हरेः । नोच्यंते तत्र सिद्धत्वान्मालाश्रीवत्सकौस्तुभाः ॥२४६॥ वामांगुष्ठं सनुद्रं तमपरकरांगुष्ठकेनाथ बद्ध्वा संपीड्याग्रं च दक्षांगुलिभिरपि च तां वामहस्तांगुलीभिः । गाढं बद्ध्वा स्वकीये हृदयसरसिजे स्थापयेत्कामबीजं प्रोच्चार्यैषा तु गोप्या सकलसुखकरी बिल्वमुद्रा मुनींद्रैः ॥२५०॥ कायेन मनसा वाचा यत्पापं समुपाजितम् । मुद्रया ज्ञानमात्रेण सर्वं नाशमुपैष्यति ॥२५१॥ ध्यानं जपस्त्रिकालाद्यौ कार्या पूर्वोदिता मनोः । सर्वेष्वेकः क्रमः प्रोक्तो दशाष्टाष्टादशार्णयोः ॥२५२॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्री प्रयोगान्कर्तुमर्हति । उद्द्बाहुदोर्दंडधृतगोवर्द्धनाचलम् ॥२५३॥ अन्यहस्तांगुलीव्यक्तस्वरवं शार्पिताननम् । ध्यायन्कृष्णं जपेन्मंत्रं व्रजेच्छत्रं विना सुधीः ॥२५४॥ वर्षवाताशनिभ्योऽपि भयं तस्य न जायते । मोघमेघौघवाताद्गतेन्द्रं तं स्मरन्हुनेत् ॥२५५॥ लोणेरयुतसंख्यैः स्यादानावृष्टिर्न संशयः । क्रीडंतमर्कजातीरे मज्जनस्नापनादिभिः ॥२५६॥ तच्छीकरजलासारैः सिच्यमानं प्रियाजनैः । ध्यात्वायुतं पयः सिक्तैहुनेद्वा नीरतर्पणैः ॥२५७॥ वृष्टिर्भवत्यकालेऽपि महती नात्र संशयः । सबाहमोहैरातंस्य विस्फोटकज्वरादिभिः ॥२५८॥ अमुमेव स्मरन्मूर्ध्नि जपेच्छांतिर्भवेत्क्षणात् । अथवा गरुडारूढं प्रद्युम्नबलसंयुतम् ॥२५६॥ निजज्वरनिष्पिष्टज्वराभिष्टुतमच्युतम् । ध्यात्वा मूर्ध्नि जपेन्मंत्रं ज्वरमुक्तो भवेज्ज्वरी ॥२६०॥ हाथ की अंगुलियों से दबाकर फिर उन अंगुलियों बाँये हाथ की अंगुलियों से खूब कस कर बांध ले और उसे अपने हृदय कमल में स्थापित करे। साथ ही कामबीज (क्लीं) का उच्चारण करता रहे। इसको मुनीन्द्रों ने बिल्वमुद्रा कहा है ॥२४७-२५०॥ यह सब को सुख देनेवाली तथा गोपनीय है। शरीर, मन, एवम् वाणी से जो पाप किया गया हो, वह सब इस मुद्रा के ज्ञानमात्र से नष्ट हो जायगा। ध्यान, जप तथा त्रिकालपूजन ये तीनों चीजें मंत्राराधन में की जाती हैं। मन्त्र चाहे दशाक्षर हो या अष्टादशाक्षर, सब में एक ही क्रम चलता है। मंत्र को भलीभांति सिद्ध कर लेने पर साधक उसका प्रयोग करे । जो श्रीकृष्ण अपनी भुजारूपी दंड पर गोवर्धन पर्वत को धारण कर एक हाथ की अंगुलियों से स्वर मिलाते हुए वंशी को मुंह से बजाते रहे, उनका ध्यान कर पूर्वोक्त मन्त्र का जप करे । जो विद्वान् ऐसा करते हैं, वे यदि बिना छत्र के भी चलें तो वर्षा, वायु एवम् वज्र उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते । मेघों एवम् पवनों समेत इन्द्र के कर्तव्य को व्यर्थ कर देने वाले कृष्ण ध्यान कर यदि दश हजार कोणों (क्षुद्र आंवला या लोनी साग ) से हवन किया जाय तो निःसन्देह वर्षा नहीं होगी ॥२५१-२५५३॥ यमुना तट पर स्नान, मज्जन आदि विविध प्रकार के क्रीडा करते हुए और प्रियाओं द्वारा जल के फुहारों से सिक्त किये जानेवाले कृष्ण का ध्यान कर दश हजार जलसिक्त लोणों से हवन या जलतर्पण किया जाय तो असमय में भी वृष्टि हो जायगी । इसमें संशय नहीं। जिसके शरीर में जलन होती है या जो विस्फोट क ज्वर आदि से पीडित है, उसके मस्तक पर यदि उक्त मन्त्र का जप कर दिया जाय तो तत्क्षण शांति हो जायगी ॥२५६-२५८३॥ कृष्ण गरुड पर आरूढ हैं, प्रद्युम्न तथा बलराम उनके साथ हैं, उनके ज्वर द्वारा पीड़ित हो (शंकर का) ज्वर उनकी स्तुति कर रहे हैं- ऐसा ध्यान कर ज्वरी के मस्तक पर उक्त मन्त्र का जप करने से ज्वर उतर जाता है। ऐसे ही रूप का ध्यान