बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७२८ नारदीयपुराणम् ध्यात्वैवमग्नावभ्यर्च्य यथोक्तैश्चतुरंगुलैः । जुहुयादमृताखण्डैरयुतं ज्वरशांतये ॥२५९॥ शिलीमुखविनिर्मिन्नभीष्मतापहरं हरिम् । ध्यात्वा जपेत्स्पृशन्नार्तं पाणिभ्यां ज्वरशांतये ॥२६०॥ सांदीपनाय दत्तं पुत्रं ध्यात्वायुतं हुनेत् । यथोक्तैरमृताखंडैरपमृत्युर्निवृत्तये ॥२६१॥ सपार्थं मृतपुत्रायार्पयंतं च द्विजन्मने । सुतं ध्यात्वा जपेल्लक्षं पुत्रपौत्रादिवृद्धये ॥२६४॥ पुत्रजीवफलैर्हुत्वायुतं मधुरसप्लुतैः । तत्काष्ठैरेधिते वह्नौ सुतान्दीर्घायुषो लभेत् ॥२६५॥ क्षीरद्रुक्वथसंपूर्णमभ्यर्च्य कलशं निशि । प्रातर्जप्त्वायुतं नारीमभिषिंचेद्द्विषड्दिनम् ॥२६६॥ एवं कृते तु वंध्यापि लभेत्पुत्रांश्चिरायुषः । प्रातर्वर्चायमाश्र्वत्थदलसंंपुटकं जलम् ॥२६७॥ अष्टोत्तरशतं जप्तं मासं पुत्रार्थिनी पिबेत् । सर्वलक्षणसंपन्नं वंध्यापि लभते सुतम् ॥२६८॥ जित्वा कृत्यां काशिराजप्रेषितां च निजारिणः । तेजसा तस्य नगरं दहंतं भावयन्हरिम् ॥२६९॥ हुनेत्सप्तदिनं मंत्री सुस्नेहाक्तैश्च सर्षपैः । कृत्याकर्तारमेवास्मै कुपिता नाशयेद्ध्रुवम् ॥२७०॥ बदरीद्रुमसंकीर्णे स्थितं दिव्याश्रमे शुभे । स्पृशंतं करपद्माभ्यां घंटाकर्णकलेवरम् ॥२७१॥ ध्यात्वैवं जुहुयाल्लक्षं तिलैस्त्रिमधुराप्लुतैः । महापापयुतोऽप्येवं पूतो भवति तत्क्षणात् ॥२७२॥ द्यूतासक्तौ रुक्मबलौ द्वेषयंतं हरिं स्मरन् । जुहुयाद्विष्टयोर्द्विष्टय गुलिका गोमयोद्भवाः ॥२७३॥ नित्यं सहस्रं सप्ताहान्मिथ्यो विद्वेषयेदरीन् । वर्षंतं गरुडारूढं ज्वलदग्निमुखैः शरैः ॥२७४॥ धावंतं रिपुसंघातमनुधावतमच्युतम् । ध्यात्वा सप्तसहस्रं तु जपेन्मंत्रमनन्यधीः ॥२७५॥ कर कृष्ण पूजन करके अग्नि में चार अंगुलि प्रमाण बहेड़े की लकड़ियों से हवन करने से ज्वर शांत हो जाता है, बाणों से विद्ध शरीरवाले भीष्म के ताप को हरनेवाले कृष्ण का ध्यान कर मन्त्र जप करते हुए हाथो से ज्वरी का स्पर्श करने से ज्वर छूट जाता है ॥२५९-२६२॥ सांदीपन मुनि को पुत्र देते हुए हरि का ध्यान कर बहेड़े की समिधाओं से दश हजार होमने से अपमृत्यु का निवारण होता है, मृतपुत्र ब्राह्मण को पुत्र समर्पित करते हुए अर्जुन सहित कृष्ण का ध्यान कर एक लाख मंत्र का जप करने से पुत्र-पौत्र आदि की वृद्धि होती है । मधु- मिश्रित पुत्रजीव (जियापुता) के फलों से उसी की समिधा से प्रज्वलित अग्नि में दश हजार होम करने से दीर्घायु पुत्र उत्पन्न होते हैं । रात्रि में गूलर के काढ़े से कलश को भर कर रख छोड़े । प्रातःकाल उसे दस हजार मन्त्र से अभिमन्त्रित कर स्त्री को सींचे बारह दिनों तक ऐसा करने से वंध्या भी दीर्घायु पुत्रों को उत्पन्न करती है । जो नारी पुत्र चाहती हो, वह प्रातःकाल मौन होकर पीपल के पत्तों के बने दोने में जल भर कर एक सौ आठ बार कृष्णमन्त्र से अभिमंत्रित करके पान करे । ऐसा करने से वंध्या के भी सर्वलक्षण संपन्न पुत्र उत्पन्न होता है २६३- २६८॥ काशिराज (पौंडू) द्वारा भेजी हुई कृत्या को जीत कर अपने तेज से शत्रु की नगरी को जलाने वाले हरि का ध्यान कर सात दिन स्नेहाक्त सरसों से हवन करने से कृत्या कुपित हो कर प्रयोग करने वाले को ही अर्थात् शत्रु को निश्चय मार देती है । बेर के वृक्षों से व्याप्त पवित्र दिव्याश्रम में अपने करकमलों से घंटाकर्ण के शरीर का स्पर्श करते हुए हरि का ध्यान कर त्रिमधुयुक्त तिलों से एक लाख हवन करने वाला महापापी भी तत्क्षण पवित्र हो जाता है । द्यूतक्रीड़ा करने में आसक्त रुक्मी तथा बल से द्वेष करते हुए हरि का स्मरण कर गोबर की बनी गुलियों से नित्य एक हजार हवन करना चाहिये । सात दिनों तक ऐसा करने से शत्रुओं में पर- स्पर फूट हो जाती है ॥२६९-२७३॥ गरुड़ पर चढ़ कर आग की ज्वाला उगलनेवाले बाणों की वर्षा करते हुए तथा भागने वाले शत्रुओं का पीछा करते हुए हरि का ध्यान कर उन्हीं में चित्त को लगाते हुए सात हजार मंत्र का