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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 748, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 748

अशीतितमोऽध्यायः ७२६ उच्चाटनं भवत्येव शत्रूणां सप्तभिर्दिनैः । ध्यायन्नुत्क्षिप्तवत्सं तु कपित्थफलहारिणम् ॥२७६॥ प्रजपेदयुतं शत्रुमुच्चाटयति तत्क्षणात् । आत्मानं कंसमथनं ध्यायन्मंचान्निपातितम् ॥२७७॥ कंसात्मानं व्यकर्षन्तं गतासुं तं जपेन्मनुम । रिपुजन्मर्क्षवृक्षोत्थसमिद्भिर्मरयुतं निशि ॥२७८॥ जुहुयादेवमुग्रोऽपि सपत्नो निधनं व्रजेत् । अथवा निबंतैलाक्तैहुनेवेधोभिरक्षजैः ॥२७९॥ अयुतं नियतो रात्रौ मारयेदचिराद्वरीन् । निशाविष्टदलव्योषकार्पासास्थिकरैर्निशि ॥२८०॥ हुनेवेरंडतैलाक्तैः श्मशाने रिपुशांतये । न शस्तं मारणं कर्म कुर्याच्चेदेयुतं हुनेत् ॥२८१॥ पायसैर्वा हुनेत्तावच्छांतये शांतमानसः । पारिजातहरं कृष्णं ध्यायन् लक्षं जपेन्मनुम् ॥२८२॥ सर्वत्रैव जयस्तस्य न कदापि पराजयः । व्याख्यामुद्राकरं कृष्णं रथस्थं भावयज्जपेत् ॥२८३॥ पार्थे दिशंतं गीतार्थं धर्मवृद्धं सुमानवः । पालाशपुष्पमध्वक्तैलक्षं विद्याप्तये हुनेत् ॥२८४॥ राष्ट्रपूर्ग्रामवस्तूनां शरीरस्यापि रक्षणे । विश्वरूपधरं प्रोद्यद्भानुकोटिसमप्रभम् ॥२८५॥ अग्नीषोमात्मकं कृष्णं द्रुतचामीकरप्रभम् । अर्कानिद्योतितास्यांघ्रिपंकजं दिव्यभूषणम् ॥२८६॥ नानायुधधरं प्राप्तं विश्वाकाशावकाशकम् । ध्यात्वा लक्षं जपेन्मन्त्रं रक्षणाय समाहितः ॥२८७॥ रक्तैर्वन्यप्रसूनैर्यो दिनादौ पूजयेद्धरिम् । दिनमध्योक्तविधिना जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥२८८॥ सहस्रमंडलामन्त्री वशयेन्मुखरान्द्विजान् । जातिपुष्पैः क्षत्रियांश्च गोपवेषधरं स्मरन् ॥२८९॥ जप करना चाहिये। ऐसा करने से सात ही दिनों के भीतर शत्रुओं का उच्चाटन हो जाता है। कपित्थ (कैथ) का फल तोड़नेवाले तथा वत्सासुर को ऊपर उठा कर फेंकनेवाले कृष्ण का ध्यान कर दस हजार मन्त्र जपते से तत्क्षण शत्रु का उच्चाटन हो जाता है। मंच पर से कंस को गिरा कर घसीटते-घसीटते निष्प्राण कर देने वाले हरि का ध्यान कर शत्रु के जन्मक्षत्र में लगाये गये वृक्ष की समिधाओं से रात्रि में दस हजार हवन करने से भयंकर शत्रु भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। अथवा नीम का तेल मिलाकर बहेड़े की लकड़ी से रात्रि में नियम पूर्वक दश हजार होम करने से शत्रु शीघ्र यमलोक को चला जाता है ॥२७४-२८०॥ यदि शत्रु को मारना हो तो रात्रि में श्मशान जाकर दक्षिणदिशावस्थित अग्नि में रेंडी के तेल में भिगोई हुई कपास की लकड़ियों से दश सहस्र हवन करे। यदि मारण कर्म को दोषावह समझे तो दोषशान्ति के लिये स्वस्थचित्त हो कर खीर से दश हजार हवन कर देना चाहिये। जो व्यक्ति कल्पवृक्ष हरण करने वाले कृष्ण का ध्यान तथा मंत्र जप करता है उसका कभी पराजय नहीं होता ॥२८१-२८२॥ व्याख्या मुद्रा लगाये रथ पर आसीन होकर धर्मवृद्धार्थ अर्जुन को गीता का उपदेश करते हुए कृष्ण का ध्यान कर मधुयुक्त पलाश-कुसुमों से एक लाख हवन करने वाला व्यक्ति विद्या प्राप्त करता है। राष्ट्र, नगर, ग्राम, वस्तु तथा शरीर की रक्षा चाहने वाला व्यक्ति कृष्ण के इस रूप का ध्यान करे कि वे विश्व का रूप धारण करने वाले हैं। उदित होते हुए करोड़ों सूर्य के समान उनकी कान्ति है। अग्नि और सोम उनका रूप है। तपे सोने के सदृश वे चमक रहे हैं। उनके मुख तथा चरणारविन्द भानु तथा अग्नि के समान प्रकाशमान हैं। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों को धारण किये हुए हैं तथा निखिल ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं। इस तरह ध्यान कर समाहित चित्त से एक लाख मंत्र जप करे। जो व्यक्ति प्रातःकाल वन्य रक्तपुष्पों से हरि का पूजन कर मध्याह्न में पूर्वोक्त विधि से एक सौ आठ बार मंत्र का जप करता है, वह सहस्रों वाचाल द्विजों को वशीभूत कर लेता है। गोपवेशधारी कृष्ण का ध्यान कर जूही के फूलों से होम करने से क्षत्रिय वश्य ६२ ना० पु०