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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 749, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 749

७३० नारदीयपुराणम् ध्यायन् क्रीडारतं कृष्णं रक्तैरश्वारिपुष्पकैः । वशयेद्वैश्यजातीयान् शूद्रान्नीलोत्पलैः स्मरन् ॥२८०॥ गीतनृत्यरतं श्वेतपुष्पैः साज्यैश्च तंडुलैः । हुत्वान्वहं सप्तदिनं भस्म भाले च मूर्द्धनि ॥२८१॥ धारयन्वशयेत्कांतांसापि तद्वत्पतिं ध्रुवम् । तांबूलं कुसुमं वासोंऽजनं चंदनमेव च ॥२८२॥ सहस्रं मनुना जप्तं दद्याद्यस्मै नराय च । सोऽचिरादेव वशगः सपुत्रपशुबांधवः ॥२८३॥ वृन्दावनस्थितं ध्यायन्बल्लवीसयुतं हरिम् । अपामार्गसमिद्भिस्तु हुत्वा तु वशयेज्जगत् ॥२८४॥ संप्राप्य सद्गुरोर्दीक्षां कृष्णं यो विधिनामुना । अर्चयेद्वैष्णवश्रेष्ठः सोऽष्टसिद्धीश्वरो भवेत् ॥२८५॥ तस्य दर्शनमात्रेण वादिनो निष्प्रभाः स्मृताः । वसेत्सरस्वती वक्त्रे गृहे चापि सभासदः ॥२८६॥ भुक्त्वा नानाविधान्भोगानंते विष्णुपदं व्रजेत् ॥२८७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे तृतीयपादे कृष्णमन्त्रनिरूपणं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥

होते हैं ॥२८३-२८९॥ क्रीडासक्त कृष्ण का ध्यान कर लाल करवीर के फूलों से हवन करने से वैश्य वश्य होते हैं। नृत्य-गीत करने में निरत कृष्ण का ध्यान कर नील कमलों से होम करने से शूद्र वश्य होते हैं। श्वेत पुष्प, घृत तथा तन्दुल से सात दिन हवन कर भस्म को ललाट एवम् मस्तक पर धारण करने से पत्नी वशीभूत होती है। पत्नी यदि ऐसा करे तो पति उसके वश्य होता है इसमें संशय नहीं। तांबूल, कुसुम, वस्त्र, अंजन तथा चन्दन को कृष्णमन्त्र से सहस्रबार अभिमन्त्रित कर जिसको दिया जायेगा, वह पुत्र, पशु तथा इष्ट-मित्रों समेत तुरन्त उस (देने वाले) के वशीभूत हो जायगा ॥२९०-२९३॥ वृन्दावन में गोपियों के साथ अवस्थित हरि का ध्यान कर अपामार्ग (चिचिड़े) से हवन करनेवाला व्यक्ति तीनों लोक को वश में कर लेता है। जो वैष्णवश्रेष्ठ सद्गुरु से कृष्णमन्त्र की दीक्षा लेकर उस विधि से अर्चना करता है, वह अष्ट सिद्धियों का ईश्वर होता है। उसके देखते ही वादी निष्प्रभ हो जाता है। सभाभवन में भी सरस्वती उसके मुख में विराजती है। वह ऐहलोकिक विविध भोगों को भोग कर अन्त में विष्णुलोक को जाता है ॥२६४-२६७॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध के तृतीयपाद में कृष्णमंत्रनिरूपण नामक अस्सीवां अध्याय समाप्त ॥८०॥