बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 750, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकाशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ कृष्णस्य मंत्राणां वक्ष्ये भेदान् मुनीश्वर । यान्समाराध्य मनुजाः साधयंतीष्टमात्मनः ॥१॥ शक्तिश्रीमारापूर्वश्च श्रीशक्तिस्मरपूर्वकः । मारशक्तिरमापूर्वा दशाणर्णा मनवस्त्रयः ॥२॥ मुनिः स्यान्नारदश्छन्दो गायत्री देवता पुनः । कृष्णो गोविंदनामात्र सर्वकामप्रदो नृणाम् ॥३॥ चक्रैः पूर्ववदंगानि त्रयाणामपि कल्पयेत् । ततः किरीटमनुना व्यापकं हि समाचरेत् ॥४॥ सुदर्शनस्य मनुना कुर्याद्दिग्बंधनं तथा । विंशत्यर्णोक्तवत्कुर्यादाद्ये ध्यानाचनादिकम् ॥५॥ द्वितीये तु दशाणोक्तं ध्यानपूजादिकं चरेत् । तृतीये तु हरि ध्यायेत्समाहितमनाः सुधीः ॥६॥ शंखचक्रधनुर्बाणपाशांकुशधरारुणम् । दोर्भ्यां धृतं धमंतं च वेणुं कृष्णदिवाकरम् ॥७॥
अध्याय ८१ कामना-भेद से कृष्ण-मंत्रों का भेद-निरूपण श्री सनत्कुमार बोले-मुनिवर्य ! अब मैं कृष्णमंत्रों का भेद बतलाऊँगा, जिनकी आराधना करने से मनुष्यों की इष्टसिद्धि होती है। दशाक्षर मंत्र के तीन नूतन भेद हैं- 'ह्रीं श्रीं क्लीं' इन तीन बीजों के साथ 'गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' यह प्रथम भेद है। 'श्रीं ह्रीं क्लीं' इस क्रम से बीज जोड़ने पर दूसरा भेद होता है। 'क्लीं ह्रीं श्रीं' इस क्रम से बीज मन्त्र जोड़ने पर तीसरा भेद बनता है। इनके मुनि नारद, छंद गायत्री और देवता मनुष्यों की समस्त कामनाओं को सफल करनेवाले गोविन्द कृष्ण हैं। तीनों मन्त्रों का चक्रों से पूर्ववत् अंगन्यास करके किरीट मन्त्र से व्यापक न्यास करे । पश्चात् सुदर्शन मन्त्र से दिग्बन्ध करके पहिले मन्त्र में बीस अक्षरों वाले मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे । दूसरे मन्त्र में दशाक्षर मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे ॥१-५॥ तीसरे मन्त्र में समाहित चित्त से कृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे हाथों में शंख, चक्र, धनुष, बाण, पाश तथा अंकुश धारण किये हुए हैं। इससे उनका हाथ रक्तवर्ण का मालूम पड़ता है। फिर वे हाथों में वंशी लेकर बजा रहे हैं। इससे उनका हाथ कृष्ण एवम् श्वेत रंग का भी दिखाई देता है। ऐसा ध्यान कर पांच लाख मन्त्रों का जप करे और उसका दशांश घी एवम् खीर से हवन करे । मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधक पहिले की तरह सकाम कर्मों को कर सकता है। "ह्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय स्वाहा" यह बारह अक्षरों का मन्त्र है । इसके ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छंद और श्रीकृष्ण देवता हैं । पृथक्-पृथक् तीन बीजों तथा तीन, चार एवं दो मन्त्रा- क्षरों से षडङ्गन्यास करे । बीस अक्षरवाले मन्त्र की भाँति इसके भी ध्यान, होम और पूजन आदि करने चाहिए। यह मन्त्र संपूर्ण अभीष्ट फलों को देने वाला है। दशाक्षर मन्त्र (गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) के आदि में श्रीं ह्रीं क्लीं तथा अन्त में क्लीं ह्रीं श्रीं जोड़ने से षोडशाक्षर मन्त्र बनता है। इसी प्रकार केवल आदि में ह्रीं श्रीं जोड़ने से बारह अक्षरों का मन्त्र होता है। पूर्वोक्त चक्रों द्वारा अंगन्यास करे, फिर भगवान् का इस प्रकार ध्यान करे कि वे अपने वर तथा अभय देने वाले दो हाथों से अपने प्रिय अंगों का स्पर्श कर रहे हैं और पद्म तथा उत्पल के