बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 751, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें७३२ नारदीयपुराणम् एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्रान्पञ्चलक्षं पृथक् सुधीः । जुहुयात्तद्दशांशेन पायसेन ससर्पिषा ॥८८॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्री कुर्यात्काम्यानि पूर्ववत् । श्रीशक्तिकामः कृष्णाय गोविन्दायाग्निसुन्दरी ॥८९॥ रव्यर्णो ब्रह्मगायत्रीकृष्णा ऋष्यादयोऽस्य तु । बीजं रमान्धिद्युग्मार्णैः षडंगानि प्रकल्पयेत् ॥९०॥ विंशत्यर्णोदितजपध्यानहोमार्चनादिकम् । किं बहुक्तेन मंत्रोऽयं सर्वाभीष्टफलप्रदः ॥९१॥ श्रीशक्तिस्मरपूर्वांगजन्मा शक्तिरमांतकः । दशाक्षरः स एवादौ प्रोक्तः शक्तिरमायुतः ॥९२॥ मन्त्रो षोडशरव्यणों चक्रैरंगानि कल्पयेत् । वरदाभयहस्ताभ्यां श्लिष्टंतं स्वांगके श्रिये ॥९३॥ पद्मोत्पलकरे ताभ्यां श्लिष्टं चक्रद प्रोज्ज्वलम् । ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षदशकं तद्दशांशतः ॥९४॥ आज्यैर्हुत्वा ततः सिद्धौ भवेतां मन्त्रनायकौ । सर्वकामप्रदौ सर्वसम्पत्सौभाग्यदौ नृणाम् ॥९५॥ अष्टादशार्णः कामांतो मनुः सुतधनप्रदः । नारदोऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री देवता मनोः ॥९६॥ कृष्णः कामो बीजमुक्तं शक्तिर्वह्निप्रिया मता । षड्वोर्याढ्येन बीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥९७॥ पाणौ पायसपात्रं च दक्षे हैयंगवीनकम् । वामं दधद्दिव्यदिगंबरो गोपीसुतोऽवतु ॥९८॥ ध्यात्वैवं प्रजपेन्मंत्रं द्वात्रिंशल्लक्षमानतः । दशांशं जुहुयादग्नौ सिताढ्येन पयोऽधसा ॥९९॥ पूर्वोक्तवैष्णवे पीठे यजेदष्टादशार्णवत् । पद्मस्थं कृष्णमभ्यर्च्यं तर्पयेत्तन्मुखांबुजे ॥१००॥ क्षीरेण कदलीपक्वैर्दध्ना हैयंगवेन च । पुत्रार्थी तर्पयेदेवं वत्सराल्लभते सुतम् ॥१०१॥ यद्यदिच्छति तत्सर्वं तर्पणादेव सिद्ध्यति । वाक्कामो ङेयुतं कृष्णपदं माया ततः परम् ॥१०२॥ गोविन्दाय रमा पश्चाद्दशाणं च समुद्धरेत् । मनुस्वरयुतौ सर्गयुक्तौ भृगुतदूद्ध्वंगौ ॥१०३॥ द्वाविंशत्यक्षरो मन्त्रो वागीशत्वप्रदायकः । ऋषिः स्यान्नारदश्छन्दो गायत्री देवता पुनः ॥१०४॥
समान दो हाथों में चक्र एवम् गदा धारण किये हैं। ऐसा ध्यान करके दस लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश घृत से हवन करे ॥६-८॥ ऐसा करने से सकल सम्पत्ति तथा सौभाग्य को देने वाले और अखिल कामनाओं को पूर्ण करने वाले दोनों मन्त्रश्रेष्ठ सिद्ध हो जाते हैं। अष्टादशाक्षर मन्त्र के अंत में क्लीं जोड़ दिया जाय तो वह पुत्र एवम् धन देने वाला होता है। उसके मुनि नारद, छंद गायत्री, देवता कृष्ण, बीज क्लीं और शक्ति स्वाहा है। उसकी सिद्धि के लिये छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर कृष्ण का इस तरह ध्यान करे कि 'उनके दाहिने हाथ में खीर तथा बायें हाथ में मक्खन है। ऐसे दिगम्बर गोपीपुत्र श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करें। ऐसा ध्यान कर बत्तीस लाख मन्त्र जप करे। और उसका दशांश अग्नि में चीनी या मिश्री मिलायी हुई खीर से हवन करे। अनन्तर पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर अष्टादशाक्षर मन्त्र की तरह पूजन करे। कमल के आसन पर विराजमान श्रीकृष्ण की अर्चना कर उनके मुखारविन्द में दूध, पका केला, दही तथा ताजा मक्खन डालकर उन्हें तृप्त करे। पुत्र की कामना से जो इस तरह तर्पण करता है, उसे एक वर्ष के भीतर ही पुत्र हो जाता है ॥९-२१॥ वह जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह उस तर्पण के प्रभाव से प्राप्त हो जाती है। वाक् (ऐं), काम (क्लीं) ङे विभक्त्यन्त कृष्ण शब्द (कृष्णाय) तत्पश्चात् माया (ह्रीं), उसके बाद 'गोविन्दाय' फिर रमा (श्रीं), तदनन्तर दशाक्षर मन्त्र (गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) उद्धृत करे, फिर ह् और स् ये दोनों ओकार और विसर्ग से संयुक्त होकर अन्त में जुड़ जाय तो (ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविन्दाय श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ह् सौं) बाईस अक्षर का मन्त्र होता है, जो वागीशत्व प्रदान करता है। इसके ऋषि नारद, छंद गायत्री, देवता विद्याप्रद गोपाल, बीज क्लीं और शक्ति ऐं है। विद्या प्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है। इसकी सिद्धि के