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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 752, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 752

एकाशीतितमोऽध्यायः ७३३ विद्याप्रदश्च गोपालः कामो बीजं प्रकीर्तितम् । शक्तिस्तु वाग्भवं विद्याप्राप्तये विनियोजना ॥२५॥ वामोर्ध्वहस्ते दधतं विद्यापुस्तकमुत्तमम् । अक्षमालां च वक्षोर्ध्वस्फार्टिकों मातृकामयीम् ॥२६॥ शब्दब्रह्ममयं वेणुमधः पाणिद्वये पुनः । गायत्रीगीतवसनं श्यामलं कोमलच्छविम् ॥२७॥ बर्हावतंसं सर्वज्ञं सेवितं मुनिपुंगवैः । ध्यात्वैवं प्रमदावेशविलासं भुवनेश्वरम् ॥२८॥ वेवलक्षं जपेन्मन्त्रं किंशुकैस्तद्दशांशतः । हुत्वा तु पूजयेन्मन्ती विशत्यर्णं विधानतः ॥२९॥ एवं यो भजते मन्त्रं भवेद्वागीश्वरस्तु सः । अदृष्टान्यपि शास्त्राणि तस्य गंगातरंगवत् ॥३०॥ तारः कृष्णयुगं पश्चान्महाकृष्ण इतीरयेत् । सर्वज्ञ त्वंप्रशब्दांते सीदमेऽग्निश्च मारम ॥३१॥ णांते विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ ततश्च मे । त्रर्यास्त्रंशदक्षरोऽयं महाविद्याप्रदो मनुः ॥३२॥ नारदोऽस्य मुनिश्च्छन्दोऽनुष्टुप् कृष्णोऽस्य देवता । पादैः सर्वेण पंचांगं कृत्वा ध्यायेत्ततो हरिम् ॥३३॥ दिव्योद्याने विवस्वत्प्रतिममणिमयेमण्डपे योगपीठे मध्ये यः सर्ववेदांतमयसुरतरोः संनिविष्टो मुकुन्दः । वेदैः कल्पद्रुरूपैः शिखरिशतसमालंबिकोशैश्चतु- ॥३४॥ र्भिर्न्यायैस्तर्कैः पुराणैः स्मृतितिमिरविवृत्तस्तादृशैश्चामरायैः दद्यादिध्वक्षकराग्रैरवि वरमुरलीपुष्पबाणेक्षुचापा- नक्षस्पृक्पूर्णकुंभौ स्मरललितवपुर्दिव्यभूषांगरागः । व्याख्यां वामे वितन्वन् स्फुटरुचिरपदो वेणुना विश्वमात्रे ॥३५॥ शब्दब्रह्मोद्भवने श्रियमरुणरुचिर्बल्खलीवल्लभो नः लिये कृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे अपने बाँये हाथ में उत्तम विद्यापुस्तक तथा दाहिने हाथ में रुद्राक्षमाला तथा मातृकामयी स्फटिकमाला धारण किये हुए हैं ॥२२-२६॥ शब्द ब्रह्ममय वेणु को दोनों हाथों में लेकर बजा रहे हैं । गायत्री को वे जपते हैं, गीत गाते हैं और वस्त्राभूषणों से विभूषित हैं । उनका रंग साँवला है । छवि कोमल (सुन्दर) है, वे मयूरपिच्छ का मुकुट धारण किए हुए हैं, सर्वज्ञ हैं । मुनिगण उनकी सेवा करते हैं । ललनावेश उन्हें बहुत प्रिय हैं। ऐसे भुवनेश्वर का ध्यान कर चार लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश पलाश पुष्पों से हवन करे । हवनोपरान्त बीस अक्षरों वाले मन्त्र के लिये कहे हुए विधान के अनुसार पूजन करे । जो इस प्रकार मंत्र की आराधना करता है, वह वागीश्वर होता है । बिना देखे शास्त्र भी गंगातरंग की तरह उसकी जिह्वा पर लहराते हैं 'ओं कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे । रमारमण विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ मे' । (हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! हे महाकृष्ण ! आप सर्वज्ञ हैं । मुझ पर प्रसन्न होइए । हे रमारमण ! हे विद्ये- श्वर ! मुझे शीघ्र विद्या दीजिए)' यह तैंतीस अक्षरोंवाला मंत्र महाविद्या को देने वाला है । इसके मुनि नारद, छंद अनुष्टुप् और देवता कृष्ण हैं । मन्त्र के चारों चरणों और संपूर्ण मन्त्र से पंचांगन्यास कर हरि का इस तरह ध्यान करे कि रमणीय उद्यान में दिनकर किरण की तरह चमकते हुए मणिमय मंडप के भीतर योगपीठ पर संपूर्ण वेदान्तमय कल्पवृक्ष के नीचे मुकुन्द भगवान् विराजमान हैं। उन्हें अमरगण तथा कल्पद्रुम रूपी वेद, जिनकी शाखायें कोश, न्याय, पुराण एवम् स्मृतियां हैं, चारों ओर से घेरे हुए हैं, ॥२७-३४॥ स्वयं कृष्ण अपने कर कमलों में गदा, मुरली, पुष्पबाण, इक्षुचाप (ईख के धनुष) अक्षमाला तथा पूर्ण कुम्भ धारण किये हुए हैं । उनका शरीर कामदेव के समान सुललित है । वे दिव्य आभूषण तथा दिव्य अंगराग धारण करते हैं । शब्द