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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 753, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 753

७३४ | नारदीयपुराणम् एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं पायसैर्हुनेत् । अष्टादशार्णवत्कुर्याद्यजनं चास्य मन्त्रवित् ॥३६॥ तारो नमो भगवते नन्दपुत्राय संवदेत् । आनन्दवपुषे द्वयाहशार्ण तदनंतरम् ॥३७॥ अष्टाविंशतिवर्णोऽयं मंत्रः सर्वेष्टदायकः । नंदपुत्रपदं ज्ञेयं श्यामलांगपदं तथा ॥३८॥ तथा बालवपुःकृष्णं गोविंदं च तथा पुनः । दशार्णोऽतो भवेन्मंत्रो द्वात्रिंशदक्षरान्वितः ॥३९॥ अनयोर्नारदऋषिश्छंदस्तूष्णिगनुष्टुभौ । देवता नन्दपुत्रस्तु विनियोगोऽखिलाप्तये ॥४०॥ चक्रैः पंचांगमर्चास्यादंगदिक्पालहेतिभिः । दक्षिणे रत्नचषकं वामे सौवर्णनेत्रकम् ॥४१॥ करे दधानं देवीभ्यां श्लिष्टं संचितयेद्विभुम् । लक्षं जपो दशांशेन जुहुयात्पायसेन तु ॥४२॥ एताभ्यां सिद्धमंत्राभ्यां मंत्री कुर्याद्यथेप्सितम् । प्रणवः कमला माया नमो भगवते ततः ॥४३॥ नंदपुत्राय तत्पश्चाद्वालान्ते वपुषे पदम् । ऊनविंशतिवर्णोऽयं मुनिर्ब्रह्मा समीरिरतः ॥४४॥ छंदोऽनुष्टुप् देवता च कृष्णो बालवपुः स्वयम् । मन्त्रोऽयं सर्वसंपत्तिसिद्धये सेव्यते बुधैः ॥४५॥ तारो हृद्भगवाञ्छेतो रुक्मिणीवल्लभाय च । वह्निजायावधिः प्रोक्तो मंत्रः षोडशवर्णवान् ॥४६॥ नारदोऽस्य मुनिश्चन्दोऽनुष्टुप् च देवता मनोः । रुक्मिणीवल्लभश्चंद्रदृग्वेदांगाक्षिवर्णकैः ॥४७॥ पञ्चांगानि प्रकुर्वीत ततो ध्यायेत्सुरेश्वरम् तापिच्छच्छविरंगनां प्रियतमां स्वर्णप्रभांबुज- प्रोद्यद्धामभुजां स्ववामभुजयाश्लिष्यन्स्वचित्ताशया । श्लिष्यन्तों स्वयमन्यहस्तविलसत्सौवर्णवेत्रश्चिरं पायान्नः सुविशुद्धपीतवसनो नानाविभूषो हरिः ॥४८॥ ब्रह्म से प्रकट हुई तथा बायें हाथ में ली हुई वेणु द्वारा स्पष्ट एवम् रुचिर पद का उच्चारण करते हुए विश्व मात्र में विशद व्याख्या कर विस्तार करते हैं । उनकी अंगकान्ति अरुण वर्ण की है, ऐसे गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण हमें लक्ष्मी प्रदान करें । ऐसा ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश खीर से हवन करे । मन्त्रवेत्ता साधक अष्टादशाक्षर मन्त्र की तरह उसका भी पूजन करे । ‘ओं नमो भगवते नन्दपुत्राय आनन्दवपुषे गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' यह अट्ठाईस अक्षरों वाला मन्त्र समस्त कामनाओं को देने वाला है । 'नन्दपुत्राय श्यामलाङ्गाय बालवपुषे कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' यह मन्त्र बत्तीस अक्षरों का है । इन दोनों मन्त्रों के ऋषि नारद, छन्द क्रमशः उष्णिक् तथा अनुष्टुप्, देवता श्रीकृष्ण और विनियोग सर्व प्राप्ति के लिये किया जाता है । इनकी सिद्धि के लिये पंचांगन्यास कर अंग देवता दिक्पाल तथा आयुधों की अर्चना करे ॥३५-४०१/२॥ अनन्तर दायें हाथ में रत्नपात्र तथा बायें हाथ में सुवर्णवेत्र (लाठी) धारण करनेवाले और दो देवियों से आलिंगित किये जाने वाले विभु का ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश खीर से होमे । इन दोनों मन्त्रों के सिद्ध हो जाने पर उपासक अभिलषित फलों को प्राप्त करता है । यह उनतीस अक्षरों का मन्त्र है, इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द अनुष्टुप् और देवता बालशरीरधारी स्वयं कृष्ण हैं। सकल ऐश्वर्यों की प्राप्ति के लिये बुधगण इनकी सेवा करते हैं ॥४१-४५॥ 'ओं नमो भगवते रुक्मिणीवल्लभाय स्वाहा' यह सोलह अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि नारद, छन्द अनुष्टुप् और देवता रुक्मिणीवल्लभ हैं । सोलह अक्षरों से पंचांगन्यास कर सुरेश्वर (कृष्ण) का इस तरह ध्यान क कि वे तमालपत्र के समान छवि वाले कृष्ण अपनी स्वर्णवर्णा प्रियतमा को, जिनकी भुजा में कमल की माला है और जो छाती से लगाकर लिपट रही है, गोद में लेकर अपनी बाँयी भुजा से आलिंगन कर रहे हैं। उनके दूसरे हाथ में सोने की यष्टिका है। वे अनेक आभूषणों से आभूषित तथा पवित्र पीतवस्त्र धारण किये हुए