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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 754, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 754

एकाशीतितमोऽध्यायः ७३५ ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षं रक्तैः पद्मैर्दशांशतः ॥४६॥ त्रिमध्वक्तैर्हुनेत्पीठे पूर्वोक्ते पूजयेद्धरिम् । अंगैनारदमुख्यैश्च लोकेशैश्च तदायुधैः ॥५०॥ एवं सिद्धो मनुर्दद्यात्सर्वान्कामांश्च मंत्रिणे । लीलादंडपदाम्भोजोऽपि जनसंसक्तदोः पदम् ॥५१॥ दंडांते वा धरावह्नि नरधीशोढचोऽथ लोहितः । मेघश्यामपदं पश्चाद्भगवन् सलिलं सद्क् ॥५२॥ विष्णो इत्युक्त्वा ठद्वयं स्यादेकोनत्रिंशद्वर्णवान् । नारदोऽस्य मुनिश्चंदोऽनुष्टुप् च देवता मनोः ॥५३॥ लीलादंडहरिः प्रोक्तो मन्वब्धियुगवह्नि नभिः । वेदैः पंचांगकं भांगैर्मंत्रवर्णोत्थितैः क्रमात् ॥५४॥ संमोहयंश्च निजवामकरस्थलीलादण्डेन गोपयुवतीः परसुंदरीश्च । विश्रन्निजप्रियसखांसगदक्षहस्तो देवश्रियं निहतकंस उरुक्रमो नः ॥५५॥ लक्षं जपो दशांशेन जुहुयात्तिततण्डुलैः । त्रिमध्वक्तैस्ततोऽभ्यर्चेदंगं दिक्पालहेतिभिः ॥५६॥ लीलादंडहरि यो वै भजते नित्यमादरात् । स सर्वैः पूज्यते लोकैस्तस्य गेहे स्थिरा रमा ॥५७॥ सद्यारूढा स्मृतिस्तोयं केशवाढधरायुगम् । भयाग्निवल्लभामंत्रः सप्ताणः सर्वसिद्धिदः ॥५८॥ ऋषिः स्यान्नारदश्छंदो उष्णिक्गोवेल्लभोस्य तु । देवतापूर्ववच्चक्रैः पञ्चांगानि तु कल्पयेत् ॥५९॥ ध्येयो हरिः सकपिलागणमध्यसंस्थस्ता आह्वयन्वद्धदक्षिणदोस्थ्यवेणुम् । पाशं स्रग्यष्टिमपरत्र पयोदनीलः पीताम्बराहरिपिच्छकृतावतंसः ॥६०॥ सप्तलक्षं जपेन्मंत्रं दशांशं जुहुयात्ततः । गोदुग्धैः पूजयेत्पीठं स्यादंगैः प्रथमावृतिः ॥६१॥ सुवर्णपिंगलां गौरपिंगलां रक्तपिंगलाम् । गुडपिंगां बभ्रुवर्णां चोत्तमां कपिलां तथा ॥६२॥ हैं ॥४६-४८॥ इस प्रकार ध्यान कर एक लाख मन्त्र को जपे और उसका दशांश त्रिमधुयुक्त रक्त पद्मों से हवन करे। पश्चात् पूर्वोक्त पीठ पर नारद आदि अंग देवों, लोकपालों तथा आयुधों समेत हरि की अर्चना करे। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध होने से साधक को सकल कामनायें प्राप्त होती हैं। "लीलादंड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड वालरूप मेघश्याम भगवन् विष्णो स्वाहा" यह उन्नीस अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि नारद, छन्द अनुष्टुप् और देवता लीलादण्डधारी हरि हैं। उसकी सिद्धि के लिये उन्नीसों मंत्रवर्णों से क्रमशः अंगन्यास कर इस प्रकार ध्यान करे कि कृष्ण अपने वामकरस्थ लीलादण्ड से परमसुन्दरी गोप युवतियों को मोहित कर रहे हैं। और दाहिना हाथ प्रिय मित्र के कंधे पर रख कर चल रहे हैं। उन्होंने कंस को निहत किया है। उनका पराक्रम महान् है ॥४९-५५॥ ऐसा ध्यान कर एक लाख मंत्र जप करे और उसका दशांश त्रिमधुयुक्त तिल और चावलों से हवन करे। अनन्तर अंग देवता, दिक्पाल तथा आयुधों की पूजा करे। जो व्यक्ति लीलादंडधारी हरि की नित्य आदर- पूर्वक आराधना करता है, वह सब का पूज्य होता है तथा उसके घर लक्ष्मी स्थिर होकर रहती है। सद्य (ओ), परस्थित स्मृति (ग्) अर्थात् (गो), केशव (अ) युक्त तोय (व्), ध्ररायुग (ल्ल), 'भाय', अग्निवल्लभा (स्वाहा) - यह सप्ताक्षर मंत्र सकल सिद्धियों को देने वाला है। इसके ऋषि नारद, छंद उष्णिक् और देवता गोपाल हैं। पूर्व मंत्र की तरह चक्रों से पंचांगन्यास कर ध्यान करे कि हरि गौओं के बीच अवस्थित होकर उन्हें बुला रहे हैं। जिनका वर्ण मेघ के समान नील हैं। वे पीताम्बर तथा मयूरपुच्छ का मुकुट पहने हुए हैं। दाहिने हाथ में बंशी तथा बाँये हाथ में पाश एवम् यष्टि धारण किये हुए हैं। ऐसा ध्यान कर सात लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश गोदुग्ध से हवन करे। अनन्तर पीठ पर अंगदेवताओं के साथ सुवर्णपिंगला, गौरपिंगला, रक्तपिंगला, गुडपिंगा, बभ्रुवर्णा, कपिला, चतुष्कपिंगला और पोत पिंगला- इन आठ गौओं का पूजन कर लोकपालों तथा