बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
एकाशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ कृष्णस्य मंत्राणां वक्ष्ये भेदान् मुनीश्वर । यान्समाराध्य मनुजाः साधयंतीष्टमात्मनः ॥१॥ शक्तिश्रीमारापूर्वश्च श्रीशक्तिस्मरपूर्वकः । मारशक्तिरमापूर्वा दशाणर्णा मनवस्त्रयः ॥२॥ मुनिः स्यान्नारदश्छन्दो गायत्री देवता पुनः । कृष्णो गोविंदनामात्र सर्वकामप्रदो नृणाम् ॥३॥ चक्रैः पूर्ववदंगानि त्रयाणामपि कल्पयेत् । ततः किरीटमनुना व्यापकं हि समाचरेत् ॥४॥ सुदर्शनस्य मनुना कुर्याद्दिग्बंधनं तथा । विंशत्यर्णोक्तवत्कुर्यादाद्ये ध्यानाचनादिकम् ॥५॥ द्वितीये तु दशाणोक्तं ध्यानपूजादिकं चरेत् । तृतीये तु हरि ध्यायेत्समाहितमनाः सुधीः ॥६॥ शंखचक्रधनुर्बाणपाशांकुशधरारुणम् । दोर्भ्यां धृतं धमंतं च वेणुं कृष्णदिवाकरम् ॥७॥
अध्याय ८१ कामना-भेद से कृष्ण-मंत्रों का भेद-निरूपण श्री सनत्कुमार बोले-मुनिवर्य ! अब मैं कृष्णमंत्रों का भेद बतलाऊँगा, जिनकी आराधना करने से मनुष्यों की इष्टसिद्धि होती है। दशाक्षर मंत्र के तीन नूतन भेद हैं- 'ह्रीं श्रीं क्लीं' इन तीन बीजों के साथ 'गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' यह प्रथम भेद है। 'श्रीं ह्रीं क्लीं' इस क्रम से बीज जोड़ने पर दूसरा भेद होता है। 'क्लीं ह्रीं श्रीं' इस क्रम से बीज मन्त्र जोड़ने पर तीसरा भेद बनता है। इनके मुनि नारद, छंद गायत्री और देवता मनुष्यों की समस्त कामनाओं को सफल करनेवाले गोविन्द कृष्ण हैं। तीनों मन्त्रों का चक्रों से पूर्ववत् अंगन्यास करके किरीट मन्त्र से व्यापक न्यास करे । पश्चात् सुदर्शन मन्त्र से दिग्बन्ध करके पहिले मन्त्र में बीस अक्षरों वाले मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे । दूसरे मन्त्र में दशाक्षर मन्त्र की तरह ध्यान, पूजन आदि करे ॥१-५॥ तीसरे मन्त्र में समाहित चित्त से कृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे हाथों में शंख, चक्र, धनुष, बाण, पाश तथा अंकुश धारण किये हुए हैं। इससे उनका हाथ रक्तवर्ण का मालूम पड़ता है। फिर वे हाथों में वंशी लेकर बजा रहे हैं। इससे उनका हाथ कृष्ण एवम् श्वेत रंग का भी दिखाई देता है। ऐसा ध्यान कर पांच लाख मन्त्रों का जप करे और उसका दशांश घी एवम् खीर से हवन करे । मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधक पहिले की तरह सकाम कर्मों को कर सकता है। "ह्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय स्वाहा" यह बारह अक्षरों का मन्त्र है । इसके ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छंद और श्रीकृष्ण देवता हैं । पृथक्-पृथक् तीन बीजों तथा तीन, चार एवं दो मन्त्रा- क्षरों से षडङ्गन्यास करे । बीस अक्षरवाले मन्त्र की भाँति इसके भी ध्यान, होम और पूजन आदि करने चाहिए। यह मन्त्र संपूर्ण अभीष्ट फलों को देने वाला है। दशाक्षर मन्त्र (गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) के आदि में श्रीं ह्रीं क्लीं तथा अन्त में क्लीं ह्रीं श्रीं जोड़ने से षोडशाक्षर मन्त्र बनता है। इसी प्रकार केवल आदि में ह्रीं श्रीं जोड़ने से बारह अक्षरों का मन्त्र होता है। पूर्वोक्त चक्रों द्वारा अंगन्यास करे, फिर भगवान् का इस प्रकार ध्यान करे कि वे अपने वर तथा अभय देने वाले दो हाथों से अपने प्रिय अंगों का स्पर्श कर रहे हैं और पद्म तथा उत्पल के
७३२ नारदीयपुराणम् एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्रान्पञ्चलक्षं पृथक् सुधीः । जुहुयात्तद्दशांशेन पायसेन ससर्पिषा ॥८८॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्री कुर्यात्काम्यानि पूर्ववत् । श्रीशक्तिकामः कृष्णाय गोविन्दायाग्निसुन्दरी ॥८९॥ रव्यर्णो ब्रह्मगायत्रीकृष्णा ऋष्यादयोऽस्य तु । बीजं रमान्धिद्युग्मार्णैः षडंगानि प्रकल्पयेत् ॥९०॥ विंशत्यर्णोदितजपध्यानहोमार्चनादिकम् । किं बहुक्तेन मंत्रोऽयं सर्वाभीष्टफलप्रदः ॥९१॥ श्रीशक्तिस्मरपूर्वांगजन्मा शक्तिरमांतकः । दशाक्षरः स एवादौ प्रोक्तः शक्तिरमायुतः ॥९२॥ मन्त्रो षोडशरव्यणों चक्रैरंगानि कल्पयेत् । वरदाभयहस्ताभ्यां श्लिष्टंतं स्वांगके श्रिये ॥९३॥ पद्मोत्पलकरे ताभ्यां श्लिष्टं चक्रद प्रोज्ज्वलम् । ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षदशकं तद्दशांशतः ॥९४॥ आज्यैर्हुत्वा ततः सिद्धौ भवेतां मन्त्रनायकौ । सर्वकामप्रदौ सर्वसम्पत्सौभाग्यदौ नृणाम् ॥९५॥ अष्टादशार्णः कामांतो मनुः सुतधनप्रदः । नारदोऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री देवता मनोः ॥९६॥ कृष्णः कामो बीजमुक्तं शक्तिर्वह्निप्रिया मता । षड्वोर्याढ्येन बीजेन षडंगानि समाचरेत् ॥९७॥ पाणौ पायसपात्रं च दक्षे हैयंगवीनकम् । वामं दधद्दिव्यदिगंबरो गोपीसुतोऽवतु ॥९८॥ ध्यात्वैवं प्रजपेन्मंत्रं द्वात्रिंशल्लक्षमानतः । दशांशं जुहुयादग्नौ सिताढ्येन पयोऽधसा ॥९९॥ पूर्वोक्तवैष्णवे पीठे यजेदष्टादशार्णवत् । पद्मस्थं कृष्णमभ्यर्च्यं तर्पयेत्तन्मुखांबुजे ॥१००॥ क्षीरेण कदलीपक्वैर्दध्ना हैयंगवेन च । पुत्रार्थी तर्पयेदेवं वत्सराल्लभते सुतम् ॥१०१॥ यद्यदिच्छति तत्सर्वं तर्पणादेव सिद्ध्यति । वाक्कामो ङेयुतं कृष्णपदं माया ततः परम् ॥१०२॥ गोविन्दाय रमा पश्चाद्दशाणं च समुद्धरेत् । मनुस्वरयुतौ सर्गयुक्तौ भृगुतदूद्ध्वंगौ ॥१०३॥ द्वाविंशत्यक्षरो मन्त्रो वागीशत्वप्रदायकः । ऋषिः स्यान्नारदश्छन्दो गायत्री देवता पुनः ॥१०४॥
समान दो हाथों में चक्र एवम् गदा धारण किये हैं। ऐसा ध्यान करके दस लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश घृत से हवन करे ॥६-८॥ ऐसा करने से सकल सम्पत्ति तथा सौभाग्य को देने वाले और अखिल कामनाओं को पूर्ण करने वाले दोनों मन्त्रश्रेष्ठ सिद्ध हो जाते हैं। अष्टादशाक्षर मन्त्र के अंत में क्लीं जोड़ दिया जाय तो वह पुत्र एवम् धन देने वाला होता है। उसके मुनि नारद, छंद गायत्री, देवता कृष्ण, बीज क्लीं और शक्ति स्वाहा है। उसकी सिद्धि के लिये छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास कर कृष्ण का इस तरह ध्यान करे कि 'उनके दाहिने हाथ में खीर तथा बायें हाथ में मक्खन है। ऐसे दिगम्बर गोपीपुत्र श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करें। ऐसा ध्यान कर बत्तीस लाख मन्त्र जप करे। और उसका दशांश अग्नि में चीनी या मिश्री मिलायी हुई खीर से हवन करे। अनन्तर पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर अष्टादशाक्षर मन्त्र की तरह पूजन करे। कमल के आसन पर विराजमान श्रीकृष्ण की अर्चना कर उनके मुखारविन्द में दूध, पका केला, दही तथा ताजा मक्खन डालकर उन्हें तृप्त करे। पुत्र की कामना से जो इस तरह तर्पण करता है, उसे एक वर्ष के भीतर ही पुत्र हो जाता है ॥९-२१॥ वह जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह उस तर्पण के प्रभाव से प्राप्त हो जाती है। वाक् (ऐं), काम (क्लीं) ङे विभक्त्यन्त कृष्ण शब्द (कृष्णाय) तत्पश्चात् माया (ह्रीं), उसके बाद 'गोविन्दाय' फिर रमा (श्रीं), तदनन्तर दशाक्षर मन्त्र (गोपीजनवल्लभाय स्वाहा) उद्धृत करे, फिर ह् और स् ये दोनों ओकार और विसर्ग से संयुक्त होकर अन्त में जुड़ जाय तो (ऐं क्लीं कृष्णाय ह्रीं गोविन्दाय श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ह् सौं) बाईस अक्षर का मन्त्र होता है, जो वागीशत्व प्रदान करता है। इसके ऋषि नारद, छंद गायत्री, देवता विद्याप्रद गोपाल, बीज क्लीं और शक्ति ऐं है। विद्या प्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है। इसकी सिद्धि के
एकाशीतितमोऽध्यायः ७३३ विद्याप्रदश्च गोपालः कामो बीजं प्रकीर्तितम् । शक्तिस्तु वाग्भवं विद्याप्राप्तये विनियोजना ॥२५॥ वामोर्ध्वहस्ते दधतं विद्यापुस्तकमुत्तमम् । अक्षमालां च वक्षोर्ध्वस्फार्टिकों मातृकामयीम् ॥२६॥ शब्दब्रह्ममयं वेणुमधः पाणिद्वये पुनः । गायत्रीगीतवसनं श्यामलं कोमलच्छविम् ॥२७॥ बर्हावतंसं सर्वज्ञं सेवितं मुनिपुंगवैः । ध्यात्वैवं प्रमदावेशविलासं भुवनेश्वरम् ॥२८॥ वेवलक्षं जपेन्मन्त्रं किंशुकैस्तद्दशांशतः । हुत्वा तु पूजयेन्मन्ती विशत्यर्णं विधानतः ॥२९॥ एवं यो भजते मन्त्रं भवेद्वागीश्वरस्तु सः । अदृष्टान्यपि शास्त्राणि तस्य गंगातरंगवत् ॥३०॥ तारः कृष्णयुगं पश्चान्महाकृष्ण इतीरयेत् । सर्वज्ञ त्वंप्रशब्दांते सीदमेऽग्निश्च मारम ॥३१॥ णांते विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ ततश्च मे । त्रर्यास्त्रंशदक्षरोऽयं महाविद्याप्रदो मनुः ॥३२॥ नारदोऽस्य मुनिश्च्छन्दोऽनुष्टुप् कृष्णोऽस्य देवता । पादैः सर्वेण पंचांगं कृत्वा ध्यायेत्ततो हरिम् ॥३३॥ दिव्योद्याने विवस्वत्प्रतिममणिमयेमण्डपे योगपीठे मध्ये यः सर्ववेदांतमयसुरतरोः संनिविष्टो मुकुन्दः । वेदैः कल्पद्रुरूपैः शिखरिशतसमालंबिकोशैश्चतु- ॥३४॥ र्भिर्न्यायैस्तर्कैः पुराणैः स्मृतितिमिरविवृत्तस्तादृशैश्चामरायैः दद्यादिध्वक्षकराग्रैरवि वरमुरलीपुष्पबाणेक्षुचापा- नक्षस्पृक्पूर्णकुंभौ स्मरललितवपुर्दिव्यभूषांगरागः । व्याख्यां वामे वितन्वन् स्फुटरुचिरपदो वेणुना विश्वमात्रे ॥३५॥ शब्दब्रह्मोद्भवने श्रियमरुणरुचिर्बल्खलीवल्लभो नः लिये कृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे अपने बाँये हाथ में उत्तम विद्यापुस्तक तथा दाहिने हाथ में रुद्राक्षमाला तथा मातृकामयी स्फटिकमाला धारण किये हुए हैं ॥२२-२६॥ शब्द ब्रह्ममय वेणु को दोनों हाथों में लेकर बजा रहे हैं । गायत्री को वे जपते हैं, गीत गाते हैं और वस्त्राभूषणों से विभूषित हैं । उनका रंग साँवला है । छवि कोमल (सुन्दर) है, वे मयूरपिच्छ का मुकुट धारण किए हुए हैं, सर्वज्ञ हैं । मुनिगण उनकी सेवा करते हैं । ललनावेश उन्हें बहुत प्रिय हैं। ऐसे भुवनेश्वर का ध्यान कर चार लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश पलाश पुष्पों से हवन करे । हवनोपरान्त बीस अक्षरों वाले मन्त्र के लिये कहे हुए विधान के अनुसार पूजन करे । जो इस प्रकार मंत्र की आराधना करता है, वह वागीश्वर होता है । बिना देखे शास्त्र भी गंगातरंग की तरह उसकी जिह्वा पर लहराते हैं 'ओं कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे । रमारमण विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ मे' । (हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! हे महाकृष्ण ! आप सर्वज्ञ हैं । मुझ पर प्रसन्न होइए । हे रमारमण ! हे विद्ये- श्वर ! मुझे शीघ्र विद्या दीजिए)' यह तैंतीस अक्षरोंवाला मंत्र महाविद्या को देने वाला है । इसके मुनि नारद, छंद अनुष्टुप् और देवता कृष्ण हैं । मन्त्र के चारों चरणों और संपूर्ण मन्त्र से पंचांगन्यास कर हरि का इस तरह ध्यान करे कि रमणीय उद्यान में दिनकर किरण की तरह चमकते हुए मणिमय मंडप के भीतर योगपीठ पर संपूर्ण वेदान्तमय कल्पवृक्ष के नीचे मुकुन्द भगवान् विराजमान हैं। उन्हें अमरगण तथा कल्पद्रुम रूपी वेद, जिनकी शाखायें कोश, न्याय, पुराण एवम् स्मृतियां हैं, चारों ओर से घेरे हुए हैं, ॥२७-३४॥ स्वयं कृष्ण अपने कर कमलों में गदा, मुरली, पुष्पबाण, इक्षुचाप (ईख के धनुष) अक्षमाला तथा पूर्ण कुम्भ धारण किये हुए हैं । उनका शरीर कामदेव के समान सुललित है । वे दिव्य आभूषण तथा दिव्य अंगराग धारण करते हैं । शब्द
७३४ | नारदीयपुराणम् एवं ध्यात्वा जपेल्लक्षं दशांशं पायसैर्हुनेत् । अष्टादशार्णवत्कुर्याद्यजनं चास्य मन्त्रवित् ॥३६॥ तारो नमो भगवते नन्दपुत्राय संवदेत् । आनन्दवपुषे द्वयाहशार्ण तदनंतरम् ॥३७॥ अष्टाविंशतिवर्णोऽयं मंत्रः सर्वेष्टदायकः । नंदपुत्रपदं ज्ञेयं श्यामलांगपदं तथा ॥३८॥ तथा बालवपुःकृष्णं गोविंदं च तथा पुनः । दशार्णोऽतो भवेन्मंत्रो द्वात्रिंशदक्षरान्वितः ॥३९॥ अनयोर्नारदऋषिश्छंदस्तूष्णिगनुष्टुभौ । देवता नन्दपुत्रस्तु विनियोगोऽखिलाप्तये ॥४०॥ चक्रैः पंचांगमर्चास्यादंगदिक्पालहेतिभिः । दक्षिणे रत्नचषकं वामे सौवर्णनेत्रकम् ॥४१॥ करे दधानं देवीभ्यां श्लिष्टं संचितयेद्विभुम् । लक्षं जपो दशांशेन जुहुयात्पायसेन तु ॥४२॥ एताभ्यां सिद्धमंत्राभ्यां मंत्री कुर्याद्यथेप्सितम् । प्रणवः कमला माया नमो भगवते ततः ॥४३॥ नंदपुत्राय तत्पश्चाद्वालान्ते वपुषे पदम् । ऊनविंशतिवर्णोऽयं मुनिर्ब्रह्मा समीरिरतः ॥४४॥ छंदोऽनुष्टुप् देवता च कृष्णो बालवपुः स्वयम् । मन्त्रोऽयं सर्वसंपत्तिसिद्धये सेव्यते बुधैः ॥४५॥ तारो हृद्भगवाञ्छेतो रुक्मिणीवल्लभाय च । वह्निजायावधिः प्रोक्तो मंत्रः षोडशवर्णवान् ॥४६॥ नारदोऽस्य मुनिश्चन्दोऽनुष्टुप् च देवता मनोः । रुक्मिणीवल्लभश्चंद्रदृग्वेदांगाक्षिवर्णकैः ॥४७॥ पञ्चांगानि प्रकुर्वीत ततो ध्यायेत्सुरेश्वरम् तापिच्छच्छविरंगनां प्रियतमां स्वर्णप्रभांबुज- प्रोद्यद्धामभुजां स्ववामभुजयाश्लिष्यन्स्वचित्ताशया । श्लिष्यन्तों स्वयमन्यहस्तविलसत्सौवर्णवेत्रश्चिरं पायान्नः सुविशुद्धपीतवसनो नानाविभूषो हरिः ॥४८॥ ब्रह्म से प्रकट हुई तथा बायें हाथ में ली हुई वेणु द्वारा स्पष्ट एवम् रुचिर पद का उच्चारण करते हुए विश्व मात्र में विशद व्याख्या कर विस्तार करते हैं । उनकी अंगकान्ति अरुण वर्ण की है, ऐसे गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण हमें लक्ष्मी प्रदान करें । ऐसा ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश खीर से हवन करे । मन्त्रवेत्ता साधक अष्टादशाक्षर मन्त्र की तरह उसका भी पूजन करे । ‘ओं नमो भगवते नन्दपुत्राय आनन्दवपुषे गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' यह अट्ठाईस अक्षरों वाला मन्त्र समस्त कामनाओं को देने वाला है । 'नन्दपुत्राय श्यामलाङ्गाय बालवपुषे कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' यह मन्त्र बत्तीस अक्षरों का है । इन दोनों मन्त्रों के ऋषि नारद, छन्द क्रमशः उष्णिक् तथा अनुष्टुप्, देवता श्रीकृष्ण और विनियोग सर्व प्राप्ति के लिये किया जाता है । इनकी सिद्धि के लिये पंचांगन्यास कर अंग देवता दिक्पाल तथा आयुधों की अर्चना करे ॥३५-४०१/२॥ अनन्तर दायें हाथ में रत्नपात्र तथा बायें हाथ में सुवर्णवेत्र (लाठी) धारण करनेवाले और दो देवियों से आलिंगित किये जाने वाले विभु का ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश खीर से होमे । इन दोनों मन्त्रों के सिद्ध हो जाने पर उपासक अभिलषित फलों को प्राप्त करता है । यह उनतीस अक्षरों का मन्त्र है, इसके मुनि ब्रह्मा, छन्द अनुष्टुप् और देवता बालशरीरधारी स्वयं कृष्ण हैं। सकल ऐश्वर्यों की प्राप्ति के लिये बुधगण इनकी सेवा करते हैं ॥४१-४५॥ 'ओं नमो भगवते रुक्मिणीवल्लभाय स्वाहा' यह सोलह अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि नारद, छन्द अनुष्टुप् और देवता रुक्मिणीवल्लभ हैं । सोलह अक्षरों से पंचांगन्यास कर सुरेश्वर (कृष्ण) का इस तरह ध्यान क कि वे तमालपत्र के समान छवि वाले कृष्ण अपनी स्वर्णवर्णा प्रियतमा को, जिनकी भुजा में कमल की माला है और जो छाती से लगाकर लिपट रही है, गोद में लेकर अपनी बाँयी भुजा से आलिंगन कर रहे हैं। उनके दूसरे हाथ में सोने की यष्टिका है। वे अनेक आभूषणों से आभूषित तथा पवित्र पीतवस्त्र धारण किये हुए
एकाशीतितमोऽध्यायः ७३५ ध्यात्वैवं प्रजपेल्लक्षं रक्तैः पद्मैर्दशांशतः ॥४६॥ त्रिमध्वक्तैर्हुनेत्पीठे पूर्वोक्ते पूजयेद्धरिम् । अंगैनारदमुख्यैश्च लोकेशैश्च तदायुधैः ॥५०॥ एवं सिद्धो मनुर्दद्यात्सर्वान्कामांश्च मंत्रिणे । लीलादंडपदाम्भोजोऽपि जनसंसक्तदोः पदम् ॥५१॥ दंडांते वा धरावह्नि नरधीशोढचोऽथ लोहितः । मेघश्यामपदं पश्चाद्भगवन् सलिलं सद्क् ॥५२॥ विष्णो इत्युक्त्वा ठद्वयं स्यादेकोनत्रिंशद्वर्णवान् । नारदोऽस्य मुनिश्चंदोऽनुष्टुप् च देवता मनोः ॥५३॥ लीलादंडहरिः प्रोक्तो मन्वब्धियुगवह्नि नभिः । वेदैः पंचांगकं भांगैर्मंत्रवर्णोत्थितैः क्रमात् ॥५४॥ संमोहयंश्च निजवामकरस्थलीलादण्डेन गोपयुवतीः परसुंदरीश्च । विश्रन्निजप्रियसखांसगदक्षहस्तो देवश्रियं निहतकंस उरुक्रमो नः ॥५५॥ लक्षं जपो दशांशेन जुहुयात्तिततण्डुलैः । त्रिमध्वक्तैस्ततोऽभ्यर्चेदंगं दिक्पालहेतिभिः ॥५६॥ लीलादंडहरि यो वै भजते नित्यमादरात् । स सर्वैः पूज्यते लोकैस्तस्य गेहे स्थिरा रमा ॥५७॥ सद्यारूढा स्मृतिस्तोयं केशवाढधरायुगम् । भयाग्निवल्लभामंत्रः सप्ताणः सर्वसिद्धिदः ॥५८॥ ऋषिः स्यान्नारदश्छंदो उष्णिक्गोवेल्लभोस्य तु । देवतापूर्ववच्चक्रैः पञ्चांगानि तु कल्पयेत् ॥५९॥ ध्येयो हरिः सकपिलागणमध्यसंस्थस्ता आह्वयन्वद्धदक्षिणदोस्थ्यवेणुम् । पाशं स्रग्यष्टिमपरत्र पयोदनीलः पीताम्बराहरिपिच्छकृतावतंसः ॥६०॥ सप्तलक्षं जपेन्मंत्रं दशांशं जुहुयात्ततः । गोदुग्धैः पूजयेत्पीठं स्यादंगैः प्रथमावृतिः ॥६१॥ सुवर्णपिंगलां गौरपिंगलां रक्तपिंगलाम् । गुडपिंगां बभ्रुवर्णां चोत्तमां कपिलां तथा ॥६२॥ हैं ॥४६-४८॥ इस प्रकार ध्यान कर एक लाख मन्त्र को जपे और उसका दशांश त्रिमधुयुक्त रक्त पद्मों से हवन करे। पश्चात् पूर्वोक्त पीठ पर नारद आदि अंग देवों, लोकपालों तथा आयुधों समेत हरि की अर्चना करे। इस प्रकार मन्त्र सिद्ध होने से साधक को सकल कामनायें प्राप्त होती हैं। "लीलादंड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड वालरूप मेघश्याम भगवन् विष्णो स्वाहा" यह उन्नीस अक्षरों का मन्त्र है। इसके मुनि नारद, छन्द अनुष्टुप् और देवता लीलादण्डधारी हरि हैं। उसकी सिद्धि के लिये उन्नीसों मंत्रवर्णों से क्रमशः अंगन्यास कर इस प्रकार ध्यान करे कि कृष्ण अपने वामकरस्थ लीलादण्ड से परमसुन्दरी गोप युवतियों को मोहित कर रहे हैं। और दाहिना हाथ प्रिय मित्र के कंधे पर रख कर चल रहे हैं। उन्होंने कंस को निहत किया है। उनका पराक्रम महान् है ॥४९-५५॥ ऐसा ध्यान कर एक लाख मंत्र जप करे और उसका दशांश त्रिमधुयुक्त तिल और चावलों से हवन करे। अनन्तर अंग देवता, दिक्पाल तथा आयुधों की पूजा करे। जो व्यक्ति लीलादंडधारी हरि की नित्य आदर- पूर्वक आराधना करता है, वह सब का पूज्य होता है तथा उसके घर लक्ष्मी स्थिर होकर रहती है। सद्य (ओ), परस्थित स्मृति (ग्) अर्थात् (गो), केशव (अ) युक्त तोय (व्), ध्ररायुग (ल्ल), 'भाय', अग्निवल्लभा (स्वाहा) - यह सप्ताक्षर मंत्र सकल सिद्धियों को देने वाला है। इसके ऋषि नारद, छंद उष्णिक् और देवता गोपाल हैं। पूर्व मंत्र की तरह चक्रों से पंचांगन्यास कर ध्यान करे कि हरि गौओं के बीच अवस्थित होकर उन्हें बुला रहे हैं। जिनका वर्ण मेघ के समान नील हैं। वे पीताम्बर तथा मयूरपुच्छ का मुकुट पहने हुए हैं। दाहिने हाथ में बंशी तथा बाँये हाथ में पाश एवम् यष्टि धारण किये हुए हैं। ऐसा ध्यान कर सात लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश गोदुग्ध से हवन करे। अनन्तर पीठ पर अंगदेवताओं के साथ सुवर्णपिंगला, गौरपिंगला, रक्तपिंगला, गुडपिंगा, बभ्रुवर्णा, कपिला, चतुष्कपिंगला और पोत पिंगला- इन आठ गौओं का पूजन कर लोकपालों तथा
७३६ नारदीयपुराणम्
चतुष्कपिङ्गुलां पीतपिङ्गुलां चोत्तमां शुभाम् । गोगणाष्टकमभ्यर्च्य लोकेशानायुधैर्यतान् ॥६३॥ संपूज्यैवं मनौ सिद्धे कुर्यात्काम्यानि मंत्रवित् । अष्टोत्तरसहस्रं यः पयोभिर्दिनशो हुनेत् ॥६४॥ पक्षात्सगोगणो मुक्तो दशार्णे चाप्ययं विधिः । तारो हृद्भगवाञ् डेंतः श्रीगोविंदस्तथा भवेत् ॥६५॥ द्वादशार्णो मनुः प्रोक्तो नारदोऽस्य मुनिर्मतः । छंदः प्रोक्तं च गायत्री श्रीगोविन्दोऽस्य देवता । चन्द्राक्षियुग्भूतार्णैः सर्वैः पंचांगकल्पनम् ॥६६॥ ध्यायेत्कल्पद्रु मूलाश्रितमविकसदिव्यसिंहासनस्थं मेघश्यामंपिशंगांशुकमतिसुभगं शंखवेत्रे कराभ्याम् ॥६७॥ बिभ्राणं गोसहस्रैर्वृतममरपतिं प्रौढहस्तै ककुं प्रप्रद्योतत्सौधधारास्नपितमभिनवां भोजपत्रामनेत्रम् ॥६८॥ रविलक्षं जपेन्मंत्रं दुग्धैहुत्वा दशांशतः । यजेच्च पूर्ववद्गोष्ठस्थितं वा प्रतिमादिषु ॥६६॥ पूर्वोक्ते वैष्णवे पीठे मूर्ति संकल्प्य मूलतः । तत्रावाह्य यजेत्कृष्णं गुरुपूजनपूर्वकम् ॥७०॥ रुक्मिणीं सत्यभामां च पार्श्वयोरिद्रमग्रतः । पृष्ठतः सुरभिं चेट्ष्वा केसरेष्वंगपूजनम् ॥७१॥ कालिंद्याद्या महिष्योऽष्टौ वसुपत्रेषु संस्थिताः । पीठकोणेषु बद्धार्दिकिंकणीं च तथा पुनः ॥७२॥ दामानि पृष्ठयोर्वेणुं पुरः श्रीवत्सकौस्तुभौ । अग्रतो वनमालादिदिक्ष्वष्टसु तथा स्थिताः ॥७३॥ पांचजन्यं गदा चक्रं वसुदेवश्च देवकी । नंदगोपो यशोदा च सगोगोपालगोपिकाः ॥७४॥ इंद्राद्याश्च स्थिता बाह्ये वज्राद्याश्च ततः परम् । कुमुदः कुमुदाक्षश्च पुंडरीकोऽथ वामनः ॥७५॥ शंकुकर्णः सर्वनेत्रः सुमुखः सुप्रतिष्ठितः । विष्वक्सेनश्च संपूज्यः स्वात्मा चार्च्यस्ततः परम् ॥७६॥
उनके आयुधों की अर्चना करे। इस तरह पूजन आदि से मन्त्र को सिद्ध कर लेने पर मन्त्रवेत्ता उसके द्वारा कामनापूर्ति के लिये प्रयोग करे ॥५६-६३३॥ जो व्यक्ति (इस मन्त्र को पढ़ते हुए) दूध से एक हजार आठ बार हवन करता है, वह स्वयं तथा गौओं सहित अपने को यक्ष के उपद्रव से बचा लेता है। दशाक्षर मन्त्र में भी यही विधि है। 'ओं नमो भगवते श्रीगोविंदाय' यह द्वादशाक्षर मंत्र है। इसके मुनि नारद, छन्द गायत्री और देवता श्री गोविन्द हैं। मन्त्र के बारहों अक्षरों से पंचांगन्यास कर ध्यान करे कि सुरपति कृष्ण कल्पद्रुम के नीचे मणिमय दिव्य सिंहासन पर आसीन हैं। उनका वर्ण मेघ के समान श्याम है। वे पीताम्बर पहने हुए हैं। हाथों में शंख तथा बेंत लिए हुए हैं। हजारों गौओं से घिरे हैं। देखने में सलोने हैं। उनके नेत्र नवीन कमलदल के समान हैं। प्रौढ़ गोपियां सुधाधारा से उनका स्नपन करा रही हैं। ऐसा ध्यान कर बारह लाख मन्त्र को जपे और उसका दशांश दूध से हवन करे। पश्चात् गोष्ठस्थित प्रतिमा आदि में कृष्ण की पूजा करनी चाहिये ॥६४-६९॥ पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की स्थापना कर उसमें कृष्ण का आवाहन करके पूजा करे। परन्तु कृष्ण पूजा के पहिले ही गुरुपूजा कर लेनी चाहिये। कृष्ण के दोनों पावों में रुक्मिणी तथा सत्यभामा की, सामने इन्द्र को और पृष्ठ भाग में सुरभि (गाय) की पूजा कर केसरों पर अंग देवों का पूजन करे। पुनः आठ दलों में कालिंदी आदि आठ राज महिषियों की अर्चना करे। पश्चात् पीठ के चतुर्दिक् कोणों में आभूषणबद्ध किंकणियों, पृष्ठभाग में मालाओं, अग्रभाग में श्रीवत्सचिह्न तथ कौस्तुभमणि की पूजा कर आठों दिशाओं में वनमाला आदि का पूजन करे। बाह्य देश में पांचजन्य (शंख), गदा, चक्र, वसुदेव, देवकी, नन्दगोप, यशोदा, गोप-गोपियों, इन्द्र आदि देवों, वज्र आदि आयुधों, कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शंकुकर्ण, सर्वनेत्र, सुमुख, सुप्रतिष्ठित, तथा विष्वक्सेन की अर्चा कर अपनी आत्मा का पूजन करे। जो व्यक्ति एक काल या
एकाशीतितमोऽध्यायः ७३७ एककालं त्रिकालं वा यो गोविन्दं यजेन्नरः । स चिरायुर्निर्रातङ्को धनधान्यपतिर्भवेत् ॥७७॥ स्मृतिः सद्यान्विता चक्री दक्षकर्णयुतोधरा । नाथाय हृदयांतोऽयं वसुवर्णो महामनुः ॥७८॥ मुनिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदः कृष्णोऽस्य देवता । वर्णद्वंदैश्च सर्वेण पंचांगन्यासस्य कल्पयेत् ॥७९॥ पंचवर्षमतिलोलमंगणे धावमानमतिचंचलेक्षणम् । किंकिणीवलयहारनूपुरै रंजितं नमत गोपबालकम् ॥८०॥ एवं ध्यात्वा जपेदष्टलक्षं मंत्री दशांश । ब्रह्मवृक्षसमिद्भिम्श्च जुहुयात्पायसेन वा ॥८१॥ प्रागुक्ते वैष्णवे पीठे मतिं संकल्प्य मूलतः । तत्रावाह्यार्चयेत्कृष्णं मंत्री वै स्थिरमानसः ॥८२॥ केसरेषु चतुर्दिक्षु विविक्ष्वांगानि पूजयेत् । वासुदेवं बलं दिक्षु प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ॥८३॥ विदिक्षु रुक्मिणीसत्यभामे वै लक्ष्मणसंज्ञे । लोकेशांस्तायुधान्बाह्ये एवं सिद्धो भवेन्मनुः ॥८४॥ तारः श्रीभुवनाकाबो ङेन्तं श्रीकृष्णमीरयेत् । श्रीगोविंदं ततः प्रोच्य गोपीजनपदं ततः ॥८५॥ वल्लभाय ततः पद्मात्रयं तत्त्वाक्षरो मनुः । मुन्यादिकं च पूर्वोक्तं सिद्धगोपालकं स्मरेत् ॥८६॥ माधवीमंडपासीनौ गरुडेनाभिपालतौ । दिव्यक्रीडासु निरतौ रामकृष्णौ स्मरन् जपेत् ॥८७॥ पुजनं पूर्ववच्चास्य कर्तव्यं वैष्णवोत्तमैः । चक्री मुनिस्वरोपेतः सर्गी चैकाक्षरो मनुः ॥८८॥ कृष्णेति द्वयक्षरः प्रोक्तः कामादिः स्यात्त्रिवर्णकः । सैव ङेन्तो युगार्णः स्यात्कृष्णाय नम इत्यपि ॥८९॥ पंचाक्षरश्च कृष्णाय कामरुद्धस्तथा परः । गोपालायाग्निजायांतो रसवर्णः प्रकीर्तितः ॥९०॥ कामः कृष्णपदं ङन्तं वह्निजायांतकः परः । कृष्णगोविंदकौ ङन्तौ सप्तार्णः सर्वसिद्धिदः ॥९१॥
त्रिकाल गोविन्द की पूजा करता है, वह चिरायु, सुखी तथा धन-धान्यों का अधिपति होता है ॥७७-७७॥ सद्य (अ), सहित स्मृति (ग्) अर्थात् 'गो' दक्षिण कर्ण (उ) युक्त चक्री (क्) अर्थात् 'कु', धरा (ल) इन अक्षरों के पश्चात् 'नाथाय' पद और अन्त में हृदय (नमः) यह- 'गोकुलनाथाय नमः' महामन्त्र आठ अक्षरों का है । इसके मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री ओर देवता कृष्ण हैं। मंत्र के अष्टाक्षरों से पंचांगन्यास कर ध्यान करे कि कृष्ण पांच वर्षों के अत्यंत चंचल बालक हैं। वे आंगन में इधर-उधर दौड़ रहे हैं। उनकी आँखें अति चपल हैं। किंकिणी, वलय, नूपुर तथा हार से उनका शरीर सुशोभित है । ऐसे गोपबालक को नमस्कार करो । साधक इस तरह ध्यान कर आठ लाख मन्त्र को जपे और उसका दशांश पलाश की समिधाओं से या पायस से हवन करे। पश्चात् पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति की स्थापना कर उसमें स्थिर चित्त से कृष्ण का आवाहनपूर्वक पूजन करे। फिर दिशा-विदिशाओं में केसरों पर अंग देवताओं की पूजा करनी चाहिये। दिशाओं में वासुदेव तथा बलराम की, विदिशाओं में प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध की और बाह्य प्रदेश में रुक्मिणी, सत्यभामा, लक्ष्मणा, जांबवती, लोकपालों तथा आयुधों की अर्चना करे। ऐसा करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है ॥७८-८४॥ तार (ॐ), श्री (श्रीं), भुवना (ह्रीं), काम (क्लीं) ङे विभक्तयन्त श्रीकृष्ण शब्द अर्थात् 'श्रीकृष्णाय' ऐसा ही गोविन्द पद (गोविन्दाय), फिर 'गोपीजनवल्लभाय' तत्पश्चात् तीन पद्मा (श्रीं श्रीं श्रीं) - यह (ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय श्रीं श्रीं श्रीं) तेईस अक्षरों का मन्त्र हैं। इसके मुनि आदि पूर्व मन्त्र को ही तरह समझना चाहिये। इसकी सिद्धि के लिये सिद्ध गोपाल का स्मरण करना चाहिये। पुनः माधवी लता के बने मण्डप में आसीन, गरुड़ द्वारा सुसेवित, दिव्य क्रीड़ा करने में निरत राम और कृष्ण का ध्यान करे। उत्तम विष्णुभक्त इस मन्त्र का पूजन पूर्ववत् ही करे। "चक्री (क्) आठवें स्वर (ऋ) से युक्त हो और उसके साथ विसर्ग भी हो तो 'कृः' यह एकाक्षर मन्त्र हो है। 'कृष्ण' यह दो अक्षरों का मन्त्र है। इसके आदि में क्लीं फा० १३
७३८ नारदीयपुराणम् श्रीशक्तिकामाः कृष्णाय कामः सप्ताक्षरः परः । कृष्णगोविंदकौ डेंतौ हृदंतोऽन्यो नवाक्षरः ॥८२॥ डेंतौ च कृष्णगोविंदौ तथाः कामः पुटः परः । कामः शाङ्गी धरासंस्थो मन्द्रिद्वादशश्च मन्मथः ॥८३॥ श्यामलांगाय हृदयं दशार्णः सर्वसिद्धिदः । बालांते वपुषे कृष्णायवह्निजायांतमोऽपरः ॥८४॥ द्वितांते बालवपुषे कामः कृष्णाय संवदेत् । ततो ध्यायन्स्वहृदये गोपीजनमनोहरम् ॥८५॥ श्रीवृन्दावनप्रतोलिषु नमत्संकुल्लवल्लीततिष्वंतर्जालविघट्टनैः सुरभिना वातेन संसेविते । कालिंदीपुलिने विहारिणमथो राधेकजीवातुकं वंदे नन्दकिशोरमिन्दुवदनं स्निग्धांबुडाडंबरम् ॥८६॥ पूर्वोक्तवर्त्मना पूजा ज्ञेयाह्येषां मुनीश्वर । देवकीसूतवर्णांते गोविन्दपदमुच्चरेत् ॥८७॥ वासुदेवपदं प्रोच्य संबुद्धयंतं जगत्पतिम् । देहि मे तनयं पश्चात्कृष्ण त्वामहमीरयेत् ॥८८॥ शरणं गत इत्यंतो मंत्रो द्वात्रिंशदक्षरः । नारदोऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री वाप्यनुष्टुभम् । ॥८६॥ देवः सुतप्रदः कृष्णः पादैः सर्वेण चांगकम् विजयेन युतो रथस्थितः प्रसभानीय समुद्रमध्यतः । प्रददत्तनयान् द्विजन्मने स्मरणीयो वसुदेवनन्दनः ॥१००॥ लक्षं जपोऽयुतं होमस्तिलैर्मधुरसंप्लुतैः । अर्चा पूर्वोदिते पीठे अंगलोकेश्वरायुधैः ॥१०१॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्री वंध्यायामपि पुत्रवान् । तारो माया ततः सांत संदुष्वांतश्च सर्ववान् ॥१०२॥ जोड़ने पर 'क्लीं कृष्ण' यह तीन अक्षरों का मन्त्र बनता है । वही ङे विभक्त्यन्त होने पर चार अक्षरों का 'क्लीं कृष्णाय' मन्त्र होता है । 'कृष्णाय नमः' यह पंचाक्षर मन्त्र है । 'क्लीं' संपुटित कृष्ण पद भी अपर पंचाक्षर मन्त्र है । यथा-क्लीं कृष्णाय क्लीं । 'गोपालाय स्वाहा' यह षडक्षर मन्त्र कहा गया है। 'क्लीं कृष्णाय स्वाहा' यह भी दूसरा षडक्षर मन्त्र है। 'कृष्णाय गोविन्दाय' यह सप्ताक्षर मन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाला है। श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय क्लीं यह दूसरा सप्ताक्षर मन्त्र है। 'कृष्णाय गोविन्दाय नमः' यह दूसरा नवाक्षर मन्त्र है । 'क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय क्लीं' यह भी इतर नवाक्षर मन्त्र है। 'क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलाङ्गाय नमः' यह दशाक्षर संपूर्ण सिद्धियों को देने वाला है। 'बालवपुषे कृष्णाय स्वाहा' यह दूसरादशाक्षर मन्त्र है । 'बालवपुषे क्लीं कृष्णाय स्वाहा' यह एकादशाक्षर मन्त्र है । तदनन्तर गोपीजन मनोहर श्रीकृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे कालिन्दी के तट पर विहार करते हैं, जहाँ वृन्दावन की प्रतोलियों (ग्राममध्यमार्ग) पर गिरती हुई प्रफुल्लित लताओं के आभ्यन्तर जाल को तितर-बितर करते हुए सुगन्धित वायु बह रहा है। उनका मुख इन्द्र के समान है वर्ण सघनघन के सदृश है, वे राधा के एक मात्र प्राण हैं। मुनीश्वर ! ऐसा ध्यान कर पूर्वोक्त रीति से पूजा करनी चाहिये । "देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ! देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः" । यह बत्तीस अक्षरों का मन्त्र है ॥८५-९८३॥ इसके मुनि नारद, छन्द गायत्री तथा अनुष्टुप् और देवता पुत्र देने वाले कृष्ण हैं । मन्त्राक्षरों से अंगन्यास कर ध्यान करे कि वसुदेवपुत्र विजयी हैं, रथ पर अवस्थित हैं। वे समुद्र के बीच से लाकर ब्राह्मण के मरे पुत्र को उन्हें वापस दे रहे हैं, उनका स्मरण करना चाहिये ऐसा ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और दश हजार त्रिमधुयुक्त तिलों से हवन करे। पश्चात् पूर्वोक्त पीठ पर अंग देवताओं, लोक- पालों तथा आयुधों की पूजा करनी चाहिये । इस तरह मन्त्र की सिद्धि हो जाने से साधक को वन्ध्या स्त्री से भी पुत्र हो सकता है ॥९९-१०१३॥
एकाशीतितमोऽध्यायः ७३६ सोऽहं वह्निप्रियांतोऽयं मंत्रो वस्वक्षरः परः । पंचब्रह्मात्मकस्यास्य मंत्रस्य मुनिसत्तमः ॥१०३॥ ऋषिर्ब्रह्मा च परमा गायत्री छंद ईरितम् । परं ज्योतिः परं ब्रह्म देवता परिकीर्तितम् ॥१०४॥ प्रणवो बीजमाख्यातं स्वाहा शक्तिरुदाहृता । स्वाहेति हृदयं प्रोक्तं सोऽहं वेति शिरो मतम् ॥१०५॥ हंसश्चेति शिखा प्रोक्ता हृल्लेखा कवचं स्मृतम् । प्रणवो नेत्रमाख्यातमस्त्रं हरिहरेति च ॥१०६॥ स ब्रह्मा स शिवो विप्र स हरिः सैव देवराट् । स सर्वरूपः सर्वाख्यः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥१०७॥ एवं ध्यात्वा जपेदष्टलक्षहोमो दशांशतः । पूजाप्रणवपीठेऽस्य सांगावरणकैर्मता ॥१०८॥ एवं सिद्धे मनौ ज्ञानं साधकेंद्रस्य नारद । जायते तत्त्वमस्यादिवाक्योक्तं निर्विकल्पकम् ॥१०८॥ कामो ङेंतो हृषीकेशो हृदयांतो गजाक्षरः । ऋषिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदो गायत्रमीरितम् ॥११०॥ देवता तु हृषीकेशो विनियोगोऽखिलाप्तये । कामो बीजं तथायेति शक्तिरस्य ह्युदाहृता ॥१११॥ बीजेनैव षडंगानि कृत्वा ध्यानं समाचरेत् । पुरुषोत्तममंत्रोक्तं सर्वं वास्य प्रकीर्तितम् ॥११२॥ लक्षं जपोऽयुतं होमो घृतेनैव प्रकीर्तितः । तर्पणं सर्वकामाप्त्यै प्रोक्तं संमोहिनीसुमैः ॥११३॥ श्रीबीजं च चतुर्थ्यन्तः श्रीधरो ङैंतकस्तथा । त्रैलोक्यमोहनः शब्दो नमोऽन्तो मनुरीरितः ॥११४॥ ऋषिर्ब्रह्मा च गायत्री छन्दः श्रीधरदेवता । श्रीबीजं शक्तिरापेति बीजेनैव षडंगकम् ॥११५॥ पुरुषोत्तमवद्ध्यानपूजादिकमिहोदितः । लक्षं जपस्तथा होम आज्येनैव दशांशतः ॥११६॥ सुगंधश्वेतपुष्पैस्तु पूजां होमादिकं चरेत् । एवं कृते तु विप्रेन्द्र साक्षात्स्याच्छ्रीधरः स्वयम् ॥११७॥ अच्युतानन्तगोविंदपदं ङैंतं नमोतिमम् । मंत्रोऽस्य शौनकऋषिर्विराट् छंदः प्रकीर्तितम् ॥११८॥ 'ओं ह्रीं हंसः सोऽहं स्वाहा' यह दूसरा अष्टाक्षर मंत्र है । इस पंचब्रह्मात्मक मंत्र के मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता परं ज्योति परब्रह्म, बीज प्रणव और शक्ति स्वाहा है । स्वाहा हृदयाय नमः । सोहं शिरसे स्वाहा । हंसः शिखायै वषट् । हृल्लेखा कवचाय हुम् । ओं नेत्राभ्यां वौषट् । 'हरिहर' अस्त्राय फट् । इस प्रकार अंगन्यास करे (वही कृष्ण) ब्रह्मा हैं, वही शिव हैं, वही हरि और वही इन्द्र हैं। वहीं सर्वरूप हैं तथा सब नाम उन्हीं के हैं। वही स्वयं प्रकाशमान अविनाशी परमात्मा हैं—ऐसा ध्यान कर आठ लाख मंत्र को जपे और उसका दशांश हवन करे । अनन्तर प्रणवपीठ पर अंगदेवताओं के साथ कृष्ण का पूजन करे । नारद ! ज्ञानी साधक इस तरह मंत्र को सिद्ध कर 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योक्त निर्विकल्प ज्ञान को प्राप्त करता है । 'क्लीं हृषीकेशाय नमः' यह अष्टाक्षर मंत्र है । इसके मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री और देवता हृषीकेश हैं । सर्वप्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है ॥१०२-११०॥ 'क्लीं' इसका बीज तथा 'आय' शक्ति कही गई है । बीजमंत्र से षडंगन्यास कर ध्यान करे । अथवा पुरुषोत्तम मंत्र के लिए कही हुई सब बातें इसके लिए भी समझनी चाहिये । अनन्तर एक लाख मंत्र जप कर दश हजार घी से हवन करे । समस्त कामनाओं की प्राप्ति के लिये (इस मंत्र को पढ़ कर) कर्पूरमिश्रित जल से तर्पण करना चाहिये । 'श्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः' यह चौदह अक्षरों का मंत्र है। इसके ऋषि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता श्रीधर, बीज श्री और शक्ति 'आय' है । बीज से ही षडंगन्यास कर पुरुषोत्तम मन्त्र की तरह ध्यान-पूजन आदि करना चाहिये । अनन्तर एक लाख मंत्र-जप करके उसका दशांश घी से हवन करे । पुनः सुगंधित श्वेत पुष्पों से पूजा, होम आदि करे। विप्रेन्द्र ! जो इस तरह करता है, वह साक्षात् श्रीधर होता है । "अच्युतानन्तगोविन्दाय नमः" यह एक मंत्र है । अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नमः--ये तीन
७४० नारदीयपुराणम् एषां पराशरव्यासनारदा ऋषयः स्मृताः । विराट् छन्दः समाख्यातं परब्रह्मात्मको हरिः ॥११९॥ देवताबीजशक्ती तु पूर्वोक्ते साधकैर्मते । शंखचक्रधरं देवं चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥१२०॥ सर्वैरप्यायुधैर्युक्तं गरुडोपरि संस्थितम् । सनकादिमुनीन्द्रैस्तु सर्वदेवैरुपासितम् ॥१२१॥ श्रीभूमिसहितं देवमुदयादित्यसन्निभम् । प्रातरुद्यत्सहस्रांशुमंडलोपमकुंडलम् ॥१२२॥ सर्वलोकस्य रक्षार्थमनन्तं नित्यमेव हि । अभयं वरदं देवं प्रयच्छंतं मुदान्वितम् ॥१२३॥ एवं ध्यात्वार्चयेत्पीठे वैष्णवे सुसमाहितः । आद्यावरणसंगैः स्याच्चक्रशंखगदासिभिः ॥१२४॥ मुशलाढ्यधनुःपाशांकुशैः प्रोक्तं द्वितीयकम् । सनकादिकशाक्तेयव्यास नारदशौनकैः ॥१२५॥ तृतीयं लोकपालैस्तु चतुर्थं परिकीर्तितम् । लक्षं जपो दशांशेन घृतेन हवनं स्मृतम् ॥१२६॥ एवं सिद्ध मनो मंत्री प्रयोगानथुपाचरेत् । धीवृक्षमूले देवेशं ध्यायन्वै रोगिणं स्मरन् ॥१२७॥ स्पृष्ट्वा जप्त्वायुतं साध्यं स्मृत्वा वा मनसा द्विज । रोगिणं रोगनिर्मुक्ति कुर्यान्मंत्री तु मंडलात् ॥१२८॥ कन्यार्थी जुहुयाल्लाजैर्बिल्वैश्चापि धनार्थये । वस्त्रार्थी गन्धकुसुमैरारोग्याय तिलैर्हुनेत् ॥१२९॥ रविवारे जले स्थित्वा नाभिमात्रे जपेत्तु यः । अष्टोत्तरसहस्रं वै सज्ज्वरं नाशयेद् ध्रुवम् ॥१३०॥ विवाहार्थं जपेन्मासं शशीमण्डलमध्यगम् । ध्यात्वा कृष्णं लभेतकन्यां वांच्छितां चापि नारद ॥१३१॥ वसुदेवपदं प्रोच्य निगड़च्छेदशब्दतः । वासुदेवाय वर्मान्ते स्वाहांतो मनुरिरितः ॥१३२॥ त्र हैं । प्रथम के शौनक ऋषि तथा विराट् छन्द है । शेष तीन मंत्रों के पराशर, व्यास तथा नारद ऋषि हैं, विराट् छंद है और देवता परब्रह्मात्मक हरि हैं । बीज और शक्ति तो पूर्व मंत्र की ही तरह समझनी चाहिये ॥११९-११९३॥ इसकी सिद्धि के लिए कृष्ण का इस तरह ध्यान करे कि उनकी चार भुजायें हैं । चारों में शंख, चक्र आदि विद्यमान हैं । वे मुकुट तथा समस्त आयुधों को धारण किये हुए हैं । गरुड़ पर आसीन हैं । सनकादि मुनि- गण तथा देववृन्द उनकी उपासना कर रहे हैं । लक्ष्मी उनके साथ हैं । उदयकालीन सूर्य के समान उनकी कान्ति है । प्रातःकालीन सहस्र दिनकरों के तुल्य चमकने वाले उनके कुंडल हैं । वे समस्त लोकों के रक्षक, अनन्त तथा नित्य हैं । वे प्रसन्नता से भक्तों को अभयदान एवम् वरदान देते हैं । इस प्रकार ध्यान कर समाहित चित्त से वैष्णव पीठ पर भगवान् का पूर्ववत् पूजन करे । इनका प्रथम आवरण अंगों द्वारा सम्पन्न होता है । चक्र, शंख, गदा, खड्ग, मुसल, धनुष, पाश तथा अंकुश-इनसे द्वितीय आवरण बनता है । सनक आदि चार महात्मा पराशर, व्यास, नारद तथा शौनक से तृतीय आवरण बनता है । लोकपालों द्वारा चौथा आवरण पूरा होता है । (पांचवें आवरण में वज्र आदि आयुधों की पूजा होती है ।) इस मंत्र का एक लाख जप और घृत से दशांश हवन किया जाता है । मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधक उसका प्रयोग करे ॥१२०-१२६३॥ बिल्ववृक्ष के नीचे देवेश का ध्यान कर रोगी का स्पर्श या स्मरण करके दश हजार मंत्र-जप करे । ऐसा करने से रोगी का रोग तत्काल दूर हो जाता है । जो कन्या की इच्छा करता है, वह लावे से हवन करे । धनार्थी विल्व- फलों से, वस्त्रार्थी सुगंधित पुष्पों से और आरोग्य चाहने वाला व्यक्ति तिलों से हवन करे । जो व्यक्ति रविवार को नाभिमात्र जल में खड़ा होकर एक सो आठ बार इस मंत्र को जपेगा, वह निःसंदेह ज्वर को छुड़ा देगा । नारद ! जो व्यक्ति विवाह की अभिलाषा करता है, वह चन्द्रमंडल के मध्यगामी कृष्ण का ध्यान कर एक मास तक इस मंत्र का जप करे । ऐसा करने से मनोवांछित कन्या उसे मिलती है । इस मंत्र के ऋषि नारद, छंद
एकाशीतितमोऽध्यायः ७४१ नारदोऽस्य ऋषिश्च्छन्दो गायत्री कृष्णदेवता । वम्र्म बीजं शिरः शक्तिरन्यत्सर्वं दशाणंवत् ॥१३३॥ बालः पवनदीर्घेन्दुयुक्तो झिटीशयुर्जलम् । अत्रिव्यासाय हृदयं मनुरष्टाक्षरोऽवतु ॥१३४॥ ब्रह्मानुष्टुप्मुनिश्च्छन्दो देवः सत्यवतीसुतः । आद्यं बीजं नमः शक्तिर्दीर्घाढ्यो नाविनांगकम् ॥१३५॥ व्याख्यामुद्रिकया लसत्करतलं सद्योगपीठस्थितं वामे जानुतले दधानमपरं हस्तं सुविद्यानिधिम् । विप्रव्रातवृतं प्रसन्नवदनं पाथोहद्युतिं पाराशर्यमतीव पुण्यचरितं व्यासं स्मरेत्सिद्धये ॥१३६॥ जपेदष्टसहस्राणि पायसैर्होममाचरेत् । पूर्वोक्तपीठे व्यासस्य पूर्वमंगानि पूजयेत् ॥१३७॥ प्राच्यादिषु यजेत्पैलं वैशंपायनजैमिनी । सुमंतुं कोणभागेषु श्रीशुकं रोमहर्षणम् ॥१३८॥ उग्रश्रवसमन्यांश्च मुनीन्सेंद्रादिकायुधान् । एवं सिद्धमनुर्मंत्री कवित्वं शोभनाः प्रजाः १३६॥ व्याख्यानशक्तिं कीर्तिं च लभते संपदां चयम् । नृसिंहो माधवो दृष्टो लोहितो निगमादिमः ॥१४०॥ कृशानुजाया पञ्चार्णो मनुर्विषहरः परः । अनंतपंक्तिपक्षीन्द्रा मुनिश्च्छन्दःसुरा मताः ॥१४१॥ तारवह्निप्रिये बीजशक्ती मन्त्रस्य कीर्तिते । ज्वल ज्वल महामंत्रो स्वाहा हृदयमीरितम् ॥१४२॥ गरुडेति पदस्यांते चूडाननशुचिप्रिया । शिरोमन्त्रो गरुडतः शिखे स्वाहा शिखा मनुः ॥१४३॥ गरुडेति पदं प्रोच्य प्रभंजययुगं वदेत् । प्रभेदययुगं पश्चाद्वित्रासय विमर्दय ॥१४४॥ प्रत्येकं द्विरतस्तः स्वाहा कवचस्य मनुर्मतः । उग्ररूपधरांते तु सर्वविषहरेति च ॥१४५॥ गायत्री, देवता कृष्ण, बीज कवच और शक्ति शिर है। दशाक्षर मंत्र की तरह इसको भी सारी क्रियायें करनी चाहिये ॥१२७-१३३॥ बाल (व्) पवन (य्) ये दोनों अक्षर दीर्घ आकार और अनुस्वार से युक्त हों और झिटीश (एकार) से युक्त जल (व्) हो, तत्पश्चात् अत्रि अर्थात् दकार हो और उसके बाद 'व्यासाय' पद के अन्त में हृदय (नमः) का प्रयोग हो तो यह (व्यां वेदव्यासाय नमः) अष्टाक्षर मंत्र बनता है। यह सबकी रक्षा करे। इसके मुनि ब्रह्मा, छंद अनुष्टुप्, देवता व्यास, बीज व्यां और शक्ति नमः है। दीर्घमात्रायुक्त बीजाक्षर (व्यां व्यीं व्यूं व्यै व्यौं व्यः) अंगन्यास कर मंत्रसिद्धि के लिये व्यास का ध्यान करे कि वे योगपीठ पर अवस्थित हैं। उनका एक हाथ व्याख्यामुद्रा से सुशोभित है। दूसरा हाथ बायें ठेहुने पर रखा हुआ है। वे सद्विद्या की निधि कहलाते हैं। ब्राह्मणों के समस्त व्रतों का आचरण करते हैं। उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता है। उनके अंगों की कान्ति कमल के समान है। उनका चरित्र पवित्र है। वे पराशर के पुत्र हैं। ऐसा ध्यान कर आठ हजार जप करे और (उसका दशांश) खीर से होमे। पूर्वोक्तपीठ पर पहिले व्यास के अंगों का पूजन करे। पश्चात् पूर्व आदि दिशा में पैल, वैशंपायन तथा जैमिनि की और (अग्नि आदि) कोणों में श्रीशुक, रोमहर्षण, उग्रश्रवा, अन्यमुनिगण तथा आयुध सहित इन्द्र आदि देवों की अर्चना करे। इस प्रकार मंत्रसिद्धि हो जाने पर साधक को कवित्वशक्ति, व्याख्यानशक्ति, सुन्दर प्रजा, कीर्ति तथा सम्पत्ति की प्राप्ति होती है ॥१३४-१३९३॥ “नृसिंह स्वाहा” यह पंचाक्षर मन्त्र विषशमन करने वाला है। इसके मुनि अनंत, छंद पंक्ति, देवता गरुड, बीज ओं और शक्ति स्वाहा है। “ज्वल ज्वल महामंत्रो स्वाहा” यह हृदयमन्त्र है। “गरुड़ चूडानन शुचिप्रिया” यह शिरोमंत्र है। “गरुडतः शिखे स्वाहा” यह शिखामन्त्र है। “गरुड प्रभंजय युगम् प्रभेदय युगम् वित्रासय वित्रासय विमर्दय विमर्दय स्वाहा” यह कवच मन्त्र है। “उग्ररूपधर सर्वविषहर भीषण द्वितयम् सर्वम् दह-दह भस्मी कुरु स्वाहा” यह नेत्रमन्त्र है। “अप्रतिहतबलाय प्रहृते शासनाय हुँ फट् स्वाहा” यह अस्त्र मन्त्र है। गरुडमन्त्र
७४२ नारदीयपुराणम् भीषणद्वितयं प्रोच्य सर्वं दहवहेति च । भस्मीकुरु ततः स्वाहा नेत्रमन्त्रोऽयमीरितः ॥१४६॥ अप्रतिहतवर्णांते बलाय प्रहतेति च । शासनांते तथा हुं फट् स्वाहास्त्रमनुरीरितः ॥१४७॥ पादे कटौ हृदि मुखे मूर्ध्नि वर्णान्प्रविन्यसेत् ॥१४८॥ तप्तस्वर्णनिभं फणींद्रनिकरैःक्लृप्तांगभूषं प्रभुं स्मर्तॄणां शमयन्तमुग्रमखिलं नृणां विषं तत्क्षणात् । चंच्वग्रप्रचलद्भुजंगमभयं पाण्योर्वरं बिभ्रतं पक्षोच्चारितसामगीतममलं श्रीपक्षिराजं भजे ॥१४९॥ पञ्चलक्षं जपेन्मंत्रं दशांशं जुहुयात्तिलैः । पूजयेन्मातृकापीठे गरुडं वेदविग्रहम् ॥१५०॥ चतुर्थ्यन्तः पक्षिराजः स्वाहा पीठ मनुः स्मृतः । इष्ट्वांगं कर्णिकामध्ये नागान्यंत्रेषु पूजयेत् ॥१५१॥ तद्बहिर्लोकपालांश्च वज्राद्यैर्विलसत्करान् । एवं सिद्धमनुर्मंत्री नाशयेद्गरलद्वयम् । देहांते लभते चापश्रीविष्णोः परमं पदम् ॥१५२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे कृष्णादिमन्त्रभेदनिरूपणं नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥८१॥
की सिद्धि के लिये चरण, कटि, हृदय, मुख तथा मस्तक पर मन्त्रवर्णों का न्यास कर ध्यान करे कि तप्त सुवर्ण के समान गरुड़ की कान्ति है। सर्पों के कृत्रिम आभूषणों से उनके अंगों की अपूर्व शोभा हो रही है। वे अपने स्मरण करने वाले मनुष्यों के विष को तत्क्षण दूर कर देते हैं ॥१४०-१४८½॥ अपने चंगुलों में बड़े-बड़े भयानक सर्पों को फँसा कर चोंच से उन्हें क्षतविक्षत कर रहे हैं। पंखों से सामगान कर रहे हैं। ऐसे पक्षिराज को नमस्कार है। इस तरह ध्यान कर पाँच लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश तिल से हवन करे। "पक्षिराजाय स्वाहा" यह हवन का मन्त्र है । तदनन्तर मातृकापीठ पर वेदमूर्ति गरुड़ का पूजन करे। केसरों पर अङ्गदेवों तथा यंत्रों पर नागों की पूजा कर बाहर वज्र आदि आयुधों समेत लोकपालों की पूजा करे। इस तरह मन्त्र, सिद्ध हो जाने से मन्त्री को विष दूर करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है और वह देहान्त होने पर विष्णुलोक को जाता है ॥१४९-१५२॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में कृष्णादिमन्त्रभेदनिरूपण नामक इक्यासीवां अध्याय समाप्त ॥८१॥
द्व्यशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच किं त्वं नारद जानासि पूर्वजन्मनि यत्त्वया । प्राप्तं भगवतः साक्षाच्छूलिनो युगलात्मकम् कृष्णमंतररहस्यं च स्मर विस्मृतिमागतम् । ॥१॥ सूत उवाच ॥२॥ इत्युक्तो नारदो विप्राः कुमारेण तु धीमता ध्याने विवेशाशु चिरं चरितं पूर्वजन्मनः । ततश्चिरं ध्यानपरो नारदो भगवत्प्रियः ॥३॥ ज्ञात्वा सर्वं सुवृत्तांतं सुप्रसन्नाननोऽब्रवीत् । भगवन्सर्ववृत्तांतः पूर्वकल्पसमुद्भवः ॥४॥ मम स्मृतिमनुप्राप्तो विना युगललंभनम् । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य महात्मनः ॥५॥ सनत्कुमारो भगवान् व्याजहार यथातथम् । शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि यस्मिञ्जन्मनि शूलिनः ॥६॥ सनत्कुमार उवाच प्राप्तं कृष्णरहस्यं वै सावधानो भवाधुना । अस्मात्सारस्वतत्कल्पात्पूर्वस्मिन्पंचविंशके ॥७॥ कल्पे त्वं काश्यपो जातो नारदो नाम नामतः । तत्रैकदा त्वं कैलासं प्राप्तः कृष्णस्य योगिनः ॥८॥ संप्रष्टुं परमं तत्त्वं शिवं कैलासवासिनम् । त्वया पृष्टो महादेवो रहस्यं स्वप्रकाशितम् ॥६॥ कथयामास तत्त्वेन नित्यलीलांनुगं हरेः । ततस्तदन्ते तु पुनस्त्वया विज्ञापितो हरः ॥१०॥ अध्याय ८२ राधाकृष्ण-सहस्र-नाम-स्तोत्र सनत्कुमार बोले- नारद ! क्या तुम जानते हो कि पूर्वजन्म में तुमने साक्षात् भगवान् शङ्कर से युगल नाम वाले कृष्णमन्त्र के रहस्य को प्राप्त किया था। यदि विस्मृत हो गया हो तो स्मरण करो ॥१३॥ सूत बोले- विप्रवृन्द ! धीमान् सनत्कुमार के यह कहने पर नारद ने शीघ्र ही अपने पूर्वजन्म के चरित्र का ध्यान किया। चिरकाल तक ध्यानपरायण होने के उपरान्त भगवत्प्रिय नारद समस्त वृत्तान्त को जानकर सुप्रसन्न मुख से बोले- 'भगवन् ! पूर्व कल्प का सारा वृत्तान्त तो मुझे मालूम हो गया, परन्तु युगल मन्त्र का स्मरण नहीं हो सका ।' महात्मा नारद की यह बात सुनकर भगवान् सनत्कुमार यथार्थतः सब बातें बताने लगे ॥२-५३॥ सनत्कुमार बोले- विप्र ! जिस जन्म में तुमने कृष्ण के रहस्य को प्राप्त किया था, वह अभी मैं बता देता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। इस सारस्वत कल्प से पहिले पचीसवें कल्प में तुम कश्यप के पुत्र हुए थे, तुम्हारा नाम नारद था। एक समय तुम कैलासवासी शिव से योगी कृष्ण के परम तत्त्व को पूछने के लिये कैलास पर्वत पर गये । तुम्हारे पूछने पर महादेव ने अपने आप प्रकाशित होने वाले हरि की नित्य लीला रूप रहस्य को तत्त्वतः समझा दिया। अन्त में पुनः तुमने हर से निवेदन किया कि मैं हरि की नित्य लीला को
७४४ नारदीयपुराणम् नित्यां लीलां हरेर्द्रष्टुं तथा प्राह सदाशिवः। गोपीजनपदस्यांते वल्लभैति पदं ततः ॥११॥ चरणाच्छरणं पश्चात्प्रपद्ये इति वै मनुः । मंत्रस्यास्य ऋषिः प्रोक्तो सुरभिश्चन्द एव च ॥१२॥ गायत्री देवता चास्य बल्लवीवल्लभो विभुः । प्रपन्नोऽस्मीति तद्भक्तौ विनियोग उदाहृतः ॥१३॥ नास्य सिद्धादिकं विप्र शोधनं न्यासकल्पनम् । केवलं चिंतनं सद्यो नित्यलीलाप्रकाशकम् ॥१४॥ आभ्यंतरस्य धर्मस्य साधनं वच्मि सांप्रतम् । संगृह्य मन्त्रं गुरुभक्तियुक्तो विचिंत्य सर्वं मनसा तदीहितम् ॥१५॥ कृपां तदीयां निजधर्मसंस्थो विभावयन्नात्मनि तोषयेद्गुरुम् ॥१६॥ सतां शिक्षेत वै धर्मान्प्रपन्नानां भयापहान् । ऐहिकामुष्मिकींचिताविधुरान् सिद्धिदायकान् ॥१७॥ स्वेष्टदेवधिया नित्यं तोषयेद्वैष्णवांस्तथा । भर्त्सनादिकमेतेषां न कदाचिद्विचिंतयेत् ॥१८॥ पूर्वकर्मवशाद्भोग्यमैहिकं भोग्यमेव च । आयुष्यकं तथा कृष्णः स्वयमेव करिष्यति ॥१९॥ श्रीकृष्णं नित्यलीलास्थं चिंतयेत्स्वधियानिशम् । श्रीमदर्चावतारेण कृष्णं परिचरेत्सदा ॥२०॥ अनन्यचिंतनीयोऽसौ प्रपन्नैः शरणार्थिभिः । स्वेष्टं च देहगेहादावुदासीनतया बुधैः ॥२१॥ गुरोरवज्ञां साधूनां निंदां भेदं हरे हरौ । वेदनिंदां हरेर्नामबलात्पापसमीहनम् ॥२२॥ अर्थवादं हरेर्नाम्नि पाषंडं नामसंग्रहे । अलसे नास्तिके चैव हरिणामोपदेशनम् ॥२३॥ नामविस्मरणं चापि नाम्न्यानादरमेव च । संत्यजेद् दूरतो वत्स दोषानेतान्सुदारुणान् ॥२४॥ प्रपन्नोऽस्मीति सततं चिंतयेद्धृद्गतं हरिम् । स एव पालनं नित्यं करिष्यति ममेति च ॥२५॥ देखना चाहता हूँ। तब सदाशिव ने कहा—'गोपीजन' इस पद के अन्त में 'वल्लभ' इस पद को जोड़ दीजिए। तत्पश्चात् 'चरण' फिर 'शरण' और अन्त में 'प्रपद्ये' इतने को रख दीजिए। इस प्रकार मन्त्र बनेगा—'गोपीजन वल्लभचरणाञ्छरणं प्रपद्ये' इस मन्त्र के ऋषि सुरभि हैं, छन्द गायत्री है और देवता गोपिकावल्लभ हैं। कृष्ण की भक्ति में 'मैं शरणागत हूँ' ऐसा विनियोग कहा गया है ॥१६-१३॥ विप्र ! इस मन्त्र में न्यास, शुद्धि तथा सिद्ध आदि करने की आवश्यकता नहीं है। केवल चिंतन करने से सत्य नित्य लीला का प्रकाश दिखाई देता है। अब मैं आभ्यन्तर धर्म का साधन बताता हूँ ॥१४-१५॥ मन्त्र की दीक्षा लेकर गुरु की भक्ति करते हुए उनकी समस्त इच्छाओं का ध्यान रखे। अपने धर्म पर आरूढ़ होकर मन में गुरु कृपा की भावना को रखते हुए उनको संतुष्ट करे। शरण में आये सज्जनों को भय दूर करने वाले ऐहलौकिक एवम् पारलौकिक चिंता को मिटाने वाले तथा सिद्धि देने वाले धर्मों का उपदेश करे। अपन। इष्ट देव समझकर नित्य वैष्णवों को संतुष्ट करे। उनकी निन्दा आदि कभी न करे ॥१६-१८॥ ऐसे व्यक्ति को पूर्वजन्मार्जित कर्म के तारतम्य से ऐहलौकिक भोग एवम् आयु का प्रदान स्वयं कृष्ण ही करते हैं। साधक नित्य लीला करते हुए कृष्ण का चिन्तन अहर्निश किया करे। सम्यक् प्रकार से हरि का पूजन करे। उनका शरणागत होकर केवल उन्हीं की चिन्तना करे, अन्य की नहीं। शरीर, गृह आदि में उदासीनता का भाव रखे। गुरु का तिरस्कार, साधुओं की निंदा, हरि और हर में भेद बुद्धि, वेदनिंदा, हरिनाम को निंदा, बलात् पापों की इच्छा, हरिनाम में अर्थवाद, नामसंग्रह में पाखंड, आलसी और नास्तिक को हरिनाम का उपदेश, नामों का विस्मरण और नामों का अनादर—इन भयंकर दोषों का परित्याग करे। 'मैं शरणागत हूँ' ऐसा कहकर हृदय स्थित हरि का सतत चिन्तन करे। 'वही नित्य मेरा
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[द्विसप्ततितमोऽध्यायः] ७४५
तवास्मि राधिकानाथ कर्मणा मनसा गिरा । कृष्णकांतेति चैवास्मि युवामेव गतिर्मम ॥२६॥ दासाः सखायः पितरः प्रेयस्यश्च हरेरिह । सर्वे नित्या मुनिश्रेष्ठ चिंतनीया महात्मभिः ॥२७॥ गमनागमनेनित्यं करोति वनगोष्ठयोः । गोचारणं वयस्यैश्च विनासुरविघातनम् ॥२८॥ सखायो द्वादशाख्याता हरेः श्रीदामपूर्वकाः । राधिकायाः सुशीलाद्याः सख्यो द्वात्रिंशदीरिताः ॥२९॥ आत्मानं चिंतयेत्तत्र तासां मध्ये मनोरमाम् । रूपयौवनसंपन्नां किशोरीं च स्वलंकृताम् ॥३०॥ नानाशिल्पकलाभिज्ञां कृष्णभोगानुरूपिणीम् । तत्सेवनसुखाह्लादभावेनातिसुनिर्वृताम् ॥३१॥ ब्राह्मं मुहूर्तमारभ्य यावदर्थनिशा भवेत् । तावत्परिचरेत्तौ तु यथाकालानुसेवया ॥३२॥ सहस्रं च तयोर्नाम्नां पठेन्नित्यं समाहितः । एतत्साधनमुद्दिष्टं प्रपन्नानां मुनीश्वर ॥३३॥ नाख्येयं कस्यचित्तुभ्यं मया तत्त्वं प्रकाशितम् ।
सनत्कुमार उवाच ततस्त्वं नारद पुनः पृष्टवान्वै सदाशिवम् ॥३४॥ नाम्नां सहस्रं तच्चापि प्रोक्तवांस्तच्छृणुष्व मे । ध्यात्वा वृन्दावने रम्ये यमुनातीरसङ्गतम् ॥३५॥ कल्पवृक्षं समाश्रित्य तिष्ठंतं राधिकायुतम् । पठेन्नामसहस्रं तु युगलाख्यं महामुने ॥३६॥ देवकीनन्दनः शौरिर्वासुदेवो बलानुजः । गदाग्रजः कंसमोहः कंससेवकमोहनः ॥३७॥ भिन्नार्गलो भिन्नलोहः पितृवाह्यः पितृस्तुतः । मातृस्तुतः शिवध्येयो यमुनाजलभेदनः ॥३८॥ व्रजवासीव्रजानंदी नंदबालो दयानिधिः । लीलाबालः पद्मनेत्रो गोकुलोत्सव ईश्वरः ॥३९॥ गोपिकानंदनः कृष्णो गोपानंदः सतां गतिः । बकप्राणहरो विष्णुर्बकमुक्तिप्रदो हरिः ॥४०॥
पालन करेंगे ॥१९-२५॥ राधिकानाथ ! मैं मनसा, वाचा, कर्मणा आप ही का हूँ । मैं आपका प्रिय हूँ, आप दोनों (राधा और कृष्ण) ही मेरी गति हैं ।'--ऐसा कहा करे । मुनिश्रेष्ठ ! महात्माओं को चाहिये कि वे हरि के दास, सखा, पितर तथा प्रेयसी का सदा चिन्तन करे । 'कृष्ण नित्य वृन्दावन और व्रज में आते जाते हैं तथा बिना देवताओं को क्षति पहुँचाये सखाओं के साथ गो चराते हैं ।'--ऐसी भावना करे । हरि के श्रीदामा आदि बारह सखा हैं और राधिका सुशीला आदि बत्तीस सखियाँ हैं । उन सखियों के बीच अपने को मनोरमा, रूपयौवनसंपन्ना, किशोरी, सु-अलंकृता, अनेक शिल्पकलाओं को जानने वाली, कृष्ण के भोग के अनुरूप और उनके सेवन जन्य सुख से आनन्दविभोर होने वाली सखी समझे । ब्राह्ममुहूर्त से लेकर आधी रात तक समय के अनुसार उनको परिचर्या करे । नित्य सावधान होकर राधा-कृष्ण के सहस्र नामों का पाठ करे । मुनीश्वर ! भक्तों के लिये यही साधन बतलाया गया है । यह तत्त्व किसी से प्रकाशित नहीं करना चाहिये । केवल तुमसे ही मैंने कहा है' ॥२६-३३१/२॥
सनत्कुमार बोले-- नारद ! तदुपरान्त तुमने सदाशिव से पुनः प्रश्न किया । तब जो उन्होंने सहस्र नामों के विषय में बतलाया, वह मुझसे सुनो । महामुने ! रमणीय वृन्दावन में यमुना के तट पर स्थित कल्पवृक्ष के समीप निवास करते हुए राधा-कृष्ण के युगल रंजक सहस्रनाम का पाठ करना चाहिये ॥३४-३६॥ (जैसे--)
देवकी नंदन, शूरसंतति, वासुदेव, बलानुज, गदाग्रज, कंस को मोहने वाले, कंस के सेवकों को मोहने वाले, (कारागार के किवाड़ों) की अर्गला तोड़ने वाले, लोहा (लोहे की हथकड़ी और बेड़ी को) तोड़ने वाले, पिता के द्वारा सिर पर वहन करने योग्य (शिशुरूप श्रीकृष्ण) वह पितृस्तुत, मातृस्तुत, शिव के ध्येय, यमुनाजल का भेदन करने वाले, व्रजवासी, ब्रजानन्दी, नन्दबालक, दयानिधि, लीलाशिंशु, कमलाक्ष, गोकुलोत्सव, ईश्वर, गोपिकानन्दन, कृष्ण, गोपानन्द, सज्जनों की गति, बकासुर के प्राण हरण करने वाले, विष्णु, बकासुर को मोक्ष देने वाले ॥३७-४०॥
६४ ना० पु०
७४६ नारदीयपुराणम् बलदोलाशयशयः श्यामलः सर्वसुंदरः । पद्मनाभो हृषीकेशः क्रोडामनुजबालकः ॥४१॥ लीलाविध्वस्तशकतो वेदमंत्राभिषेचितः । यशोदानंदनः कांतो मुनिकोटीनिषेवितः ॥४२॥ नित्यं मधुवनावासी वैकुंठः संभवः क्रतुः । रमापतिर्यदुपतिर्मुरारिर्मधुसूदनः ॥४३॥ माधवो मानहारी च श्रीपतिर्भूधरः प्रभुः । बृहद्वनमहालीलो नंदसूनुर्महासनः ॥४४॥ तृणावर्तप्राणहारी यशोदाविस्मयप्रदः । त्रैलोक्यवक्त्रः पद्माक्षः पद्महस्तः प्रियंकरः ॥४५॥ ब्रह्मण्यो धर्मगोप्ता च भूपतिः श्रीधरः स्वराट् । अजाध्यक्षः शिवाध्यक्षो धर्माध्यक्षो महेश्वरः ॥४६॥ वेदांतवेद्यो ब्रह्मस्थः प्रजापतिरमोघदृक् । गोपीकराविलंबी च गोपबालकसुप्रियः ॥४७॥ बालानुयायी बलवान् श्रीदामप्रिय आत्मवान् । गोपीगृहांगणरतिर्भद्रः सुश्लोकमंगलः ॥४८॥ नवनीतहरो बालो नवनीतप्रियाशनः । बालवृन्दी मर्कवृन्दी चकिताक्षः पलायितः ॥४९॥ यशोदातर्जितः कंपी मायारुदितशोभनः । दामोदरोऽप्रमेयात्मा दयालुर्भक्तवत्सलः ॥५०॥ सुबद्धोलूखले नम्रशिरा गोपीकदर्थितः । वृक्षभंगी शोकभंगी धनदात्मजमोक्षणः ॥५१॥ देवर्षिवचनश्लाघी भक्तवात्सल्यसागरः । व्रजकोलाहलकरो व्रजानंदविवर्द्धनः ॥५२॥ गोपात्मा प्रेरकः साक्षी वृन्दावननिवासकृत् । वत्सपालो वत्सपतिर्गोपोदारकमंडनः ॥५३॥ बालक्रीडो बालरतिर्बालकः कनकांगदी । पीताम्बरो हेममाली मणिमुक्ताविभूषणः ॥५४॥ किंकिणीकटकी सुत्री नूपुरी मुद्रिकान्वितः । वत्सासुरपतिध्वंसी बकासुरविनाशनः ॥५५॥ हरि, बलराम के चंचल चित्त में अवस्थित होने वाले, श्यामल, सब प्रकार से सुन्दर, पद्मनाभ, हृषीकेश, मनुज- बालक की तरह क्रीड़ा करने वाले, लीला से शकट का विध्वंस करने वाले, वेद-मन्त्रों से अभिषिक्त होने वाले, यशोदापुत्र, कांत, करोड़ों मुनियों से सुसेवित, नित्य मधुवन में वास करने वाले, वैकुण्ठ (वैकुण्ठधाम के अधिपति), संभव (सबकी उत्पत्ति के स्थान), क्रतु, रमापति, यदुपति, मुरारि, मधुसूदन, माधव, मानहारी, श्रीपति, भूधर, प्रभु, महावन में बड़ी-बड़ी लीला करने वाले, नन्दसूनु, महान् आसन वाले, तृणावर्त के प्राण हरने वाले, यशोदा को विस्मय में डालने वाले, त्रैलोक्यमुख, पद्माक्ष, पद्म हस्त, प्रिय (कार्य) करने वाले, ब्रह्मण्य, (ब्राह्मणहितकारी), धर्मगोप्ता, भूपति, श्रीधर, स्वराट् (स्वयं प्रकाश) अजाध्यक्ष (ब्रह्मा के स्वामी), शिवाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, महेश्वर ॥४१-४६॥ वेदांतवेद्य, ब्रह्मस्थ, प्रजापति, अमोघदृक्, गोपीकराव लम्बी, गोप- बालकों के अत्यन्त प्रिय, बलानुयायी, बलवान्, श्रीदामप्रिय, आत्मवान्, गोपियों के गृहांगणों से अनुराग करने वाले, भद्र, अत्यन्तमंगलरूप, मक्खन चुराने वाले, बाल, नवनीत को रुचि से खाने वाले, बालकों एवम् बन्दरों को खिलाने वाले, चकिताक्ष, भागने वाले, यशोदा से पीटे जाने वाले, कांपने वाले, माया से सुन्दरतया रोदन करने वाले, दामोदर, अप्रमेयात्मा, दयालु, भक्तवत्सल, ओखली से बाँधे जाने पर अवनत शिर वाले, गोपियों की भर्त्सना सहने वाले, वृक्षों को तोड़ने वाले, शोक भंग करने वाले, कुबेर के पुत्रों को मुक्त करने वाले, देवर्षि के वचन से श्लाघा करने वाले, भक्तवत्सलता के समुद्र, व्रज में कोलाहल करने वाले, व्रजवासियों का आनन्द बढ़ाने वाले ॥४७-५२॥ गोपात्मा, प्रेरक, साक्षी, वृन्दावन में निवास करने वाले, वत्सपाल, वत्सपति, गोप-बालकों के शिरमुकुट, बालकों के साथ क्रीड़ा करने वाले, शिशुओं से प्रेम करने वाले, बालक, सुवर्ण के केयूर पहनने वाले, पीताम्बर, सुवर्णमाली, मणि-मुक्ताओं के आभूषण धारण करने वाले, किंकिणी, कटक, सूत्र, नूपुर तथा मुद्रिका पहनने वाले, वत्सासुर के पति का नाश करने वाले, बकासुर को समाप्त करने वाले, अघासुर का विध्वंस करने वाले, बालकों को जगाने वाले, आद्य, आत्मप्रद, संज्ञी, यमुना के तट पर भोजन करने वाले, गोपाल-मण्डली के
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७४७ अघासुरविनाशी च विनिद्रीकृतबालकः । आद्य आत्मप्रदः संगी यमुनातीरभोजनः ॥५६॥ गोपालमंडलीमध्यः सर्वगोपालभूषणः । कृतहस्ततलग्रासो व्यंजनाश्रितशाखिकः ॥५७॥ कृतबाहुशृंगयष्टिगुं जालं कृतकंठकः । मयूरपिच्छमुकुटो वनमालविभूषितः ॥५८॥ गैरिकार्चित्रितवपुर्नवमेघवपुः स्मरः । कोटिकंदर्पलावण्यो लसन्मकरकुंडलः ॥५६॥ आजानुबाहुर्भगवान्निद्रारहितलोचनः । कोटिसागरगांभीर्यः कालकालः सदाशिवः ॥६०॥ विरंचिमोहनवपुर्गोपवत्सवपुर्धरः । ब्रह्मांडकोटिजनको ब्रह्ममोहविनाशकः ॥६१॥ ब्रह्मा ब्रह्माडितः स्वामी शक्रदर्पादिनाशनः । गिरिपूजोपवेष्टा च धृतगोवर्धनाचलः ॥६२॥ पुरंदरेडितः पूज्यः कामधेनुप्रपूजितः । सर्वतीर्थाभिषिक्तश्च गोविंदोगो परक्षकः ॥६३॥ कालियांतिकरः क्रूरो नागपत्नीडितो विराट् । धेनुकारिः प्रलंबारिवृषासुरविमर्दनः ॥६४॥ मायासुरात्मजध्वंसी केशिकंठविदारकः । गोपगोप्ता धेनुगोप्ता दावाग्नपरिशोषकः ॥६५॥ गोपकन्यावस्त्रहारी गोपकन्यावरप्रदः । यज्ञपत्न्यन्नभोजी च मुनिमानापहारकः ॥६६॥ जलेशानमानमथनो नन्दगोपालजीवनः । गन्धर्वशापमोक्ता च शंखचूडशिरोहरः ॥६७॥ वंशीवटी वेणुवादी गोपीचिन्तापहारकः । सर्वगोप्ता समाह्वानः सर्वगोपीमनोरथः ॥६८॥ व्यंगद्यमंत्रवक्ता च गोपोमण्डलमोहनः । रासक्रीडारसास्वादी रसिको राधिकाधवः ॥६६॥ किशोरीप्राणनाथश्च वृषभानसुताप्रियः । सर्वगोपीजनानंदी गोपीजनविमोहनः ॥७०॥ गोपिकागीतचरितो गोपीनर्तनलालसः । गोपीस्कंधाश्रितकरो गोपिकाचुम्बनप्रियः ॥७१॥ मध्य में रहने वाले, समस्त गोपालों के भूषण, हथेली पर रख कर भोजन करने वाले, वृक्षों की शाखाओं पर चढ़ने वाले, हाथ में लाठी रखने वाले, गुंजा से अलंकृत कंठ वाले, मुकुट पर मयूर का पंख लगाने वाले, वनमाला से विभूषित, गेरु से शरीर को चित्रित करने वाले, नवीन मेघ के समान देह (कान्ति) वाले, सुन्दर, करोड़ कन्दर्प के समान लावण्य वाले, मकराकृति कुण्डल से सुशोभित, आजानुबाहु, भगवान्, निद्रा से रहित नेत्र वाले, करोड़ सागर के समान गंभीर, काल के (भी) काल, सदाशिव, ॥५३-६०॥ ब्रह्मा को मोहित करने वाले शरीर से युक्त, गोपों एवम् वत्सों के शरीर धारण करने वाले, कोटि ब्रह्मांड के उत्पादक, ब्रह्मा के मोह को दूर करने वाले, पद्मयोनिरूप, ब्रह्मा से स्तुत, स्वामी, इन्द्र के दर्प आदि नाश करने वाले, पर्वतपूजन का उपदेश करने वाले, गोवर्धनपर्वत को उठाने वाले, शक्र से स्तुत, पूज्य, कामधेनु से प्रपूजित, सकल तीर्थों के जल से अभिषिक्त, गोविंद, गोपरक्षक, कालिय नाग का दमन करने वाले, क्रूर, नागपत्नी द्वारा स्तुत, विराट, धेनुक के शत्रु, प्रलंब के शत्रु, वृषासुर का मर्दन करने वाले, मायामुर के आत्मज का विध्वंस करने वाले, केशी के कंठ को विदीर्ण करने वाले, गोपगोप्ता, धेनुगोप्ता, दावाग्निशोषक ॥६१-६५॥ गोपकन्याओं का वस्त्र चुराने वाले, गोपबालिकाओं को वर देने वाले, यज्ञ-पत्नियों का अन्न खाने वाले, मुनियों के मान का अपहरण करने वाले, वरुण का मान मथन करने वाले, नन्द और गोपालों के प्राणरक्षक, गन्धर्व का शापमोचन करने वाले, शंखचूड का शिर हरण करने वाले, वंशीवटी (वंशीवट के समीप लीला करने वाले), वेणुवादी (वंशी बजाने वाले), गोपियों की चिन्ता दूर करने वाले, सर्वरक्षक, जोर से बुलाने वाले, सकल गोपियों की कामना पूर्ण करने वाले, व्यंग्य वचन बोलने वाले, गोपियों के समूह को मोहित करने वाले, रस- क्रीड़ा का रसास्वादन करने वाले, रसिक, राधिकापति, किशोरी के प्राणनाथ, वृषभानु की पुत्री के प्रिय, सकल गोपीजन को आनन्द देने वाले ॥६६-७०॥ गोपिकाओं के गीत सुनने वाले, गोपियों का नाच देखने वाले, गोपियों
७४८ नारदीयपुराणम् गोपिकामार्जितमुखो गोपोव्यंजनवीजितः । गोपिकाकेशसंस्कारी गोपिकापुष्पसंस्तरः ॥७२॥ गोपिकाहृदयालंबी गोपीवहनतत्परः । गोपिकामदहारी च गोपिकापरमार्जितः ॥७३॥ गोपिकाकृतसंनीलो गोपिकासंस्मृतप्रियः । गोपिकावन्दितपदो गोपिकावशवर्तनः ॥७४॥ राधापराजितः श्रीमान्निकुञ्जेसुविहारवान् । कुञ्जप्रिया कुञ्जवासी वृन्दावनविकासतः ॥७५॥ यमुनाजलसिक्तांगो यमुनासौख्यदायकः । शशिसंस्तंभनः शूरः कामी कामविमोहनः ॥७६॥ कामाद्यः कामनाथश्च काममानसभेदनः । कामदः कामरुपश्च कामिनीकामसंचयः ॥७७॥ नित्यक्रीडो महालीलः सर्वः सर्वगतस्तथा । परमात्मा पराधीशः सर्वकारणकारणः (म्) ॥७८॥ गृहीतनारदवचा ह्यक्रूरपरिचिंतितः । अक्रूरवन्दितपदो गोपिकातोषकारकः ॥७९॥ अक्रूरवाक्यसंग्राही मथुरावासकारणः (म्) । अक्रूरतापशमनो रजकायुःप्रणाशनः ॥८०॥ मथुरानन्ददायी च कंसवस्त्रविलुण्ठनः । कंसवस्त्रपरीधानो गोपवस्त्रप्रदायकः ॥८१॥ सुदामगृहगामी च सुदामपरिपूजितः । तंतुवायकसंप्रीतः कुब्जाचंदनलेपनः ॥८२॥ कुब्जारूपप्रदो विज्ञो मुकुंदो विष्टरश्रवाः । सर्वज्ञो मथुरालोकी सर्वलोकामिनंदनः ॥८३॥ कृपाकटाक्षदर्शी च दैत्यारिर्देवपालकः । सर्वदुःखप्रशमनो धनुर्भङ्गीमहोत्सवः ॥८४॥ कुवलयापीडहंता दंतस्कंधवलाप्रणीः । कप्लरूपधरोधीरो दिव्यवस्तानुलेपनः ॥८५॥ मल्लरूपो महाकालः कामरूपी बलान्वितः । कंसत्रासकरो भीमो मुष्टिकांतश्च कंसहा ॥८६॥ के कन्धे पर हाथ रखने वाले, गोपियों के चुम्बन के प्रेमी, गोपियों से मुख धुलाने वाले, गोपियों से पंखा झलाने वाले, गोपियों के केश को संवारने वाले, गोपियों से पुष्पशय्या बिछवाने वाले, गोपियों के हृदय के अवलम्ब, गोपियों का वाहन बनने वाले, गोपियों का मद चूर्ण करने वाले, गोपियों के दोष मार्जन करने वाले, गोपियों से अपने को छिपा लेने वाले, गोपियों की संस्मृति के प्रिय, गोपियों से वन्दित चरण वाले, गोपियों के वशवर्ती, राधा से पराजित, श्रीमान्, निकुंजों में विहार करने वाले, कुंजप्रिय, कुंजवासी, वृन्दावन का विकास करने वाले ।।७१-७५।। यमुना के जल से अंगों को सिक्त करने वाले, यमुना के सौख्यदायक, चन्द्रमा को स्तंभित करने वाले, शूर, कामी, कामविमोहन, काम के आद्य, कामनाथ, काम के मानस का भेदन करने वाले, कामद, कामरूप, कामिनियों के कामसंचय करने वाले, नित्य क्रीड़ा करने वाले, महालीला करने वाले, सर्व, सर्वगत, परमात्मा, पराधीश, अखिल कारणों के कारण, नारद के वचन को स्वीकार करने वाले, अक्रूर का परामर्श मानने वाले, अक्रूर से वन्दित चरण वाले, गोपिकाओं को संतुष्ट करने वाले, अक्रूर के वाक्यों का संग्रह करने वाले, मथुरा में वास करने वाले, अक्रूर के ताप मिटाने वाले, रजक की आयु समाप्त करने वाले, ।।७६-८०।। मथुरा को आनन्दित करने वाले, कंस के वस्त्रों को लूटने वाले, कंस के वस्त्रों को पहनने वाले, गोपों को वस्त्र देने वाले, सुदामा के घर पर जाने वाले, सुदामा से अच्छी तरह पूजित होने वाले, तंतुवायक (दर्जी) से प्रसन्न होने वाले, कुब्जा से चंदन का लेप कराने वाले, कुब्जा को रूप देने वाले, विज्ञ, मुकुंद, विस्तृत सुयश एवं कानो वाले, सर्वज्ञ, मथुरा को आलोकित करने वाले, अखिल लोकों के प्रिय, कृपा-कटाक्ष से देखने वाले, दैत्यों के शत्रु, देवपालक, अखिल दुःखों के नाशक, धनुष को तोड़ने वाले, महान् उत्सव करने वाले, कुवलयापीड का वध करने वाले, उसके दांतों को कंधे पर धारण करने वाले, लोगों की भावना के अनुसार रूप धारण करने वाले, वीर, दिव्य वस्त्र एवम् लेप से युक्त ।।८१-८५।। मल्लरूप, महाकाल, कामरूपी, बली, कंस का त्रास बढ़ाने वाले, भयंकर,
द्व्यशीतितमोऽध्यायः ७४६ चाणूरघ्नो भयहरः शलारिस्तोशलांतकः । वैकुण्ठवासी कंसारिः सर्वदुष्टनिषूदनः ॥८७॥ देवदुंदुभिर्निर्घोषी पितृशोकनिवारणः । यादवेंद्रः सतांनाथो यादवारिप्रमर्दनः ॥८८॥ शौरिशोकविनाशी च देवकीतापनाशनः । उग्रसेनपरित्राता उग्रसेनाभिपूजितः ॥८६॥ उग्रसेनाभिषेकी च उग्रसेनदयापरः । सर्वसात्वतसाक्षी च यदूनामभिनंदनः ॥६०॥ सर्वमाथुरसंसेव्यः करुणो भक्तबांधवः । सर्वगोपालधनदो गोपीगोपाललालसः ॥६१॥ शौरिदत्तोपवीतो च उग्रसेनदयाकरः । गुरुभक्तो ब्रह्मचारी निगमाध्ययने रतः ॥६२॥ संकर्षणसहाध्यायी सुदामसुहृदेव च । विद्यानिधिः कलाकोशो मृतपुत्रप्रदस्तथा ॥६३॥ चक्री पांचजनी चैव सर्वनारकिमोचनः । यमार्चितः परो देवो नामोच्चारवशो (शो) ऽच्युतः ॥६४॥ कुब्जाविलासो सुभगो दीनबंधुरनूपमः । अक्रूरगृहगोप्ता च प्रतिज्ञापालकः शुभः ॥६५॥ जरासंधजयी विद्वान् यवनांतो द्विजाश्रयः । मुचुकुंदप्रियकरो जरासंधपलायितः ॥६६॥ द्वारकाजनको गूढो ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः । लीलाधरः प्रियकरो विश्वकर्मा यशःप्रदः ॥६७॥ रुक्मिणीप्रियसंदेशी रुक्मशोकविवर्द्धनः । चैद्यशोककालयः श्रेष्ठो दुष्टराजन्यनाशनः ॥६८॥ रुक्मिवैरूप्यकरणो रुक्मिणीवचने रतः । बलभद्रवचोग्राही मुक्तरुक्मी जनार्दनः ॥६६॥ रुक्मिणीप्राणनाथश्च सत्यभामापतिः स्वधम् । भक्तपक्षी भक्तिवश्यो ह्यक्रूरमणिदायकः ॥१००॥ शतधन्वाप्राणहारी ऋक्षराजसुताप्रियः । सत्राजित्तनयाकांतो मित्रविंदापहारकः ॥१०१॥ सत्यापतिर्लक्ष्मणाजिच्छूरो भद्राप्रियंकरः । नरकासुरघाती च लीलाकन्याहरो जयी ॥१०२॥ मुष्टिक के नाशक, कंसघाती, चाणूरमर्दक, भयहारी, शल के शत्रु, तोशल के संहारक, वैकुण्ठवासी, कंस के अरि, अखिल दुष्टों के नाशक, देवदुंदुभियों को बजाने वाले, पिता के शोक को मिटाने वाले, यादवों के प्रभु, सज्जनों के नाथ, यादवों के शत्रुओं को नष्ट करने वाले, शौरि के शोक का विनाश करने वाले, देवकीतापनाशन, उग्रसेन के रक्षक, उग्रसेन से अभिपूजित, उग्रसेन का राज्याभिषेक करने वाले, उग्रसेन के प्रति दयालु, सकल भक्तों के साक्षी, यादवों के आनन्ददायी ॥८६-९०॥ समस्त मथुरावासियों के सेवनीय, करुण, भक्तबांधव, सब गोपालों को धन देने वाले, गोपियों और गोपालों को लालसा को पूर्ण करने वाले, शौरि के दिये यज्ञोपवीत धारण करने वाले, गुरुभक्त, ब्रह्मचारी, वेदों के स्वाध्याय में निरत, बलराम के सहाध्यायी, सुदामा के सुहृद्, विद्यानिधि, कलाकोश, मृत पुत्र को देने वाले, चक्री, पांचजन्य नामक शंख धारण करने वाले, समस्त नरकवासी जीवों का उद्धार करने वाले, यम के पूज्य, देवश्रेष्ठ, नामोच्चारण मात्र से वशीभूत होने वाले, कुब्जा के साथ विहार करने वाले, सौभाग्यवान्, दीनबन्धु, अनुपम, अक्रूर के गृहरक्षक, प्रतिज्ञापालक, पवित्र ॥९१-९५॥ जरासंधजयी, विद्वान्, यवन के नाशक, द्विजों को आश्रय देने वाले, मुचुकुन्द के प्रिय करने वाले, जरासंध के डर से भागने वाले, द्वारका का निर्माण करने वाले, गूढ, ब्रह्मण्य, सत्यसंघ, लीलाधर, प्रियकर, विश्वकर्मा, यशोदायक, रुक्मिणी को प्रिय संदेश भेजने वाले, रुक्म के शोक को बढ़ाने वाले, शिशुपाल के लिए शोक के भाण्डार, श्रेष्ठ, दुष्ट राजाओं, के नाशक, रुक्मी को विरूप करने वाले, रुक्मिणी की बात मानने वाले, बलभद्र के वचन को स्वीकार करने वाले, रुक्मी को छोड़ देने वाले, जनार्दन, रुक्मिणी के प्राणनाथ, सत्यभामा के पति, भक्तों का पक्ष लेने वाले, भक्तिवश्य, अक्रूर को मणि देने वाले ॥९६-१००॥ शतधन्वा के प्राणनाशक, जाम्बवती के प्रिय, सत्राजित् की कन्या के कांत, मित्रविंदा का अपहरण करने वाले,
७५० नारदीयपुराणम्
मुरारिर्मंदनेशोऽपि धरित्रीदुःखनाशनः । वैनतेयी स्वर्गगामी अदित्यकुंडलप्रदः ॥१०३॥ इंद्रांचितो रमाकांतो वज्रीभार्याप्रपूजितः । पारिजातापहारी च शक्रमानापहारकः ॥१०४॥ प्रद्युम्नजनकः सांबतातो बहुसुतो विधुः । गर्गाचार्यः सत्यगतिर्धर्माधारो धराधरः ॥१०५॥ द्वारकामंडनः श्लोक्यः सुश्लोको निगमालयः । पौंड्रकप्राणहारी च काशीराजशिरोहरः ॥१०६॥ अवैष्णवविप्रदाहो सुदक्षिणभयावहः । जरासंधविदारी च धर्मनन्दनयज्ञकृत् ॥१०७॥ शिशुपालशिरश्छेदी दंतवक्त्रविनाशनः । विदूरथांतकः श्रीशः श्रीदो द्विविदनाशनः ॥१०८॥ रुक्मिणीमानहारी च रुक्मिणीमानवर्द्धनः । देवर्षिशापहर्ता च द्रौपदीवाक्यपालकः ॥१०६॥ दुर्वासोभयहारी च पांचालीस्मरणगतः । पार्थदूतः पार्थमन्त्री पार्थदुःखौघनाशनः ॥११०॥ पार्थमानापहारी च पार्थजीवनदायकः । पांचाली वस्त्रदातः च विश्वपालकपालकः ॥१११॥ श्वेताश्वसारथिः सत्यः सत्यसाध्यो भयापहः । सत्यसंधः सत्यरतिः सत्यप्रिय उदारधीः ॥११२॥ महासेनजयी चैव शिवसैन्यविनाशनः । बाणासुरभुजच्छेत्ता बाणबाहुवरप्रदः ॥११३॥ तार्थ्यमानापहारी च तार्थ्यतेजोविवर्द्धनः । रामस्वरूपधारी च सत्यभामामुदावहः ॥११४॥ रत्नाकरजलक्रीडो व्रजलीलाप्रदर्शकः । स्वप्रतिज्ञापरिव्वंसी भीष्माज्ञापरिपालकः ॥११५॥ वीरायुधहरः कालः कालिकेशो महाबलः । वर्वरीषशिरोहारी वर्वरीषशिरःप्रदः ॥११६॥ धर्मपुत्रजयी शूरदुर्योधनमदांतकः । गोपिकाप्रीतिनिबंध्नित्यक्रीडो व्रजेश्वरः ॥११७॥
सत्या के पति, लक्ष्मणा को जीतने वाले, पूज्य, भद्रा का प्रिय करने वाले, नरकासुर का वध करने वाले, लोला से कन्याओं का अपहरण करने वाले, विजयी, मुरारि, मदनेश, धरित्री के दुःख दूर करने वाले, गरुड़ को रखने वाले, स्वर्ग जाने वाले, अदिति को कुण्डल देने वाले, शक्र से अर्चित, रमाकांत, इन्द्राणी से पूजित, कल्पवृक्ष के अपहर्ता, इन्द्र के मानहारी, प्रद्युम्न के पिता, माता-पिता वाले, बहुपुत्र वाले, चन्द्र के रूप, गर्गाचार्य के रूप, सत्यगति, धर्माधार, धराधर, द्वारकाभूषण, स्तुत्य, यशस्वी, निगमालय, पौंड्रक के प्राणहर्ता, काशीराज का शिर काटने वाले, अवैष्णव ब्राह्मणों का दहन करने वाले, सुदक्षिण को भयभीत करने वाले, जरासंध को विदीर्ण करने वाले, युधिष्ठिर को यज्ञ कराने वाले, शिशुपाल का शिरश्छेदन करने वाले, दंतवक्त्र का विनाश करने वाले, विदूरथ का अंत करने वाले, श्रीश, श्रीदायक, द्विविदनाशक, रुक्मिणीमानहारी, रुक्मिणीमानवर्धक, देवर्षि के शाप का हरण करने वाले, द्रौपदी के वचन का पालन करने वाले ॥१०१-१०९॥ दुर्वासा द्वारा उपस्थित भय को दूर करने वाले, पांचाली के स्मरण करते ही आने वाले, पार्थदूत, पार्थमन्त्री, पार्थ के दुःख-समूह को नाश करने वाले, पार्थ के मान का अपहरण करने वाले, पार्थ को जीवन प्रदान करने वाले, द्रौपदी को वस्त्र देने वाले, विश्वपालक के पालक, श्वेताश्व के सारथि, सत्य, सत्यसाध्य, भय दूर करने वाले, सत्यसंध, सत्यरति, सत्यप्रिय, उदार बुद्धि वाले, महासेन के विजेता, शिव की सेना का नाश करने वाले, बाणासुर की भुजाओं का छेदन करने वाले, बाण को बाहुओं का वर देने वाले, गरुड़ के मान का अपहरण करने वाले, ताक्ष्यं के तेज को बढ़ाने वाले, रामस्वरूपधारी, सत्यभामा को आनन्द देने वाले, समुद्र के जल में क्रीड़ा करने वाले, व्रज में लीला दिखाने वाले, अपनी प्रतिज्ञा का ध्वंस करने वाले, भीष्म की आज्ञा का परिपालन करने वाले ॥११०-११५॥ वीरों के अस्त्र हरण करने वाले, काल, कालिकेश, महाबली, बर्बरीष के शिर का अपहरण करने वाले, बर्बरीष को शिर देने वाले, युधिष्ठिर को जिताने वाले, वीर दुर्योधन के मद को चूर्ण करने वाले, गोपियों के प्रेमपाश