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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 757, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 757

७३८ नारदीयपुराणम् श्रीशक्तिकामाः कृष्णाय कामः सप्ताक्षरः परः । कृष्णगोविंदकौ डेंतौ हृदंतोऽन्यो नवाक्षरः ॥८२॥ डेंतौ च कृष्णगोविंदौ तथाः कामः पुटः परः । कामः शाङ्गी धरासंस्थो मन्द्रिद्वादशश्च मन्मथः ॥८३॥ श्यामलांगाय हृदयं दशार्णः सर्वसिद्धिदः । बालांते वपुषे कृष्णायवह्निजायांतमोऽपरः ॥८४॥ द्वितांते बालवपुषे कामः कृष्णाय संवदेत् । ततो ध्यायन्स्वहृदये गोपीजनमनोहरम् ॥८५॥ श्रीवृन्दावनप्रतोलिषु नमत्संकुल्लवल्लीततिष्वंतर्जालविघट्टनैः सुरभिना वातेन संसेविते । कालिंदीपुलिने विहारिणमथो राधेकजीवातुकं वंदे नन्दकिशोरमिन्दुवदनं स्निग्धांबुडाडंबरम् ॥८६॥ पूर्वोक्तवर्त्मना पूजा ज्ञेयाह्येषां मुनीश्वर । देवकीसूतवर्णांते गोविन्दपदमुच्चरेत् ॥८७॥ वासुदेवपदं प्रोच्य संबुद्धयंतं जगत्पतिम् । देहि मे तनयं पश्चात्कृष्ण त्वामहमीरयेत् ॥८८॥ शरणं गत इत्यंतो मंत्रो द्वात्रिंशदक्षरः । नारदोऽस्य मुनिश्चंदो गायत्री वाप्यनुष्टुभम् । ॥८६॥ देवः सुतप्रदः कृष्णः पादैः सर्वेण चांगकम् विजयेन युतो रथस्थितः प्रसभानीय समुद्रमध्यतः । प्रददत्तनयान् द्विजन्मने स्मरणीयो वसुदेवनन्दनः ॥१००॥ लक्षं जपोऽयुतं होमस्तिलैर्मधुरसंप्लुतैः । अर्चा पूर्वोदिते पीठे अंगलोकेश्वरायुधैः ॥१०१॥ एवं सिद्धे मनौ मंत्री वंध्यायामपि पुत्रवान् । तारो माया ततः सांत संदुष्वांतश्च सर्ववान् ॥१०२॥ जोड़ने पर 'क्लीं कृष्ण' यह तीन अक्षरों का मन्त्र बनता है । वही ङे विभक्त्यन्त होने पर चार अक्षरों का 'क्लीं कृष्णाय' मन्त्र होता है । 'कृष्णाय नमः' यह पंचाक्षर मन्त्र है । 'क्लीं' संपुटित कृष्ण पद भी अपर पंचाक्षर मन्त्र है । यथा-क्लीं कृष्णाय क्लीं । 'गोपालाय स्वाहा' यह षडक्षर मन्त्र कहा गया है। 'क्लीं कृष्णाय स्वाहा' यह भी दूसरा षडक्षर मन्त्र है। 'कृष्णाय गोविन्दाय' यह सप्ताक्षर मन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाला है। श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय क्लीं यह दूसरा सप्ताक्षर मन्त्र है। 'कृष्णाय गोविन्दाय नमः' यह दूसरा नवाक्षर मन्त्र है । 'क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय क्लीं' यह भी इतर नवाक्षर मन्त्र है। 'क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलाङ्गाय नमः' यह दशाक्षर संपूर्ण सिद्धियों को देने वाला है। 'बालवपुषे कृष्णाय स्वाहा' यह दूसरादशाक्षर मन्त्र है । 'बालवपुषे क्लीं कृष्णाय स्वाहा' यह एकादशाक्षर मन्त्र है । तदनन्तर गोपीजन मनोहर श्रीकृष्ण का इस प्रकार ध्यान करे कि वे कालिन्दी के तट पर विहार करते हैं, जहाँ वृन्दावन की प्रतोलियों (ग्राममध्यमार्ग) पर गिरती हुई प्रफुल्लित लताओं के आभ्यन्तर जाल को तितर-बितर करते हुए सुगन्धित वायु बह रहा है। उनका मुख इन्द्र के समान है वर्ण सघनघन के सदृश है, वे राधा के एक मात्र प्राण हैं। मुनीश्वर ! ऐसा ध्यान कर पूर्वोक्त रीति से पूजा करनी चाहिये । "देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ! देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः" । यह बत्तीस अक्षरों का मन्त्र है ॥८५-९८३॥ इसके मुनि नारद, छन्द गायत्री तथा अनुष्टुप् और देवता पुत्र देने वाले कृष्ण हैं । मन्त्राक्षरों से अंगन्यास कर ध्यान करे कि वसुदेवपुत्र विजयी हैं, रथ पर अवस्थित हैं। वे समुद्र के बीच से लाकर ब्राह्मण के मरे पुत्र को उन्हें वापस दे रहे हैं, उनका स्मरण करना चाहिये ऐसा ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और दश हजार त्रिमधुयुक्त तिलों से हवन करे। पश्चात् पूर्वोक्त पीठ पर अंग देवताओं, लोक- पालों तथा आयुधों की पूजा करनी चाहिये । इस तरह मन्त्र की सिद्धि हो जाने से साधक को वन्ध्या स्त्री से भी पुत्र हो सकता है ॥९९-१०१३॥