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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 758, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 758

एकाशीतितमोऽध्यायः ७३६ सोऽहं वह्निप्रियांतोऽयं मंत्रो वस्वक्षरः परः । पंचब्रह्मात्मकस्यास्य मंत्रस्य मुनिसत्तमः ॥१०३॥ ऋषिर्ब्रह्मा च परमा गायत्री छंद ईरितम् । परं ज्योतिः परं ब्रह्म देवता परिकीर्तितम् ॥१०४॥ प्रणवो बीजमाख्यातं स्वाहा शक्तिरुदाहृता । स्वाहेति हृदयं प्रोक्तं सोऽहं वेति शिरो मतम् ॥१०५॥ हंसश्चेति शिखा प्रोक्ता हृल्लेखा कवचं स्मृतम् । प्रणवो नेत्रमाख्यातमस्त्रं हरिहरेति च ॥१०६॥ स ब्रह्मा स शिवो विप्र स हरिः सैव देवराट् । स सर्वरूपः सर्वाख्यः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥१०७॥ एवं ध्यात्वा जपेदष्टलक्षहोमो दशांशतः । पूजाप्रणवपीठेऽस्य सांगावरणकैर्मता ॥१०८॥ एवं सिद्धे मनौ ज्ञानं साधकेंद्रस्य नारद । जायते तत्त्वमस्यादिवाक्योक्तं निर्विकल्पकम् ॥१०८॥ कामो ङेंतो हृषीकेशो हृदयांतो गजाक्षरः । ऋषिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदो गायत्रमीरितम् ॥११०॥ देवता तु हृषीकेशो विनियोगोऽखिलाप्तये । कामो बीजं तथायेति शक्तिरस्य ह्युदाहृता ॥१११॥ बीजेनैव षडंगानि कृत्वा ध्यानं समाचरेत् । पुरुषोत्तममंत्रोक्तं सर्वं वास्य प्रकीर्तितम् ॥११२॥ लक्षं जपोऽयुतं होमो घृतेनैव प्रकीर्तितः । तर्पणं सर्वकामाप्त्यै प्रोक्तं संमोहिनीसुमैः ॥११३॥ श्रीबीजं च चतुर्थ्यन्तः श्रीधरो ङैंतकस्तथा । त्रैलोक्यमोहनः शब्दो नमोऽन्तो मनुरीरितः ॥११४॥ ऋषिर्ब्रह्मा च गायत्री छन्दः श्रीधरदेवता । श्रीबीजं शक्तिरापेति बीजेनैव षडंगकम् ॥११५॥ पुरुषोत्तमवद्ध्यानपूजादिकमिहोदितः । लक्षं जपस्तथा होम आज्येनैव दशांशतः ॥११६॥ सुगंधश्वेतपुष्पैस्तु पूजां होमादिकं चरेत् । एवं कृते तु विप्रेन्द्र साक्षात्स्याच्छ्रीधरः स्वयम् ॥११७॥ अच्युतानन्तगोविंदपदं ङैंतं नमोतिमम् । मंत्रोऽस्य शौनकऋषिर्विराट् छंदः प्रकीर्तितम् ॥११८॥ 'ओं ह्रीं हंसः सोऽहं स्वाहा' यह दूसरा अष्टाक्षर मंत्र है । इस पंचब्रह्मात्मक मंत्र के मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता परं ज्योति परब्रह्म, बीज प्रणव और शक्ति स्वाहा है । स्वाहा हृदयाय नमः । सोहं शिरसे स्वाहा । हंसः शिखायै वषट् । हृल्लेखा कवचाय हुम् । ओं नेत्राभ्यां वौषट् । 'हरिहर' अस्त्राय फट् । इस प्रकार अंगन्यास करे (वही कृष्ण) ब्रह्मा हैं, वही शिव हैं, वही हरि और वही इन्द्र हैं। वहीं सर्वरूप हैं तथा सब नाम उन्हीं के हैं। वही स्वयं प्रकाशमान अविनाशी परमात्मा हैं—ऐसा ध्यान कर आठ लाख मंत्र को जपे और उसका दशांश हवन करे । अनन्तर प्रणवपीठ पर अंगदेवताओं के साथ कृष्ण का पूजन करे । नारद ! ज्ञानी साधक इस तरह मंत्र को सिद्ध कर 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योक्त निर्विकल्प ज्ञान को प्राप्त करता है । 'क्लीं हृषीकेशाय नमः' यह अष्टाक्षर मंत्र है । इसके मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री और देवता हृषीकेश हैं । सर्वप्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है ॥१०२-११०॥ 'क्लीं' इसका बीज तथा 'आय' शक्ति कही गई है । बीजमंत्र से षडंगन्यास कर ध्यान करे । अथवा पुरुषोत्तम मंत्र के लिए कही हुई सब बातें इसके लिए भी समझनी चाहिये । अनन्तर एक लाख मंत्र जप कर दश हजार घी से हवन करे । समस्त कामनाओं की प्राप्ति के लिये (इस मंत्र को पढ़ कर) कर्पूरमिश्रित जल से तर्पण करना चाहिये । 'श्रीं श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय नमः' यह चौदह अक्षरों का मंत्र है। इसके ऋषि ब्रह्मा, छंद गायत्री, देवता श्रीधर, बीज श्री और शक्ति 'आय' है । बीज से ही षडंगन्यास कर पुरुषोत्तम मन्त्र की तरह ध्यान-पूजन आदि करना चाहिये । अनन्तर एक लाख मंत्र-जप करके उसका दशांश घी से हवन करे । पुनः सुगंधित श्वेत पुष्पों से पूजा, होम आदि करे। विप्रेन्द्र ! जो इस तरह करता है, वह साक्षात् श्रीधर होता है । "अच्युतानन्तगोविन्दाय नमः" यह एक मंत्र है । अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नमः--ये तीन