बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७४० नारदीयपुराणम् एषां पराशरव्यासनारदा ऋषयः स्मृताः । विराट् छन्दः समाख्यातं परब्रह्मात्मको हरिः ॥११९॥ देवताबीजशक्ती तु पूर्वोक्ते साधकैर्मते । शंखचक्रधरं देवं चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥१२०॥ सर्वैरप्यायुधैर्युक्तं गरुडोपरि संस्थितम् । सनकादिमुनीन्द्रैस्तु सर्वदेवैरुपासितम् ॥१२१॥ श्रीभूमिसहितं देवमुदयादित्यसन्निभम् । प्रातरुद्यत्सहस्रांशुमंडलोपमकुंडलम् ॥१२२॥ सर्वलोकस्य रक्षार्थमनन्तं नित्यमेव हि । अभयं वरदं देवं प्रयच्छंतं मुदान्वितम् ॥१२३॥ एवं ध्यात्वार्चयेत्पीठे वैष्णवे सुसमाहितः । आद्यावरणसंगैः स्याच्चक्रशंखगदासिभिः ॥१२४॥ मुशलाढ्यधनुःपाशांकुशैः प्रोक्तं द्वितीयकम् । सनकादिकशाक्तेयव्यास नारदशौनकैः ॥१२५॥ तृतीयं लोकपालैस्तु चतुर्थं परिकीर्तितम् । लक्षं जपो दशांशेन घृतेन हवनं स्मृतम् ॥१२६॥ एवं सिद्ध मनो मंत्री प्रयोगानथुपाचरेत् । धीवृक्षमूले देवेशं ध्यायन्वै रोगिणं स्मरन् ॥१२७॥ स्पृष्ट्वा जप्त्वायुतं साध्यं स्मृत्वा वा मनसा द्विज । रोगिणं रोगनिर्मुक्ति कुर्यान्मंत्री तु मंडलात् ॥१२८॥ कन्यार्थी जुहुयाल्लाजैर्बिल्वैश्चापि धनार्थये । वस्त्रार्थी गन्धकुसुमैरारोग्याय तिलैर्हुनेत् ॥१२९॥ रविवारे जले स्थित्वा नाभिमात्रे जपेत्तु यः । अष्टोत्तरसहस्रं वै सज्ज्वरं नाशयेद् ध्रुवम् ॥१३०॥ विवाहार्थं जपेन्मासं शशीमण्डलमध्यगम् । ध्यात्वा कृष्णं लभेतकन्यां वांच्छितां चापि नारद ॥१३१॥ वसुदेवपदं प्रोच्य निगड़च्छेदशब्दतः । वासुदेवाय वर्मान्ते स्वाहांतो मनुरिरितः ॥१३२॥ त्र हैं । प्रथम के शौनक ऋषि तथा विराट् छन्द है । शेष तीन मंत्रों के पराशर, व्यास तथा नारद ऋषि हैं, विराट् छंद है और देवता परब्रह्मात्मक हरि हैं । बीज और शक्ति तो पूर्व मंत्र की ही तरह समझनी चाहिये ॥११९-११९३॥ इसकी सिद्धि के लिए कृष्ण का इस तरह ध्यान करे कि उनकी चार भुजायें हैं । चारों में शंख, चक्र आदि विद्यमान हैं । वे मुकुट तथा समस्त आयुधों को धारण किये हुए हैं । गरुड़ पर आसीन हैं । सनकादि मुनि- गण तथा देववृन्द उनकी उपासना कर रहे हैं । लक्ष्मी उनके साथ हैं । उदयकालीन सूर्य के समान उनकी कान्ति है । प्रातःकालीन सहस्र दिनकरों के तुल्य चमकने वाले उनके कुंडल हैं । वे समस्त लोकों के रक्षक, अनन्त तथा नित्य हैं । वे प्रसन्नता से भक्तों को अभयदान एवम् वरदान देते हैं । इस प्रकार ध्यान कर समाहित चित्त से वैष्णव पीठ पर भगवान् का पूर्ववत् पूजन करे । इनका प्रथम आवरण अंगों द्वारा सम्पन्न होता है । चक्र, शंख, गदा, खड्ग, मुसल, धनुष, पाश तथा अंकुश-इनसे द्वितीय आवरण बनता है । सनक आदि चार महात्मा पराशर, व्यास, नारद तथा शौनक से तृतीय आवरण बनता है । लोकपालों द्वारा चौथा आवरण पूरा होता है । (पांचवें आवरण में वज्र आदि आयुधों की पूजा होती है ।) इस मंत्र का एक लाख जप और घृत से दशांश हवन किया जाता है । मन्त्र सिद्ध हो जाने पर साधक उसका प्रयोग करे ॥१२०-१२६३॥ बिल्ववृक्ष के नीचे देवेश का ध्यान कर रोगी का स्पर्श या स्मरण करके दश हजार मंत्र-जप करे । ऐसा करने से रोगी का रोग तत्काल दूर हो जाता है । जो कन्या की इच्छा करता है, वह लावे से हवन करे । धनार्थी विल्व- फलों से, वस्त्रार्थी सुगंधित पुष्पों से और आरोग्य चाहने वाला व्यक्ति तिलों से हवन करे । जो व्यक्ति रविवार को नाभिमात्र जल में खड़ा होकर एक सो आठ बार इस मंत्र को जपेगा, वह निःसंदेह ज्वर को छुड़ा देगा । नारद ! जो व्यक्ति विवाह की अभिलाषा करता है, वह चन्द्रमंडल के मध्यगामी कृष्ण का ध्यान कर एक मास तक इस मंत्र का जप करे । ऐसा करने से मनोवांछित कन्या उसे मिलती है । इस मंत्र के ऋषि नारद, छंद