बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकाशीतितमोऽध्यायः ७४१ नारदोऽस्य ऋषिश्च्छन्दो गायत्री कृष्णदेवता । वम्र्म बीजं शिरः शक्तिरन्यत्सर्वं दशाणंवत् ॥१३३॥ बालः पवनदीर्घेन्दुयुक्तो झिटीशयुर्जलम् । अत्रिव्यासाय हृदयं मनुरष्टाक्षरोऽवतु ॥१३४॥ ब्रह्मानुष्टुप्मुनिश्च्छन्दो देवः सत्यवतीसुतः । आद्यं बीजं नमः शक्तिर्दीर्घाढ्यो नाविनांगकम् ॥१३५॥ व्याख्यामुद्रिकया लसत्करतलं सद्योगपीठस्थितं वामे जानुतले दधानमपरं हस्तं सुविद्यानिधिम् । विप्रव्रातवृतं प्रसन्नवदनं पाथोहद्युतिं पाराशर्यमतीव पुण्यचरितं व्यासं स्मरेत्सिद्धये ॥१३६॥ जपेदष्टसहस्राणि पायसैर्होममाचरेत् । पूर्वोक्तपीठे व्यासस्य पूर्वमंगानि पूजयेत् ॥१३७॥ प्राच्यादिषु यजेत्पैलं वैशंपायनजैमिनी । सुमंतुं कोणभागेषु श्रीशुकं रोमहर्षणम् ॥१३८॥ उग्रश्रवसमन्यांश्च मुनीन्सेंद्रादिकायुधान् । एवं सिद्धमनुर्मंत्री कवित्वं शोभनाः प्रजाः १३६॥ व्याख्यानशक्तिं कीर्तिं च लभते संपदां चयम् । नृसिंहो माधवो दृष्टो लोहितो निगमादिमः ॥१४०॥ कृशानुजाया पञ्चार्णो मनुर्विषहरः परः । अनंतपंक्तिपक्षीन्द्रा मुनिश्च्छन्दःसुरा मताः ॥१४१॥ तारवह्निप्रिये बीजशक्ती मन्त्रस्य कीर्तिते । ज्वल ज्वल महामंत्रो स्वाहा हृदयमीरितम् ॥१४२॥ गरुडेति पदस्यांते चूडाननशुचिप्रिया । शिरोमन्त्रो गरुडतः शिखे स्वाहा शिखा मनुः ॥१४३॥ गरुडेति पदं प्रोच्य प्रभंजययुगं वदेत् । प्रभेदययुगं पश्चाद्वित्रासय विमर्दय ॥१४४॥ प्रत्येकं द्विरतस्तः स्वाहा कवचस्य मनुर्मतः । उग्ररूपधरांते तु सर्वविषहरेति च ॥१४५॥ गायत्री, देवता कृष्ण, बीज कवच और शक्ति शिर है। दशाक्षर मंत्र की तरह इसको भी सारी क्रियायें करनी चाहिये ॥१२७-१३३॥ बाल (व्) पवन (य्) ये दोनों अक्षर दीर्घ आकार और अनुस्वार से युक्त हों और झिटीश (एकार) से युक्त जल (व्) हो, तत्पश्चात् अत्रि अर्थात् दकार हो और उसके बाद 'व्यासाय' पद के अन्त में हृदय (नमः) का प्रयोग हो तो यह (व्यां वेदव्यासाय नमः) अष्टाक्षर मंत्र बनता है। यह सबकी रक्षा करे। इसके मुनि ब्रह्मा, छंद अनुष्टुप्, देवता व्यास, बीज व्यां और शक्ति नमः है। दीर्घमात्रायुक्त बीजाक्षर (व्यां व्यीं व्यूं व्यै व्यौं व्यः) अंगन्यास कर मंत्रसिद्धि के लिये व्यास का ध्यान करे कि वे योगपीठ पर अवस्थित हैं। उनका एक हाथ व्याख्यामुद्रा से सुशोभित है। दूसरा हाथ बायें ठेहुने पर रखा हुआ है। वे सद्विद्या की निधि कहलाते हैं। ब्राह्मणों के समस्त व्रतों का आचरण करते हैं। उनका चित्त सदा प्रसन्न रहता है। उनके अंगों की कान्ति कमल के समान है। उनका चरित्र पवित्र है। वे पराशर के पुत्र हैं। ऐसा ध्यान कर आठ हजार जप करे और (उसका दशांश) खीर से होमे। पूर्वोक्तपीठ पर पहिले व्यास के अंगों का पूजन करे। पश्चात् पूर्व आदि दिशा में पैल, वैशंपायन तथा जैमिनि की और (अग्नि आदि) कोणों में श्रीशुक, रोमहर्षण, उग्रश्रवा, अन्यमुनिगण तथा आयुध सहित इन्द्र आदि देवों की अर्चना करे। इस प्रकार मंत्रसिद्धि हो जाने पर साधक को कवित्वशक्ति, व्याख्यानशक्ति, सुन्दर प्रजा, कीर्ति तथा सम्पत्ति की प्राप्ति होती है ॥१३४-१३९३॥ “नृसिंह स्वाहा” यह पंचाक्षर मन्त्र विषशमन करने वाला है। इसके मुनि अनंत, छंद पंक्ति, देवता गरुड, बीज ओं और शक्ति स्वाहा है। “ज्वल ज्वल महामंत्रो स्वाहा” यह हृदयमन्त्र है। “गरुड़ चूडानन शुचिप्रिया” यह शिरोमंत्र है। “गरुडतः शिखे स्वाहा” यह शिखामन्त्र है। “गरुड प्रभंजय युगम् प्रभेदय युगम् वित्रासय वित्रासय विमर्दय विमर्दय स्वाहा” यह कवच मन्त्र है। “उग्ररूपधर सर्वविषहर भीषण द्वितयम् सर्वम् दह-दह भस्मी कुरु स्वाहा” यह नेत्रमन्त्र है। “अप्रतिहतबलाय प्रहृते शासनाय हुँ फट् स्वाहा” यह अस्त्र मन्त्र है। गरुडमन्त्र