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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 761, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 761

७४२ नारदीयपुराणम् भीषणद्वितयं प्रोच्य सर्वं दहवहेति च । भस्मीकुरु ततः स्वाहा नेत्रमन्त्रोऽयमीरितः ॥१४६॥ अप्रतिहतवर्णांते बलाय प्रहतेति च । शासनांते तथा हुं फट् स्वाहास्त्रमनुरीरितः ॥१४७॥ पादे कटौ हृदि मुखे मूर्ध्नि वर्णान्प्रविन्यसेत् ॥१४८॥ तप्तस्वर्णनिभं फणींद्रनिकरैःक्लृप्तांगभूषं प्रभुं स्मर्तॄणां शमयन्तमुग्रमखिलं नृणां विषं तत्क्षणात् । चंच्वग्रप्रचलद्भुजंगमभयं पाण्योर्वरं बिभ्रतं पक्षोच्चारितसामगीतममलं श्रीपक्षिराजं भजे ॥१४९॥ पञ्चलक्षं जपेन्मंत्रं दशांशं जुहुयात्तिलैः । पूजयेन्मातृकापीठे गरुडं वेदविग्रहम् ॥१५०॥ चतुर्थ्यन्तः पक्षिराजः स्वाहा पीठ मनुः स्मृतः । इष्ट्वांगं कर्णिकामध्ये नागान्यंत्रेषु पूजयेत् ॥१५१॥ तद्बहिर्लोकपालांश्च वज्राद्यैर्विलसत्करान् । एवं सिद्धमनुर्मंत्री नाशयेद्गरलद्वयम् । देहांते लभते चापश्रीविष्णोः परमं पदम् ॥१५२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे कृष्णादिमन्त्रभेदनिरूपणं नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥८१॥


की सिद्धि के लिये चरण, कटि, हृदय, मुख तथा मस्तक पर मन्त्रवर्णों का न्यास कर ध्यान करे कि तप्त सुवर्ण के समान गरुड़ की कान्ति है। सर्पों के कृत्रिम आभूषणों से उनके अंगों की अपूर्व शोभा हो रही है। वे अपने स्मरण करने वाले मनुष्यों के विष को तत्क्षण दूर कर देते हैं ॥१४०-१४८½॥ अपने चंगुलों में बड़े-बड़े भयानक सर्पों को फँसा कर चोंच से उन्हें क्षतविक्षत कर रहे हैं। पंखों से सामगान कर रहे हैं। ऐसे पक्षिराज को नमस्कार है। इस तरह ध्यान कर पाँच लाख मन्त्र जप करे और उसका दशांश तिल से हवन करे। "पक्षिराजाय स्वाहा" यह हवन का मन्त्र है । तदनन्तर मातृकापीठ पर वेदमूर्ति गरुड़ का पूजन करे। केसरों पर अङ्गदेवों तथा यंत्रों पर नागों की पूजा कर बाहर वज्र आदि आयुधों समेत लोकपालों की पूजा करे। इस तरह मन्त्र, सिद्ध हो जाने से मन्त्री को विष दूर करने का सामर्थ्य प्राप्त होता है और वह देहान्त होने पर विष्णुलोक को जाता है ॥१४९-१५२॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में कृष्णादिमन्त्रभेदनिरूपण नामक इक्यासीवां अध्याय समाप्त ॥८१॥