बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 762, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्व्यशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच किं त्वं नारद जानासि पूर्वजन्मनि यत्त्वया । प्राप्तं भगवतः साक्षाच्छूलिनो युगलात्मकम् कृष्णमंतररहस्यं च स्मर विस्मृतिमागतम् । ॥१॥ सूत उवाच ॥२॥ इत्युक्तो नारदो विप्राः कुमारेण तु धीमता ध्याने विवेशाशु चिरं चरितं पूर्वजन्मनः । ततश्चिरं ध्यानपरो नारदो भगवत्प्रियः ॥३॥ ज्ञात्वा सर्वं सुवृत्तांतं सुप्रसन्नाननोऽब्रवीत् । भगवन्सर्ववृत्तांतः पूर्वकल्पसमुद्भवः ॥४॥ मम स्मृतिमनुप्राप्तो विना युगललंभनम् । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य महात्मनः ॥५॥ सनत्कुमारो भगवान् व्याजहार यथातथम् । शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि यस्मिञ्जन्मनि शूलिनः ॥६॥ सनत्कुमार उवाच प्राप्तं कृष्णरहस्यं वै सावधानो भवाधुना । अस्मात्सारस्वतत्कल्पात्पूर्वस्मिन्पंचविंशके ॥७॥ कल्पे त्वं काश्यपो जातो नारदो नाम नामतः । तत्रैकदा त्वं कैलासं प्राप्तः कृष्णस्य योगिनः ॥८॥ संप्रष्टुं परमं तत्त्वं शिवं कैलासवासिनम् । त्वया पृष्टो महादेवो रहस्यं स्वप्रकाशितम् ॥६॥ कथयामास तत्त्वेन नित्यलीलांनुगं हरेः । ततस्तदन्ते तु पुनस्त्वया विज्ञापितो हरः ॥१०॥ अध्याय ८२ राधाकृष्ण-सहस्र-नाम-स्तोत्र सनत्कुमार बोले- नारद ! क्या तुम जानते हो कि पूर्वजन्म में तुमने साक्षात् भगवान् शङ्कर से युगल नाम वाले कृष्णमन्त्र के रहस्य को प्राप्त किया था। यदि विस्मृत हो गया हो तो स्मरण करो ॥१३॥ सूत बोले- विप्रवृन्द ! धीमान् सनत्कुमार के यह कहने पर नारद ने शीघ्र ही अपने पूर्वजन्म के चरित्र का ध्यान किया। चिरकाल तक ध्यानपरायण होने के उपरान्त भगवत्प्रिय नारद समस्त वृत्तान्त को जानकर सुप्रसन्न मुख से बोले- 'भगवन् ! पूर्व कल्प का सारा वृत्तान्त तो मुझे मालूम हो गया, परन्तु युगल मन्त्र का स्मरण नहीं हो सका ।' महात्मा नारद की यह बात सुनकर भगवान् सनत्कुमार यथार्थतः सब बातें बताने लगे ॥२-५३॥ सनत्कुमार बोले- विप्र ! जिस जन्म में तुमने कृष्ण के रहस्य को प्राप्त किया था, वह अभी मैं बता देता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। इस सारस्वत कल्प से पहिले पचीसवें कल्प में तुम कश्यप के पुत्र हुए थे, तुम्हारा नाम नारद था। एक समय तुम कैलासवासी शिव से योगी कृष्ण के परम तत्त्व को पूछने के लिये कैलास पर्वत पर गये । तुम्हारे पूछने पर महादेव ने अपने आप प्रकाशित होने वाले हरि की नित्य लीला रूप रहस्य को तत्त्वतः समझा दिया। अन्त में पुनः तुमने हर से निवेदन किया कि मैं हरि की नित्य लीला को