बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७४४ नारदीयपुराणम् नित्यां लीलां हरेर्द्रष्टुं तथा प्राह सदाशिवः। गोपीजनपदस्यांते वल्लभैति पदं ततः ॥११॥ चरणाच्छरणं पश्चात्प्रपद्ये इति वै मनुः । मंत्रस्यास्य ऋषिः प्रोक्तो सुरभिश्चन्द एव च ॥१२॥ गायत्री देवता चास्य बल्लवीवल्लभो विभुः । प्रपन्नोऽस्मीति तद्भक्तौ विनियोग उदाहृतः ॥१३॥ नास्य सिद्धादिकं विप्र शोधनं न्यासकल्पनम् । केवलं चिंतनं सद्यो नित्यलीलाप्रकाशकम् ॥१४॥ आभ्यंतरस्य धर्मस्य साधनं वच्मि सांप्रतम् । संगृह्य मन्त्रं गुरुभक्तियुक्तो विचिंत्य सर्वं मनसा तदीहितम् ॥१५॥ कृपां तदीयां निजधर्मसंस्थो विभावयन्नात्मनि तोषयेद्गुरुम् ॥१६॥ सतां शिक्षेत वै धर्मान्प्रपन्नानां भयापहान् । ऐहिकामुष्मिकींचिताविधुरान् सिद्धिदायकान् ॥१७॥ स्वेष्टदेवधिया नित्यं तोषयेद्वैष्णवांस्तथा । भर्त्सनादिकमेतेषां न कदाचिद्विचिंतयेत् ॥१८॥ पूर्वकर्मवशाद्भोग्यमैहिकं भोग्यमेव च । आयुष्यकं तथा कृष्णः स्वयमेव करिष्यति ॥१९॥ श्रीकृष्णं नित्यलीलास्थं चिंतयेत्स्वधियानिशम् । श्रीमदर्चावतारेण कृष्णं परिचरेत्सदा ॥२०॥ अनन्यचिंतनीयोऽसौ प्रपन्नैः शरणार्थिभिः । स्वेष्टं च देहगेहादावुदासीनतया बुधैः ॥२१॥ गुरोरवज्ञां साधूनां निंदां भेदं हरे हरौ । वेदनिंदां हरेर्नामबलात्पापसमीहनम् ॥२२॥ अर्थवादं हरेर्नाम्नि पाषंडं नामसंग्रहे । अलसे नास्तिके चैव हरिणामोपदेशनम् ॥२३॥ नामविस्मरणं चापि नाम्न्यानादरमेव च । संत्यजेद् दूरतो वत्स दोषानेतान्सुदारुणान् ॥२४॥ प्रपन्नोऽस्मीति सततं चिंतयेद्धृद्गतं हरिम् । स एव पालनं नित्यं करिष्यति ममेति च ॥२५॥ देखना चाहता हूँ। तब सदाशिव ने कहा—'गोपीजन' इस पद के अन्त में 'वल्लभ' इस पद को जोड़ दीजिए। तत्पश्चात् 'चरण' फिर 'शरण' और अन्त में 'प्रपद्ये' इतने को रख दीजिए। इस प्रकार मन्त्र बनेगा—'गोपीजन वल्लभचरणाञ्छरणं प्रपद्ये' इस मन्त्र के ऋषि सुरभि हैं, छन्द गायत्री है और देवता गोपिकावल्लभ हैं। कृष्ण की भक्ति में 'मैं शरणागत हूँ' ऐसा विनियोग कहा गया है ॥१६-१३॥ विप्र ! इस मन्त्र में न्यास, शुद्धि तथा सिद्ध आदि करने की आवश्यकता नहीं है। केवल चिंतन करने से सत्य नित्य लीला का प्रकाश दिखाई देता है। अब मैं आभ्यन्तर धर्म का साधन बताता हूँ ॥१४-१५॥ मन्त्र की दीक्षा लेकर गुरु की भक्ति करते हुए उनकी समस्त इच्छाओं का ध्यान रखे। अपने धर्म पर आरूढ़ होकर मन में गुरु कृपा की भावना को रखते हुए उनको संतुष्ट करे। शरण में आये सज्जनों को भय दूर करने वाले ऐहलौकिक एवम् पारलौकिक चिंता को मिटाने वाले तथा सिद्धि देने वाले धर्मों का उपदेश करे। अपन। इष्ट देव समझकर नित्य वैष्णवों को संतुष्ट करे। उनकी निन्दा आदि कभी न करे ॥१६-१८॥ ऐसे व्यक्ति को पूर्वजन्मार्जित कर्म के तारतम्य से ऐहलौकिक भोग एवम् आयु का प्रदान स्वयं कृष्ण ही करते हैं। साधक नित्य लीला करते हुए कृष्ण का चिन्तन अहर्निश किया करे। सम्यक् प्रकार से हरि का पूजन करे। उनका शरणागत होकर केवल उन्हीं की चिन्तना करे, अन्य की नहीं। शरीर, गृह आदि में उदासीनता का भाव रखे। गुरु का तिरस्कार, साधुओं की निंदा, हरि और हर में भेद बुद्धि, वेदनिंदा, हरिनाम को निंदा, बलात् पापों की इच्छा, हरिनाम में अर्थवाद, नामसंग्रह में पाखंड, आलसी और नास्तिक को हरिनाम का उपदेश, नामों का विस्मरण और नामों का अनादर—इन भयंकर दोषों का परित्याग करे। 'मैं शरणागत हूँ' ऐसा कहकर हृदय स्थित हरि का सतत चिन्तन करे। 'वही नित्य मेरा