बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 764, कुल 1008 में से
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[द्विसप्ततितमोऽध्यायः] ७४५
तवास्मि राधिकानाथ कर्मणा मनसा गिरा । कृष्णकांतेति चैवास्मि युवामेव गतिर्मम ॥२६॥ दासाः सखायः पितरः प्रेयस्यश्च हरेरिह । सर्वे नित्या मुनिश्रेष्ठ चिंतनीया महात्मभिः ॥२७॥ गमनागमनेनित्यं करोति वनगोष्ठयोः । गोचारणं वयस्यैश्च विनासुरविघातनम् ॥२८॥ सखायो द्वादशाख्याता हरेः श्रीदामपूर्वकाः । राधिकायाः सुशीलाद्याः सख्यो द्वात्रिंशदीरिताः ॥२९॥ आत्मानं चिंतयेत्तत्र तासां मध्ये मनोरमाम् । रूपयौवनसंपन्नां किशोरीं च स्वलंकृताम् ॥३०॥ नानाशिल्पकलाभिज्ञां कृष्णभोगानुरूपिणीम् । तत्सेवनसुखाह्लादभावेनातिसुनिर्वृताम् ॥३१॥ ब्राह्मं मुहूर्तमारभ्य यावदर्थनिशा भवेत् । तावत्परिचरेत्तौ तु यथाकालानुसेवया ॥३२॥ सहस्रं च तयोर्नाम्नां पठेन्नित्यं समाहितः । एतत्साधनमुद्दिष्टं प्रपन्नानां मुनीश्वर ॥३३॥ नाख्येयं कस्यचित्तुभ्यं मया तत्त्वं प्रकाशितम् ।
सनत्कुमार उवाच ततस्त्वं नारद पुनः पृष्टवान्वै सदाशिवम् ॥३४॥ नाम्नां सहस्रं तच्चापि प्रोक्तवांस्तच्छृणुष्व मे । ध्यात्वा वृन्दावने रम्ये यमुनातीरसङ्गतम् ॥३५॥ कल्पवृक्षं समाश्रित्य तिष्ठंतं राधिकायुतम् । पठेन्नामसहस्रं तु युगलाख्यं महामुने ॥३६॥ देवकीनन्दनः शौरिर्वासुदेवो बलानुजः । गदाग्रजः कंसमोहः कंससेवकमोहनः ॥३७॥ भिन्नार्गलो भिन्नलोहः पितृवाह्यः पितृस्तुतः । मातृस्तुतः शिवध्येयो यमुनाजलभेदनः ॥३८॥ व्रजवासीव्रजानंदी नंदबालो दयानिधिः । लीलाबालः पद्मनेत्रो गोकुलोत्सव ईश्वरः ॥३९॥ गोपिकानंदनः कृष्णो गोपानंदः सतां गतिः । बकप्राणहरो विष्णुर्बकमुक्तिप्रदो हरिः ॥४०॥
पालन करेंगे ॥१९-२५॥ राधिकानाथ ! मैं मनसा, वाचा, कर्मणा आप ही का हूँ । मैं आपका प्रिय हूँ, आप दोनों (राधा और कृष्ण) ही मेरी गति हैं ।'--ऐसा कहा करे । मुनिश्रेष्ठ ! महात्माओं को चाहिये कि वे हरि के दास, सखा, पितर तथा प्रेयसी का सदा चिन्तन करे । 'कृष्ण नित्य वृन्दावन और व्रज में आते जाते हैं तथा बिना देवताओं को क्षति पहुँचाये सखाओं के साथ गो चराते हैं ।'--ऐसी भावना करे । हरि के श्रीदामा आदि बारह सखा हैं और राधिका सुशीला आदि बत्तीस सखियाँ हैं । उन सखियों के बीच अपने को मनोरमा, रूपयौवनसंपन्ना, किशोरी, सु-अलंकृता, अनेक शिल्पकलाओं को जानने वाली, कृष्ण के भोग के अनुरूप और उनके सेवन जन्य सुख से आनन्दविभोर होने वाली सखी समझे । ब्राह्ममुहूर्त से लेकर आधी रात तक समय के अनुसार उनको परिचर्या करे । नित्य सावधान होकर राधा-कृष्ण के सहस्र नामों का पाठ करे । मुनीश्वर ! भक्तों के लिये यही साधन बतलाया गया है । यह तत्त्व किसी से प्रकाशित नहीं करना चाहिये । केवल तुमसे ही मैंने कहा है' ॥२६-३३१/२॥
सनत्कुमार बोले-- नारद ! तदुपरान्त तुमने सदाशिव से पुनः प्रश्न किया । तब जो उन्होंने सहस्र नामों के विषय में बतलाया, वह मुझसे सुनो । महामुने ! रमणीय वृन्दावन में यमुना के तट पर स्थित कल्पवृक्ष के समीप निवास करते हुए राधा-कृष्ण के युगल रंजक सहस्रनाम का पाठ करना चाहिये ॥३४-३६॥ (जैसे--)
देवकी नंदन, शूरसंतति, वासुदेव, बलानुज, गदाग्रज, कंस को मोहने वाले, कंस के सेवकों को मोहने वाले, (कारागार के किवाड़ों) की अर्गला तोड़ने वाले, लोहा (लोहे की हथकड़ी और बेड़ी को) तोड़ने वाले, पिता के द्वारा सिर पर वहन करने योग्य (शिशुरूप श्रीकृष्ण) वह पितृस्तुत, मातृस्तुत, शिव के ध्येय, यमुनाजल का भेदन करने वाले, व्रजवासी, ब्रजानन्दी, नन्दबालक, दयानिधि, लीलाशिंशु, कमलाक्ष, गोकुलोत्सव, ईश्वर, गोपिकानन्दन, कृष्ण, गोपानन्द, सज्जनों की गति, बकासुर के प्राण हरण करने वाले, विष्णु, बकासुर को मोक्ष देने वाले ॥३७-४०॥
६४ ना० पु०