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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 765, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 765

७४६ नारदीयपुराणम् बलदोलाशयशयः श्यामलः सर्वसुंदरः । पद्मनाभो हृषीकेशः क्रोडामनुजबालकः ॥४१॥ लीलाविध्वस्तशकतो वेदमंत्राभिषेचितः । यशोदानंदनः कांतो मुनिकोटीनिषेवितः ॥४२॥ नित्यं मधुवनावासी वैकुंठः संभवः क्रतुः । रमापतिर्यदुपतिर्मुरारिर्मधुसूदनः ॥४३॥ माधवो मानहारी च श्रीपतिर्भूधरः प्रभुः । बृहद्वनमहालीलो नंदसूनुर्महासनः ॥४४॥ तृणावर्तप्राणहारी यशोदाविस्मयप्रदः । त्रैलोक्यवक्त्रः पद्माक्षः पद्महस्तः प्रियंकरः ॥४५॥ ब्रह्मण्यो धर्मगोप्ता च भूपतिः श्रीधरः स्वराट् । अजाध्यक्षः शिवाध्यक्षो धर्माध्यक्षो महेश्वरः ॥४६॥ वेदांतवेद्यो ब्रह्मस्थः प्रजापतिरमोघदृक् । गोपीकराविलंबी च गोपबालकसुप्रियः ॥४७॥ बालानुयायी बलवान् श्रीदामप्रिय आत्मवान् । गोपीगृहांगणरतिर्भद्रः सुश्लोकमंगलः ॥४८॥ नवनीतहरो बालो नवनीतप्रियाशनः । बालवृन्दी मर्कवृन्दी चकिताक्षः पलायितः ॥४९॥ यशोदातर्जितः कंपी मायारुदितशोभनः । दामोदरोऽप्रमेयात्मा दयालुर्भक्तवत्सलः ॥५०॥ सुबद्धोलूखले नम्रशिरा गोपीकदर्थितः । वृक्षभंगी शोकभंगी धनदात्मजमोक्षणः ॥५१॥ देवर्षिवचनश्लाघी भक्तवात्सल्यसागरः । व्रजकोलाहलकरो व्रजानंदविवर्द्धनः ॥५२॥ गोपात्मा प्रेरकः साक्षी वृन्दावननिवासकृत् । वत्सपालो वत्सपतिर्गोपोदारकमंडनः ॥५३॥ बालक्रीडो बालरतिर्बालकः कनकांगदी । पीताम्बरो हेममाली मणिमुक्ताविभूषणः ॥५४॥ किंकिणीकटकी सुत्री नूपुरी मुद्रिकान्वितः । वत्सासुरपतिध्वंसी बकासुरविनाशनः ॥५५॥ हरि, बलराम के चंचल चित्त में अवस्थित होने वाले, श्यामल, सब प्रकार से सुन्दर, पद्मनाभ, हृषीकेश, मनुज- बालक की तरह क्रीड़ा करने वाले, लीला से शकट का विध्वंस करने वाले, वेद-मन्त्रों से अभिषिक्त होने वाले, यशोदापुत्र, कांत, करोड़ों मुनियों से सुसेवित, नित्य मधुवन में वास करने वाले, वैकुण्ठ (वैकुण्ठधाम के अधिपति), संभव (सबकी उत्पत्ति के स्थान), क्रतु, रमापति, यदुपति, मुरारि, मधुसूदन, माधव, मानहारी, श्रीपति, भूधर, प्रभु, महावन में बड़ी-बड़ी लीला करने वाले, नन्दसूनु, महान् आसन वाले, तृणावर्त के प्राण हरने वाले, यशोदा को विस्मय में डालने वाले, त्रैलोक्यमुख, पद्माक्ष, पद्म हस्त, प्रिय (कार्य) करने वाले, ब्रह्मण्य, (ब्राह्मणहितकारी), धर्मगोप्ता, भूपति, श्रीधर, स्वराट् (स्वयं प्रकाश) अजाध्यक्ष (ब्रह्मा के स्वामी), शिवाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, महेश्वर ॥४१-४६॥ वेदांतवेद्य, ब्रह्मस्थ, प्रजापति, अमोघदृक्, गोपीकराव लम्बी, गोप- बालकों के अत्यन्त प्रिय, बलानुयायी, बलवान्, श्रीदामप्रिय, आत्मवान्, गोपियों के गृहांगणों से अनुराग करने वाले, भद्र, अत्यन्तमंगलरूप, मक्खन चुराने वाले, बाल, नवनीत को रुचि से खाने वाले, बालकों एवम् बन्दरों को खिलाने वाले, चकिताक्ष, भागने वाले, यशोदा से पीटे जाने वाले, कांपने वाले, माया से सुन्दरतया रोदन करने वाले, दामोदर, अप्रमेयात्मा, दयालु, भक्तवत्सल, ओखली से बाँधे जाने पर अवनत शिर वाले, गोपियों की भर्त्सना सहने वाले, वृक्षों को तोड़ने वाले, शोक भंग करने वाले, कुबेर के पुत्रों को मुक्त करने वाले, देवर्षि के वचन से श्लाघा करने वाले, भक्तवत्सलता के समुद्र, व्रज में कोलाहल करने वाले, व्रजवासियों का आनन्द बढ़ाने वाले ॥४७-५२॥ गोपात्मा, प्रेरक, साक्षी, वृन्दावन में निवास करने वाले, वत्सपाल, वत्सपति, गोप-बालकों के शिरमुकुट, बालकों के साथ क्रीड़ा करने वाले, शिशुओं से प्रेम करने वाले, बालक, सुवर्ण के केयूर पहनने वाले, पीताम्बर, सुवर्णमाली, मणि-मुक्ताओं के आभूषण धारण करने वाले, किंकिणी, कटक, सूत्र, नूपुर तथा मुद्रिका पहनने वाले, वत्सासुर के पति का नाश करने वाले, बकासुर को समाप्त करने वाले, अघासुर का विध्वंस करने वाले, बालकों को जगाने वाले, आद्य, आत्मप्रद, संज्ञी, यमुना के तट पर भोजन करने वाले, गोपाल-मण्डली के