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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 766, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 766

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७४७ अघासुरविनाशी च विनिद्रीकृतबालकः । आद्य आत्मप्रदः संगी यमुनातीरभोजनः ॥५६॥ गोपालमंडलीमध्यः सर्वगोपालभूषणः । कृतहस्ततलग्रासो व्यंजनाश्रितशाखिकः ॥५७॥ कृतबाहुशृंगयष्टिगुं जालं कृतकंठकः । मयूरपिच्छमुकुटो वनमालविभूषितः ॥५८॥ गैरिकार्चित्रितवपुर्नवमेघवपुः स्मरः । कोटिकंदर्पलावण्यो लसन्मकरकुंडलः ॥५६॥ आजानुबाहुर्भगवान्निद्रारहितलोचनः । कोटिसागरगांभीर्यः कालकालः सदाशिवः ॥६०॥ विरंचिमोहनवपुर्गोपवत्सवपुर्धरः । ब्रह्मांडकोटिजनको ब्रह्ममोहविनाशकः ॥६१॥ ब्रह्मा ब्रह्माडितः स्वामी शक्रदर्पादिनाशनः । गिरिपूजोपवेष्टा च धृतगोवर्धनाचलः ॥६२॥ पुरंदरेडितः पूज्यः कामधेनुप्रपूजितः । सर्वतीर्थाभिषिक्तश्च गोविंदोगो परक्षकः ॥६३॥ कालियांतिकरः क्रूरो नागपत्नीडितो विराट् । धेनुकारिः प्रलंबारिवृषासुरविमर्दनः ॥६४॥ मायासुरात्मजध्वंसी केशिकंठविदारकः । गोपगोप्ता धेनुगोप्ता दावाग्नपरिशोषकः ॥६५॥ गोपकन्यावस्त्रहारी गोपकन्यावरप्रदः । यज्ञपत्न्यन्नभोजी च मुनिमानापहारकः ॥६६॥ जलेशानमानमथनो नन्दगोपालजीवनः । गन्धर्वशापमोक्ता च शंखचूडशिरोहरः ॥६७॥ वंशीवटी वेणुवादी गोपीचिन्तापहारकः । सर्वगोप्ता समाह्वानः सर्वगोपीमनोरथः ॥६८॥ व्यंगद्यमंत्रवक्ता च गोपोमण्डलमोहनः । रासक्रीडारसास्वादी रसिको राधिकाधवः ॥६६॥ किशोरीप्राणनाथश्च वृषभानसुताप्रियः । सर्वगोपीजनानंदी गोपीजनविमोहनः ॥७०॥ गोपिकागीतचरितो गोपीनर्तनलालसः । गोपीस्कंधाश्रितकरो गोपिकाचुम्बनप्रियः ॥७१॥ मध्य में रहने वाले, समस्त गोपालों के भूषण, हथेली पर रख कर भोजन करने वाले, वृक्षों की शाखाओं पर चढ़ने वाले, हाथ में लाठी रखने वाले, गुंजा से अलंकृत कंठ वाले, मुकुट पर मयूर का पंख लगाने वाले, वनमाला से विभूषित, गेरु से शरीर को चित्रित करने वाले, नवीन मेघ के समान देह (कान्ति) वाले, सुन्दर, करोड़ कन्दर्प के समान लावण्य वाले, मकराकृति कुण्डल से सुशोभित, आजानुबाहु, भगवान्, निद्रा से रहित नेत्र वाले, करोड़ सागर के समान गंभीर, काल के (भी) काल, सदाशिव, ॥५३-६०॥ ब्रह्मा को मोहित करने वाले शरीर से युक्त, गोपों एवम् वत्सों के शरीर धारण करने वाले, कोटि ब्रह्मांड के उत्पादक, ब्रह्मा के मोह को दूर करने वाले, पद्मयोनिरूप, ब्रह्मा से स्तुत, स्वामी, इन्द्र के दर्प आदि नाश करने वाले, पर्वतपूजन का उपदेश करने वाले, गोवर्धनपर्वत को उठाने वाले, शक्र से स्तुत, पूज्य, कामधेनु से प्रपूजित, सकल तीर्थों के जल से अभिषिक्त, गोविंद, गोपरक्षक, कालिय नाग का दमन करने वाले, क्रूर, नागपत्नी द्वारा स्तुत, विराट, धेनुक के शत्रु, प्रलंब के शत्रु, वृषासुर का मर्दन करने वाले, मायामुर के आत्मज का विध्वंस करने वाले, केशी के कंठ को विदीर्ण करने वाले, गोपगोप्ता, धेनुगोप्ता, दावाग्निशोषक ॥६१-६५॥ गोपकन्याओं का वस्त्र चुराने वाले, गोपबालिकाओं को वर देने वाले, यज्ञ-पत्नियों का अन्न खाने वाले, मुनियों के मान का अपहरण करने वाले, वरुण का मान मथन करने वाले, नन्द और गोपालों के प्राणरक्षक, गन्धर्व का शापमोचन करने वाले, शंखचूड का शिर हरण करने वाले, वंशीवटी (वंशीवट के समीप लीला करने वाले), वेणुवादी (वंशी बजाने वाले), गोपियों की चिन्ता दूर करने वाले, सर्वरक्षक, जोर से बुलाने वाले, सकल गोपियों की कामना पूर्ण करने वाले, व्यंग्य वचन बोलने वाले, गोपियों के समूह को मोहित करने वाले, रस- क्रीड़ा का रसास्वादन करने वाले, रसिक, राधिकापति, किशोरी के प्राणनाथ, वृषभानु की पुत्री के प्रिय, सकल गोपीजन को आनन्द देने वाले ॥६६-७०॥ गोपिकाओं के गीत सुनने वाले, गोपियों का नाच देखने वाले, गोपियों