बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकाशीतितमोऽध्यायः ७३७ एककालं त्रिकालं वा यो गोविन्दं यजेन्नरः । स चिरायुर्निर्रातङ्को धनधान्यपतिर्भवेत् ॥७७॥ स्मृतिः सद्यान्विता चक्री दक्षकर्णयुतोधरा । नाथाय हृदयांतोऽयं वसुवर्णो महामनुः ॥७८॥ मुनिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदः कृष्णोऽस्य देवता । वर्णद्वंदैश्च सर्वेण पंचांगन्यासस्य कल्पयेत् ॥७९॥ पंचवर्षमतिलोलमंगणे धावमानमतिचंचलेक्षणम् । किंकिणीवलयहारनूपुरै रंजितं नमत गोपबालकम् ॥८०॥ एवं ध्यात्वा जपेदष्टलक्षं मंत्री दशांश । ब्रह्मवृक्षसमिद्भिम्श्च जुहुयात्पायसेन वा ॥८१॥ प्रागुक्ते वैष्णवे पीठे मतिं संकल्प्य मूलतः । तत्रावाह्यार्चयेत्कृष्णं मंत्री वै स्थिरमानसः ॥८२॥ केसरेषु चतुर्दिक्षु विविक्ष्वांगानि पूजयेत् । वासुदेवं बलं दिक्षु प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ॥८३॥ विदिक्षु रुक्मिणीसत्यभामे वै लक्ष्मणसंज्ञे । लोकेशांस्तायुधान्बाह्ये एवं सिद्धो भवेन्मनुः ॥८४॥ तारः श्रीभुवनाकाबो ङेन्तं श्रीकृष्णमीरयेत् । श्रीगोविंदं ततः प्रोच्य गोपीजनपदं ततः ॥८५॥ वल्लभाय ततः पद्मात्रयं तत्त्वाक्षरो मनुः । मुन्यादिकं च पूर्वोक्तं सिद्धगोपालकं स्मरेत् ॥८६॥ माधवीमंडपासीनौ गरुडेनाभिपालतौ । दिव्यक्रीडासु निरतौ रामकृष्णौ स्मरन् जपेत् ॥८७॥ पुजनं पूर्ववच्चास्य कर्तव्यं वैष्णवोत्तमैः । चक्री मुनिस्वरोपेतः सर्गी चैकाक्षरो मनुः ॥८८॥ कृष्णेति द्वयक्षरः प्रोक्तः कामादिः स्यात्त्रिवर्णकः । सैव ङेन्तो युगार्णः स्यात्कृष्णाय नम इत्यपि ॥८९॥ पंचाक्षरश्च कृष्णाय कामरुद्धस्तथा परः । गोपालायाग्निजायांतो रसवर्णः प्रकीर्तितः ॥९०॥ कामः कृष्णपदं ङन्तं वह्निजायांतकः परः । कृष्णगोविंदकौ ङन्तौ सप्तार्णः सर्वसिद्धिदः ॥९१॥
त्रिकाल गोविन्द की पूजा करता है, वह चिरायु, सुखी तथा धन-धान्यों का अधिपति होता है ॥७७-७७॥ सद्य (अ), सहित स्मृति (ग्) अर्थात् 'गो' दक्षिण कर्ण (उ) युक्त चक्री (क्) अर्थात् 'कु', धरा (ल) इन अक्षरों के पश्चात् 'नाथाय' पद और अन्त में हृदय (नमः) यह- 'गोकुलनाथाय नमः' महामन्त्र आठ अक्षरों का है । इसके मुनि ब्रह्मा, छंद गायत्री ओर देवता कृष्ण हैं। मंत्र के अष्टाक्षरों से पंचांगन्यास कर ध्यान करे कि कृष्ण पांच वर्षों के अत्यंत चंचल बालक हैं। वे आंगन में इधर-उधर दौड़ रहे हैं। उनकी आँखें अति चपल हैं। किंकिणी, वलय, नूपुर तथा हार से उनका शरीर सुशोभित है । ऐसे गोपबालक को नमस्कार करो । साधक इस तरह ध्यान कर आठ लाख मन्त्र को जपे और उसका दशांश पलाश की समिधाओं से या पायस से हवन करे। पश्चात् पूर्वोक्त वैष्णव पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति की स्थापना कर उसमें स्थिर चित्त से कृष्ण का आवाहनपूर्वक पूजन करे। फिर दिशा-विदिशाओं में केसरों पर अंग देवताओं की पूजा करनी चाहिये। दिशाओं में वासुदेव तथा बलराम की, विदिशाओं में प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध की और बाह्य प्रदेश में रुक्मिणी, सत्यभामा, लक्ष्मणा, जांबवती, लोकपालों तथा आयुधों की अर्चना करे। ऐसा करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है ॥७८-८४॥ तार (ॐ), श्री (श्रीं), भुवना (ह्रीं), काम (क्लीं) ङे विभक्तयन्त श्रीकृष्ण शब्द अर्थात् 'श्रीकृष्णाय' ऐसा ही गोविन्द पद (गोविन्दाय), फिर 'गोपीजनवल्लभाय' तत्पश्चात् तीन पद्मा (श्रीं श्रीं श्रीं) - यह (ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय श्रीं श्रीं श्रीं) तेईस अक्षरों का मन्त्र हैं। इसके मुनि आदि पूर्व मन्त्र को ही तरह समझना चाहिये। इसकी सिद्धि के लिये सिद्ध गोपाल का स्मरण करना चाहिये। पुनः माधवी लता के बने मण्डप में आसीन, गरुड़ द्वारा सुसेवित, दिव्य क्रीड़ा करने में निरत राम और कृष्ण का ध्यान करे। उत्तम विष्णुभक्त इस मन्त्र का पूजन पूर्ववत् ही करे। "चक्री (क्) आठवें स्वर (ऋ) से युक्त हो और उसके साथ विसर्ग भी हो तो 'कृः' यह एकाक्षर मन्त्र हो है। 'कृष्ण' यह दो अक्षरों का मन्त्र है। इसके आदि में क्लीं फा० १३