बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 768, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्व्यशीतितमोऽध्यायः ७४६ चाणूरघ्नो भयहरः शलारिस्तोशलांतकः । वैकुण्ठवासी कंसारिः सर्वदुष्टनिषूदनः ॥८७॥ देवदुंदुभिर्निर्घोषी पितृशोकनिवारणः । यादवेंद्रः सतांनाथो यादवारिप्रमर्दनः ॥८८॥ शौरिशोकविनाशी च देवकीतापनाशनः । उग्रसेनपरित्राता उग्रसेनाभिपूजितः ॥८६॥ उग्रसेनाभिषेकी च उग्रसेनदयापरः । सर्वसात्वतसाक्षी च यदूनामभिनंदनः ॥६०॥ सर्वमाथुरसंसेव्यः करुणो भक्तबांधवः । सर्वगोपालधनदो गोपीगोपाललालसः ॥६१॥ शौरिदत्तोपवीतो च उग्रसेनदयाकरः । गुरुभक्तो ब्रह्मचारी निगमाध्ययने रतः ॥६२॥ संकर्षणसहाध्यायी सुदामसुहृदेव च । विद्यानिधिः कलाकोशो मृतपुत्रप्रदस्तथा ॥६३॥ चक्री पांचजनी चैव सर्वनारकिमोचनः । यमार्चितः परो देवो नामोच्चारवशो (शो) ऽच्युतः ॥६४॥ कुब्जाविलासो सुभगो दीनबंधुरनूपमः । अक्रूरगृहगोप्ता च प्रतिज्ञापालकः शुभः ॥६५॥ जरासंधजयी विद्वान् यवनांतो द्विजाश्रयः । मुचुकुंदप्रियकरो जरासंधपलायितः ॥६६॥ द्वारकाजनको गूढो ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः । लीलाधरः प्रियकरो विश्वकर्मा यशःप्रदः ॥६७॥ रुक्मिणीप्रियसंदेशी रुक्मशोकविवर्द्धनः । चैद्यशोककालयः श्रेष्ठो दुष्टराजन्यनाशनः ॥६८॥ रुक्मिवैरूप्यकरणो रुक्मिणीवचने रतः । बलभद्रवचोग्राही मुक्तरुक्मी जनार्दनः ॥६६॥ रुक्मिणीप्राणनाथश्च सत्यभामापतिः स्वधम् । भक्तपक्षी भक्तिवश्यो ह्यक्रूरमणिदायकः ॥१००॥ शतधन्वाप्राणहारी ऋक्षराजसुताप्रियः । सत्राजित्तनयाकांतो मित्रविंदापहारकः ॥१०१॥ सत्यापतिर्लक्ष्मणाजिच्छूरो भद्राप्रियंकरः । नरकासुरघाती च लीलाकन्याहरो जयी ॥१०२॥ मुष्टिक के नाशक, कंसघाती, चाणूरमर्दक, भयहारी, शल के शत्रु, तोशल के संहारक, वैकुण्ठवासी, कंस के अरि, अखिल दुष्टों के नाशक, देवदुंदुभियों को बजाने वाले, पिता के शोक को मिटाने वाले, यादवों के प्रभु, सज्जनों के नाथ, यादवों के शत्रुओं को नष्ट करने वाले, शौरि के शोक का विनाश करने वाले, देवकीतापनाशन, उग्रसेन के रक्षक, उग्रसेन से अभिपूजित, उग्रसेन का राज्याभिषेक करने वाले, उग्रसेन के प्रति दयालु, सकल भक्तों के साक्षी, यादवों के आनन्ददायी ॥८६-९०॥ समस्त मथुरावासियों के सेवनीय, करुण, भक्तबांधव, सब गोपालों को धन देने वाले, गोपियों और गोपालों को लालसा को पूर्ण करने वाले, शौरि के दिये यज्ञोपवीत धारण करने वाले, गुरुभक्त, ब्रह्मचारी, वेदों के स्वाध्याय में निरत, बलराम के सहाध्यायी, सुदामा के सुहृद्, विद्यानिधि, कलाकोश, मृत पुत्र को देने वाले, चक्री, पांचजन्य नामक शंख धारण करने वाले, समस्त नरकवासी जीवों का उद्धार करने वाले, यम के पूज्य, देवश्रेष्ठ, नामोच्चारण मात्र से वशीभूत होने वाले, कुब्जा के साथ विहार करने वाले, सौभाग्यवान्, दीनबन्धु, अनुपम, अक्रूर के गृहरक्षक, प्रतिज्ञापालक, पवित्र ॥९१-९५॥ जरासंधजयी, विद्वान्, यवन के नाशक, द्विजों को आश्रय देने वाले, मुचुकुन्द के प्रिय करने वाले, जरासंध के डर से भागने वाले, द्वारका का निर्माण करने वाले, गूढ, ब्रह्मण्य, सत्यसंघ, लीलाधर, प्रियकर, विश्वकर्मा, यशोदायक, रुक्मिणी को प्रिय संदेश भेजने वाले, रुक्म के शोक को बढ़ाने वाले, शिशुपाल के लिए शोक के भाण्डार, श्रेष्ठ, दुष्ट राजाओं, के नाशक, रुक्मी को विरूप करने वाले, रुक्मिणी की बात मानने वाले, बलभद्र के वचन को स्वीकार करने वाले, रुक्मी को छोड़ देने वाले, जनार्दन, रुक्मिणी के प्राणनाथ, सत्यभामा के पति, भक्तों का पक्ष लेने वाले, भक्तिवश्य, अक्रूर को मणि देने वाले ॥९६-१००॥ शतधन्वा के प्राणनाशक, जाम्बवती के प्रिय, सत्राजित् की कन्या के कांत, मित्रविंदा का अपहरण करने वाले,