बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
द्व्यशीतितमोऽध्यायः ७४६ चाणूरघ्नो भयहरः शलारिस्तोशलांतकः । वैकुण्ठवासी कंसारिः सर्वदुष्टनिषूदनः ॥८७॥ देवदुंदुभिर्निर्घोषी पितृशोकनिवारणः । यादवेंद्रः सतांनाथो यादवारिप्रमर्दनः ॥८८॥ शौरिशोकविनाशी च देवकीतापनाशनः । उग्रसेनपरित्राता उग्रसेनाभिपूजितः ॥८६॥ उग्रसेनाभिषेकी च उग्रसेनदयापरः । सर्वसात्वतसाक्षी च यदूनामभिनंदनः ॥६०॥ सर्वमाथुरसंसेव्यः करुणो भक्तबांधवः । सर्वगोपालधनदो गोपीगोपाललालसः ॥६१॥ शौरिदत्तोपवीतो च उग्रसेनदयाकरः । गुरुभक्तो ब्रह्मचारी निगमाध्ययने रतः ॥६२॥ संकर्षणसहाध्यायी सुदामसुहृदेव च । विद्यानिधिः कलाकोशो मृतपुत्रप्रदस्तथा ॥६३॥ चक्री पांचजनी चैव सर्वनारकिमोचनः । यमार्चितः परो देवो नामोच्चारवशो (शो) ऽच्युतः ॥६४॥ कुब्जाविलासो सुभगो दीनबंधुरनूपमः । अक्रूरगृहगोप्ता च प्रतिज्ञापालकः शुभः ॥६५॥ जरासंधजयी विद्वान् यवनांतो द्विजाश्रयः । मुचुकुंदप्रियकरो जरासंधपलायितः ॥६६॥ द्वारकाजनको गूढो ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः । लीलाधरः प्रियकरो विश्वकर्मा यशःप्रदः ॥६७॥ रुक्मिणीप्रियसंदेशी रुक्मशोकविवर्द्धनः । चैद्यशोककालयः श्रेष्ठो दुष्टराजन्यनाशनः ॥६८॥ रुक्मिवैरूप्यकरणो रुक्मिणीवचने रतः । बलभद्रवचोग्राही मुक्तरुक्मी जनार्दनः ॥६६॥ रुक्मिणीप्राणनाथश्च सत्यभामापतिः स्वधम् । भक्तपक्षी भक्तिवश्यो ह्यक्रूरमणिदायकः ॥१००॥ शतधन्वाप्राणहारी ऋक्षराजसुताप्रियः । सत्राजित्तनयाकांतो मित्रविंदापहारकः ॥१०१॥ सत्यापतिर्लक्ष्मणाजिच्छूरो भद्राप्रियंकरः । नरकासुरघाती च लीलाकन्याहरो जयी ॥१०२॥ मुष्टिक के नाशक, कंसघाती, चाणूरमर्दक, भयहारी, शल के शत्रु, तोशल के संहारक, वैकुण्ठवासी, कंस के अरि, अखिल दुष्टों के नाशक, देवदुंदुभियों को बजाने वाले, पिता के शोक को मिटाने वाले, यादवों के प्रभु, सज्जनों के नाथ, यादवों के शत्रुओं को नष्ट करने वाले, शौरि के शोक का विनाश करने वाले, देवकीतापनाशन, उग्रसेन के रक्षक, उग्रसेन से अभिपूजित, उग्रसेन का राज्याभिषेक करने वाले, उग्रसेन के प्रति दयालु, सकल भक्तों के साक्षी, यादवों के आनन्ददायी ॥८६-९०॥ समस्त मथुरावासियों के सेवनीय, करुण, भक्तबांधव, सब गोपालों को धन देने वाले, गोपियों और गोपालों को लालसा को पूर्ण करने वाले, शौरि के दिये यज्ञोपवीत धारण करने वाले, गुरुभक्त, ब्रह्मचारी, वेदों के स्वाध्याय में निरत, बलराम के सहाध्यायी, सुदामा के सुहृद्, विद्यानिधि, कलाकोश, मृत पुत्र को देने वाले, चक्री, पांचजन्य नामक शंख धारण करने वाले, समस्त नरकवासी जीवों का उद्धार करने वाले, यम के पूज्य, देवश्रेष्ठ, नामोच्चारण मात्र से वशीभूत होने वाले, कुब्जा के साथ विहार करने वाले, सौभाग्यवान्, दीनबन्धु, अनुपम, अक्रूर के गृहरक्षक, प्रतिज्ञापालक, पवित्र ॥९१-९५॥ जरासंधजयी, विद्वान्, यवन के नाशक, द्विजों को आश्रय देने वाले, मुचुकुन्द के प्रिय करने वाले, जरासंध के डर से भागने वाले, द्वारका का निर्माण करने वाले, गूढ, ब्रह्मण्य, सत्यसंघ, लीलाधर, प्रियकर, विश्वकर्मा, यशोदायक, रुक्मिणी को प्रिय संदेश भेजने वाले, रुक्म के शोक को बढ़ाने वाले, शिशुपाल के लिए शोक के भाण्डार, श्रेष्ठ, दुष्ट राजाओं, के नाशक, रुक्मी को विरूप करने वाले, रुक्मिणी की बात मानने वाले, बलभद्र के वचन को स्वीकार करने वाले, रुक्मी को छोड़ देने वाले, जनार्दन, रुक्मिणी के प्राणनाथ, सत्यभामा के पति, भक्तों का पक्ष लेने वाले, भक्तिवश्य, अक्रूर को मणि देने वाले ॥९६-१००॥ शतधन्वा के प्राणनाशक, जाम्बवती के प्रिय, सत्राजित् की कन्या के कांत, मित्रविंदा का अपहरण करने वाले,
७५० नारदीयपुराणम्
मुरारिर्मंदनेशोऽपि धरित्रीदुःखनाशनः । वैनतेयी स्वर्गगामी अदित्यकुंडलप्रदः ॥१०३॥ इंद्रांचितो रमाकांतो वज्रीभार्याप्रपूजितः । पारिजातापहारी च शक्रमानापहारकः ॥१०४॥ प्रद्युम्नजनकः सांबतातो बहुसुतो विधुः । गर्गाचार्यः सत्यगतिर्धर्माधारो धराधरः ॥१०५॥ द्वारकामंडनः श्लोक्यः सुश्लोको निगमालयः । पौंड्रकप्राणहारी च काशीराजशिरोहरः ॥१०६॥ अवैष्णवविप्रदाहो सुदक्षिणभयावहः । जरासंधविदारी च धर्मनन्दनयज्ञकृत् ॥१०७॥ शिशुपालशिरश्छेदी दंतवक्त्रविनाशनः । विदूरथांतकः श्रीशः श्रीदो द्विविदनाशनः ॥१०८॥ रुक्मिणीमानहारी च रुक्मिणीमानवर्द्धनः । देवर्षिशापहर्ता च द्रौपदीवाक्यपालकः ॥१०६॥ दुर्वासोभयहारी च पांचालीस्मरणगतः । पार्थदूतः पार्थमन्त्री पार्थदुःखौघनाशनः ॥११०॥ पार्थमानापहारी च पार्थजीवनदायकः । पांचाली वस्त्रदातः च विश्वपालकपालकः ॥१११॥ श्वेताश्वसारथिः सत्यः सत्यसाध्यो भयापहः । सत्यसंधः सत्यरतिः सत्यप्रिय उदारधीः ॥११२॥ महासेनजयी चैव शिवसैन्यविनाशनः । बाणासुरभुजच्छेत्ता बाणबाहुवरप्रदः ॥११३॥ तार्थ्यमानापहारी च तार्थ्यतेजोविवर्द्धनः । रामस्वरूपधारी च सत्यभामामुदावहः ॥११४॥ रत्नाकरजलक्रीडो व्रजलीलाप्रदर्शकः । स्वप्रतिज्ञापरिव्वंसी भीष्माज्ञापरिपालकः ॥११५॥ वीरायुधहरः कालः कालिकेशो महाबलः । वर्वरीषशिरोहारी वर्वरीषशिरःप्रदः ॥११६॥ धर्मपुत्रजयी शूरदुर्योधनमदांतकः । गोपिकाप्रीतिनिबंध्नित्यक्रीडो व्रजेश्वरः ॥११७॥
सत्या के पति, लक्ष्मणा को जीतने वाले, पूज्य, भद्रा का प्रिय करने वाले, नरकासुर का वध करने वाले, लोला से कन्याओं का अपहरण करने वाले, विजयी, मुरारि, मदनेश, धरित्री के दुःख दूर करने वाले, गरुड़ को रखने वाले, स्वर्ग जाने वाले, अदिति को कुण्डल देने वाले, शक्र से अर्चित, रमाकांत, इन्द्राणी से पूजित, कल्पवृक्ष के अपहर्ता, इन्द्र के मानहारी, प्रद्युम्न के पिता, माता-पिता वाले, बहुपुत्र वाले, चन्द्र के रूप, गर्गाचार्य के रूप, सत्यगति, धर्माधार, धराधर, द्वारकाभूषण, स्तुत्य, यशस्वी, निगमालय, पौंड्रक के प्राणहर्ता, काशीराज का शिर काटने वाले, अवैष्णव ब्राह्मणों का दहन करने वाले, सुदक्षिण को भयभीत करने वाले, जरासंध को विदीर्ण करने वाले, युधिष्ठिर को यज्ञ कराने वाले, शिशुपाल का शिरश्छेदन करने वाले, दंतवक्त्र का विनाश करने वाले, विदूरथ का अंत करने वाले, श्रीश, श्रीदायक, द्विविदनाशक, रुक्मिणीमानहारी, रुक्मिणीमानवर्धक, देवर्षि के शाप का हरण करने वाले, द्रौपदी के वचन का पालन करने वाले ॥१०१-१०९॥ दुर्वासा द्वारा उपस्थित भय को दूर करने वाले, पांचाली के स्मरण करते ही आने वाले, पार्थदूत, पार्थमन्त्री, पार्थ के दुःख-समूह को नाश करने वाले, पार्थ के मान का अपहरण करने वाले, पार्थ को जीवन प्रदान करने वाले, द्रौपदी को वस्त्र देने वाले, विश्वपालक के पालक, श्वेताश्व के सारथि, सत्य, सत्यसाध्य, भय दूर करने वाले, सत्यसंध, सत्यरति, सत्यप्रिय, उदार बुद्धि वाले, महासेन के विजेता, शिव की सेना का नाश करने वाले, बाणासुर की भुजाओं का छेदन करने वाले, बाण को बाहुओं का वर देने वाले, गरुड़ के मान का अपहरण करने वाले, ताक्ष्यं के तेज को बढ़ाने वाले, रामस्वरूपधारी, सत्यभामा को आनन्द देने वाले, समुद्र के जल में क्रीड़ा करने वाले, व्रज में लीला दिखाने वाले, अपनी प्रतिज्ञा का ध्वंस करने वाले, भीष्म की आज्ञा का परिपालन करने वाले ॥११०-११५॥ वीरों के अस्त्र हरण करने वाले, काल, कालिकेश, महाबली, बर्बरीष के शिर का अपहरण करने वाले, बर्बरीष को शिर देने वाले, युधिष्ठिर को जिताने वाले, वीर दुर्योधन के मद को चूर्ण करने वाले, गोपियों के प्रेमपाश
द्व्यशीतितमोऽध्यायः ७५१ राधाकुण्डरतिर्धन्यः सर्वादोलसमाश्रितः । सदामधुवनानन्दी सदावृन्दावनप्रियः ॥११८॥ अशोकवनसन्नद्धः सदातिलकसंगतः । सदागोवर्द्धनरतिः सदा गोकुलवल्लभः ॥११९॥ भांडीरवटसंवासी नित्यं वंशोवटस्थितः । नन्दग्रामकृतावासो वृषभानुग्रहप्रियः ॥१२०॥ गृहीतकामिनीरूपो नित्यं रासविलासकृत् । वल्लवीजनसङ्गोप्ता वल्लवीजनवल्लभः ॥१२१॥ देवशर्मा कृपाकर्ता कल्पपादपसंस्थितः । शिलानुगन्धनिलयः पादचारी घनच्छविः ॥१२२॥ अतसीकुसुमप्रख्यः सदा लक्ष्मीकृपाकरः । त्रिपुरारि प्रियकरो ह्युग्रधन्वापराजितः ॥१२३॥ षड्धूरध्वंसकर्ता च निकुंभप्राणहारकः । वज्रनाभपुरध्वंसी पौंड्रकप्राणहारकः ॥१२४॥ बहुलाश्वप्रीतिकर्ता द्विजवर्यप्रियंकरः । शिवसंकटहारी च वृकासुरविनाशनः ॥१२५॥ भृगुसत्कारकारी च शिवसात्त्विकताप्रदः । गोकर्णपूजकः सांबकुष्ठविध्वंसकारणः ॥१२६॥ वेदस्तुतो वेदवेत्ता यदुवंशविवर्द्धनः । यदुवंशविनाशी च उद्धवोद्धारकारकः ॥१२७॥ राधा च राधिका चैव आनंदा वृषभानुजा । वृन्दावनेश्वरी पुण्या कृष्ण मानसहारिणी ॥१२८॥ प्रगल्भा चतुरा कामा कामिनी हरिमोहिनी । ललिता मधुरा माध्वी किशोरी कनकप्रभा ॥१२९॥ जितचंद्रा जितमृगा जितसिंहा जितद्विपा । जितरंभा जितपिका गोविन्दहृदयोद्भवा ॥१३०॥ जितबिंबा जितशुका जितपद्मा कुमारिका । श्रीकृष्णार्कषणा देवो नित्यं युग्मस्वरूपिणी ॥१३१॥ नित्यं विहारिणी कांता रसिका कृष्णवल्लभा । आमोदिनी मोदवतो नंदनंदनभूषिता ॥१३२॥ दिव्यांबरा दिव्यहारा मुक्तामणिविभूषिता । कुञ्जप्रिया कुञ्जवासा कुञ्जनायकनायिका ॥१३३॥ में बंध कर नित्य क्रीड़ा करने वाले, व्रज के ईश्वर, राधाकुण्ड से अनुराग रखने वाले, धन्य, सदा झूले पर झूलने वाले, सदा मधुवन में आनन्द करने वाले, वृन्दावन के शाश्वत प्रेमी, अशोकवन में रहने वाले, तिलक लगाने वाले, गोवर्द्धन से स्नेह करने वाले, सदा गोकुलवल्लभ, भांडीरवट पर वास करने वाले, वंशीवट पर स्थित, नन्दीग्राम में वास करने वाले, वृषभानु-कुमारी के प्रिय, कामिनी का रूप धारण करने वाले, नित्य रासलीला करने वाले, गोपोजनों के संरक्षक, गोपियों के प्रिय, देवशर्मा के ऊपर कृपा करने वाले, कल्पवृक्ष पर रहने वाले, सुगन्धित पदार्थों से युक्त, पैदल चलने वाले, मेघ के समान कान्ति वाले, अलसी के पुष्प के सदृश आभा वाले, सदा लक्ष्मीवान्, शिव के प्रियकर्ता, उग्रधन्वा से अपराजित, षड्धुर के ध्वंसक, निकुंभ के प्राण-हर्ता, वज्रनाभपुर के विध्वंसी, पौंड्रकप्राणहारी, बहुलाश्व से प्रीति करने वाले, द्विजवर्य के प्रिय करने वाले, शिव के संकट को दूर करने वाले, वृकासुर के विनाशक, भृगु का सत्कार करने वाले, शिव को सात्त्विकता प्रदान करने वाले, गोकर्णपूजक, सांब के कुष्ठ-विध्वंस के कारण, वेदस्तुत, वेदवेत्ता, यदुवंश को बढ़ाने वाले, यदुवंशविनाशी, उद्धव के उद्धारकर्ता ॥११६-१२७॥ राधा, राधिका, आनन्दा, वृषभानुजा, वृन्दावनेश्वरी, पुण्या, कृष्णमानसहारिणी, प्रगल्भा, चतुरा, कामा, कामिनी, हरिमोहिनी, ललिता, मधुरा, माध्वी, किशोरी, कनकप्रभा, जितचंद्रा जितमृगा, जितसिंहा, जितद्विपा, जित- रंभा, जितपिका, गोविन्दहृदयोद्भवा, जितबिंबा, जितशुका, जितपद्मा, कुमारिका, श्रीकृष्ण को आकर्षित करने वाली, नित्य युगल रूप को धारण करने वाली, नित्य विहार करने वाली, कांता, रसिका, कृष्णवल्लभा, आमोदिनी, मोदवती, नन्दनन्दन-भूषिता, दिव्याम्बरा, दिव्यहारा, मुक्तामणिविभूषिता, कुन्जप्रिया, कुञ्जवासा, कुञ्जनायक- नायिका, चा रूपा, चारुवक्त्रया, सुन्दर सुवर्ण के केयूर को धारण करने वाली, शुभा, श्रीकृष्णवेणुसंगीता (श्रीकृष्ण
७५२ नारदीयपुराणम् चारुरूपा चारुवक्त्रा चारुहेमांगदा शुभा । श्रीकृष्णवेणुसंगीता मुरलीहारिणी शिवा ॥१३४॥ भद्रा भगवती शांता कुमुदा सुन्दरी प्रिया । कृष्णक्रोडा कृष्णरतिः श्रीकृष्णसहचारिणी ॥१३५॥ वंशीवटप्रियस्थाना युग्मायुग्मस्वरूपिणी । भांडीरवासिनी शुभ्रा गोपीनाथप्रिया सखी ॥१३६॥ श्रुतिनिःश्वसिता दिव्या गोविन्दरसदायिनी । श्रीकृष्णप्रार्थनीशाना महानन्दप्रदायिनी ॥१३७॥ वैकुंठजनसंसेव्या कोटिलक्ष्मीसुखावहा । कोटिकंदर्पलावण्या रतिकोटिरतिप्रदा ॥१३८॥ भक्तिग्राह्या भक्तिरूपा लावण्यसरसो उमा । ब्रह्मरुद्रादिसंराध्या नित्यं कौतूहलान्विता ॥१३९॥ नित्यलीला नित्यकामा नित्यशृंगारभूषिता । नित्यवृन्दावनरसा नन्दनन्दनसंयुता ॥१४०॥ गोपिकामण्डलीयुक्ता नित्यं गोपालसंगता । गोरसक्षेपणी शूरा सानन्दा नन्ददायिनी ॥१४१॥ महालीला प्रकृष्टा च नागरी नगचारिणी । नित्यमाघूर्णिता पूर्णा कस्तूरीतिलकान्विता ॥१४२॥ पद्मा श्यामा मृगाक्षी च सिद्धिरूपा रसावहा । कोटिचन्द्रानना गौरी कोटिकोकिलसुस्वरा ॥१४३॥ शीलसौन्दर्यनिलया नन्दनन्दनलालिता । अशोकवनसंवासा भांडीरवनसङ्गता ॥१४४॥ कल्पद्रुमतलाविष्टा कृष्णा विश्वा हरिप्रिया । अजागम्या भवागम्या गोवर्द्धनकृतालया ॥१४५॥ यमुनातीरनिलया शश्वद्गोविन्दजल्पिनी । शश्वन्मानवती स्निग्धा श्रीकृष्णपरिवन्दिता ॥१४६॥ कृष्णस्तुता कृष्णवृता श्रीकृष्णहृदयालया । देवद्रुमफला सेव्या वृन्दावनरसालया ॥१४७॥ कोटितीर्थमयी सत्या कोटितीर्थफलप्रदा । कोटियोगसुदुष्प्राप्या कोटियज्ञदुराश्रया ॥१४८॥ मनसा शशिलेखा च श्रीकोटिसुभगाऽनघा । कोटिमुक्तसुखा सौम्या लक्ष्मीकोटिविलासिनी ॥१४९॥
द्वारा मुरली में जिनके नाम और यश का गान किया जाता है); मुरलीहारिणी, शिवा, भद्रा, भगवती, शांता, कुमुदा, सुन्दरी, प्रिया, कृष्णक्रीडा, कृष्णरति, श्रीकृष्ण की सहचारिणी, वंशीवट को अपना प्रिय स्थान समझने वाली, युगलरूपा और एकरूपा, भांडीरवासिनी, शुभ्रा, गोपीनाथप्रिया, सखी ॥१२८-१३६॥ श्रुति के निःश्वास से उत्पन्न, दिव्या, गोविन्दरसदायिनी, श्रीकृष्ण को प्रार्थना करने वाली, ईश्वरी, महानन्दप्रदायिनी, वैकुण्ठवासियों से सेवनीया, कोटि लक्ष्मी के समान सुख देने वाली, कोटि कन्दर्प के समान सुन्दरी, करोड़ रतियों के बराबर रति देने वाली, भक्ति से ग्रहण करने योग्य, भक्तिरूपा, लावण्यसरोवर, उमा, ब्रह्मा और रुद्र आदि से पूज्य, नित्यलीला करने वाली, नित्यकाम, नित्यशृंगार से विभूषित नित्य कौतूहल से युक्त, नित्य वृन्दावन का रस लेने वाली, श्रीकृष्ण के साथ रहने वाली; गोपियों की मण्डली से युक्त, नित्य गोपाल से संगति करने वाली, गोरस को फेंकने वाली, शूरा, आनन्दसहित, आनन्ददायिनी, महा- लीला करने वाली, उत्तमा, नागरी, नगचारिणी, नित्य घूमने वाली, पूर्णा, कस्तूरी का तिलक लगाने वाली, पद्मा, श्यामा, मृगाक्षी, सिद्धिरूपा, रस देने वाली, करोड़ चन्द्रमा के समान मुख वाली, गौरी, करोड़ कोयल के समान सुस्वर वाली, शील और सौन्दर्य की आधारभूता, नन्दनन्दन से लालित, अशोकवन में वास करने वाली, भांडीरवन में जाने वाली, कल्पद्रुम की लताओं से आवेष्टित होने वाली, कृष्णा, विश्वा, हरिप्रिया, विष्णु से प्राप्य, शंकर से प्राप्य, गोवर्धन पर रहने वाली, यमुनातीर पर रहने वाली, सदा गोविन्द नाम का उच्चारण करने वाली, सदा मान करने वाली, स्निग्धा, श्रीकृष्ण से परिवन्दित ॥१३७-१४६॥ कृष्ण से स्तुत, कृष्ण से आवृत्त, श्रीकृष्ण के हृदय में रहने वाली, कल्पवृक्ष के फलों का उपभोग करने वाली, सेव्या, वृन्दावन के रस का आस्वादन करने वाली, कोटितीर्थमयी, सत्या, कोटि तीर्थों का फल देने वाली, करोड़ों प्रकार के योगसाधनों से दुष्प्राप्य, करोड़ों यज्ञ करने से भी दुष्प्राप्य, मनसा नाम से प्रसिद्ध, शशिलेखा, करोड़
द्व्यशीतितमोऽध्यायः ७५३ तिलोत्तमा त्रिकालस्था त्रिकालज्ञाप्यधीश्वरी । त्रिवेदज्ञा त्रिलोकज्ञा तृतीयांतनिवासिनो ॥१५०॥ दुर्गराराध्या रमारोध्या विश्वाराध्या चिदात्मिका । देवाराध्या पराराध्या ब्रह्मारोध्या परात्मिका शिवारोध्या प्रेमसाध्या भक्ताराध्या रसात्मिका । कृष्णप्राणार्पिणी भामा शुद्धप्रेमविलासिनी ॥१५२॥ कृष्णाराध्या भक्तिसाध्या भक्तवृन्दनिवेविता । विश्वाधारा कृपाधारा जीवधारातिनायिका ॥१५३॥ शुद्धप्रेममयी लज्जा नित्यसिद्धा शिरोमणिः । दिव्यरूप दिव्यभोगा दिव्यवेषा मुदान्विता ॥१५४॥ दिव्यांगनावृन्दसारा नित्यनूतनयौवना । परब्रह्मावृता ध्येया महारूपा महोज्ज्वला ॥१५५॥ कोटिसूर्यप्रभा कोटिचन्द्रबिम्बाधिकच्छविः । कोमलामृतवागाद्या वेदाद्या वेददुर्लभा ॥१५६॥ कृष्णासक्ता कृष्णभक्ता चन्द्रावलिनिषेविता । कलाषोडशसम्पूर्णा कृष्णदेहार्द्धधारिणी ॥१५७॥ कृष्णबुद्धिः कृष्णसारा कृष्णरूपविहारिणी । कृष्णकान्ता कृष्णधना कृष्णमोहनकारिणी ॥१५८॥ कृष्णदृष्टिः कृष्णगोत्री कृष्णदेवी कुलोद्वहा । सर्वभूतस्थितावात्मा सर्वलोकन मस्कृता ॥१५९॥ कृष्णदात्री प्रेमधात्री स्वर्णगात्री मनोरमा । नगधात्री यशोदात्री महादेवी शुभंकरी ॥१६०॥ श्रीशेषदेवजननी अवतारगणप्रसूः । उत्पलांकारविंदांका प्रसादांका द्वितीयका ॥१६१॥ रथांका कुंजरांका च कुंडलांकपदस्थिता । छत्रांका विद्युदंका च पुष्पमालांकितापि च ॥१६२॥ दंडांका मुकुटांका च पूर्णचन्द्रा शुकांकिता । कृष्णान्नाहारपाका च वृन्दाकुंजविहारिणी ॥१६३॥ लक्ष्मियों के समान सौभाग्यवती, पापरहिता, करोड़ मुक्त जीवों के समान सुख प्राप्त करने वाली, सौम्य स्वभाव वाली, कोटि लक्ष्मी के समान विलास करने वाली, तिलोत्तमा से अधिक सुन्दरी, त्रिकालस्था, त्रिकालज्ञा, ईश्वरी, त्रिवेदज्ञा, त्रिलोकज्ञा, चतुर्थ (नाद) के अन्त में निवास करने वाली, दुर्गा से आराध्य, लक्ष्मी से आराध्य, विश्व से आराध्य, चिदात्मिका, देवाराध्य, पराराध्य, ब्रह्माराराध्य, परात्मिका, शिवाराराध्य, प्रेमसाध्य, भक्ताराध्य, रसात्मिका, कृष्ण को प्राण समर्पण करने वाली, भामा, शुद्ध प्रेम से विलास करने वाली, कृष्ण से आराध्य, भक्ति से साध्य, भक्तवृन्द से सुसेवित, विश्व की आधार, कृपा को आधार, जीवों को आधार, अतिनायिका, शुद्ध- प्रेममयी, लज्जा, नित्यसिद्धा, शिरोमणि, दिव्यरूला, दिव्यभोगा दिव्यवेषा, हर्षयुक्ता, दिव्याँगनाओं में सबसे उत्तम, नित्य नूतन यौवन धारण करनेवाली, परब्रह्म से आवृत, ध्यान करने योग्य, महारूपवाली, अत्यन्त उज्ज्वल, कोटि सूर्य के समान प्रभावानी, करोड़ चन्द्रबिंबों से अधिक छवि वाली, कोमल तथा अमृतोपम वचन बोलने वाली, आद्या, वेदाद्या, वेददुर्लभा, कृष्ण में आसक्त, कृष्णभक्त, चन्द्रावलि से सुसेवित, सोलहों कला से परि- पूर्ण, कृष्ण का अद्धं शरीर धारण करने वाली, कृष्णबुद्धि, कृष्णसारा, कृष्णरूप से विहार करने वाली, कृष्ण- कांता, कृष्णधना, कृष्ण को मोहित करनेवाली, कृष्णदृष्टि, कृष्णगोत्री, कृष्णदेवी, वंश धारण करनेवाली, अखिल प्राणियों में स्थित, आत्मरूपिणी, सर्वलोकवन्द्या, कृष्णरात्री, प्रेमधात्री, स्वर्णगात्री, मनोरमा, नगधात्री, यशोदात्री, महादेवी, शुभंकरी ॥१४७--१६०॥ श्रीशेषदेव की जननी, अवतार-समूह का प्रसव करने वाली, नीलकमल से अंकित, लाल कमल से चिह्नित, प्रसाद गुण से युक्त, अद्वितीय, रथ के चिह्न से युक्त, हाथी के चिह्न से युक्त, कुंडलांकित आसन पर बैठने वाली, छत्रांकित, बिजली का चिह्न धारण करने वाली, पुष्पमाला से अंकित, दंड एवं मुकुट के चिह्न धारण करने वाली, पूर्णचंद्रा, शुक के चिह्न के युक्त, कृष्ण के लिये भोजन बनाने ६५ ना० पु०
७५४ नारदीयपुराणम् कृष्णप्रबोधनकरी कृष्णशेषान्नभोर्जनी । पद्मकेशरमध्यस्था संगीतागमवेदिनी ॥१६४॥ कोटिकल्पांतभ्रू भंगा अप्राप्तप्रलयाच्युता । सर्वसत्त्वनिधिः पद्मशंखादिनिधिसेविता ॥१६५॥ अणिमादिगुणैश्वर्या देववृन्दविमोहिनी । सर्वानन्दप्रदा सर्वा सुवर्णलतिकाकृतिः ॥१६६॥ कृष्णाभिसारसंकेता मालिनी नृत्यपंडिता । गोपीसिंधुसकाशाढ्या गोपमंडपशोभिनी ॥१६७॥ श्रीकृष्णप्रीतिदा भीता प्रत्यंगपुलकांचिता । श्रीकृष्णालिंगनरता गोविंदविरहाक्षमा ॥१६८॥ अनंतगुणसंपन्ना कृष्णकीर्तनलालसा । बीजत्रयमयी मूर्तिः कृष्णानुग्रहवांञ्छिता ॥१६९॥ विमलादिनिषेव्या च ललिताद्यर्चिता सती । पद्मवृन्दस्थिता हृष्टा त्रिपुरापरिसंविता ॥१७०॥ वृन्तावत्यर्चिता श्रद्धा दुर्ज्ञेया भक्तवल्लभा । दुर्लभासांद्रसौख्यात्मा श्रेयोहेतुः सुभोगदा ॥१७१॥ सारंगा शारदा बोधा सद्बृंदावनचारिणी । ब्रह्मानन्दा चिदानन्दा ध्यानानन्दार्धमात्रिका ॥१७२॥ गंधर्वा सुरतज्ञा च गोविंदप्राणसंगमा । कृष्णांगभूषणा रत्नभूषणा स्वर्णभूषिता ॥१७३॥ श्रीकृष्णहृदयावासमुक्ताकनकालि(सि)का । सद्रत्नकंकणयुता श्रीमन्नीलगिरिस्थिता ॥१७४॥ स्वर्णनूपुरसंपन्ना स्वर्णकिंकिणिमंडिता । अशेषरासकौतुका रंभोरूस्तनुमध्यमा ॥१७५॥ पराकृतिः परानन्दा परस्वर्गविहारिणी । प्रसूनकब्री चित्रा महासिंदूरसुन्दरी ॥१७६॥ कैशोरवयसा बाला प्रमदाकुलशेखरा । कृष्णाधरसुधास्वादा श्यामप्रेमविनोदिनी ॥१७७॥ शिखिपिच्छलसच्चूडा स्वर्णचंपकभूषिता । कुंकुमालक्तकस्तूरीमंडिता चापराजिता ॥१७८॥
वाली, वृन्दावन के कुंजों में विहार करने वाली, कृष्ण को जगाने वाली, कृष्ण से बचे अन्न को खाने वाली, पद्मकेसर के मध्य में रहने वाली, संगीत एवम् आगम शास्त्र को जानने वाली, भ्रूभंग से करोड़ों कल्पों का अन्त कर देने वाली, प्रलय में भी नष्ट न होने वाली, अखिल प्राणियों की निधि, पद्म शंख आदि निधियों से सेवित ॥१६१-१६५॥ अणिमा आदि ऐश्वर्यों से युक्त, देव समूह को मोहित करने वाली, सबको आनन्द देने वाली, स्वर्णलता के समान आकृति वाली, कृष्ण की अभिसारिका, माला धारण करने वाली, नृत्य करने में कुशल, गोपीसमुदायरूपी सिंधु में प्राप्त होने वाली, गोपमंडप को सुशोभित करने वाली, श्रीकृष्ण को प्रीति देने वाली, उनसे डरने वाली, प्रत्यंग में हर्ष से रोमाञ्चित होने वाली, श्रीकृष्ण के आलिंगन में निरत रहने वाली, गोविंद के विरह को न सहने वाली, अनंत गुणों से सम्पन्न, कृष्ण-कीर्तन की लालसा करने वाली, तीनों बीजों की मूर्ति, कृष्ण के अनुग्रह की इच्छा करने वाली, विमला आदि से सेवित, ललिता आदि से अर्चित, सती, कमलराशि पर अवस्थित, हृष्टा, त्रिपुरा से सुसेवित, वृन्तावती से पूजित, श्रद्धा, दुर्ज्ञेया, भक्तवल्लभा, दुर्लभा, अत्यन्त सुखोपभोग करने वाली, कल्याणहेतु, सौभाग्य देने वाली, आभूषणयुक्ता, शारदा, बुद्धिरस्वरूपा, सुन्दर वृन्दावन में विचरण करने वाली, ब्रह्मानन्दा, चिदानंदा, ध्यानानंदा, अर्धमात्रिका, गंधर्वा, सुरतज्ञा, गोविंद की प्राणप्रिया, कृष्ण के अंगों को भूषित करने वाली, रत्नभूषणा, स्वर्णभूषिता, श्रीकृष्ण के हृदय में वास करने वाली, मोती एवम् सोने का आभूषण धारण करने वाली, उत्तम रत्नों के बने कंगन पहनने वाली, रत्नाढ्य नीलगिरि पर रहने वाली, सोने का नूपुर पहनने वाली, सोने की किंकिणियों से आभूषित, महारास के लिए उत्कण्ठित रहने वाली, कदली के समान जंघा वाली ॥१६६--१७५॥ क्षीण कटि वाली, उत्तम आकृति वाली, विशिष्ट आनंद का उपभोग करने वाली, स्वर्ग में अत्यन्त विहार करने वाली, केशपाश (जूड़े) को पुष्पों से सुसज्जित करने वाली, चित्र-विचित्र रूप बनाने वाली, महासिंदूर से सौंदर्य को बढ़ानेवाली, किशोर अवस्था वाली, बाला, ललनाओं की शिरोमुकुट,
द्वयशीतितमोऽध्यायः ७५५ हेमहारान्वितापुष्पा हाराढ्या रसवत्यपि । माधुर्यं मधुरा पद्मा पद्महस्ता सुविश्रुता ॥१७८॥ भ्रूभंगाभंगकोदंडकटाक्षशरसंधिनी । शेषदेवा शिरस्था च नित्यस्थलविहारिणी ॥१७९॥ कारुण्यजलमध्यस्था नित्यमत्ताधिरोहिणी । अष्टभाषवती चाष्टनायिका लक्षणान्विता ॥१८०॥ सुनीतिज्ञा श्रुतिज्ञा च सर्वज्ञा दुःखहारिणी । रजोगुणेश्वरी चैव जरच्चंद्रनिभानना ॥१८१॥ केतकीकुसुमाभासा सदा सिंधुवनस्थिता । हेमपुष्पाधिककरा पञ्चशक्तिमयी हिता ॥१८२॥ स्तनंकुभी नराढ्या च क्षीणापुष्या यशस्विनी । वैराजसूयजननी श्रीशा भुवनमोहिनी ॥१८३॥ महाशोभा महामाया महाकांतिर्महास्मृतिः । महामोहा महाविद्या महाकीर्तिर्महारतिः॥१८४॥ महाधैर्या महावीर्या महाशक्तिर्महाद्युतिः । महागौरी महासंपन्महाभोगविलासिनो ॥१८५॥ समया भक्तिदाशोका वात्सल्यरसदायिनी । सुहृद्भक्तिप्रदा स्वच्छ। माधुर्यरसवर्षिणी ॥१८६॥ भावभक्तिप्रदा शुद्धप्रेमभक्तविधाधिनी । गोपरामाभिरामा च क्रीडारामा परेश्वरी ॥१८८॥ नित्यरामा चात्मरामा कृष्णरामा रमेश्वरी । एकानेकजगद्व्याप्ता विश्वलीलाप्रकाशिनी ॥१८८॥ सरस्वतीशा दुर्गेशा जगदीशा जगद्विधिः । विष्णुवंशविकासा च विष्णुवंशसमुद्भवा ॥१८६॥ विष्णुवंशस्तुता कर्त्री विष्णुवंशावनी सदा । आरामस्था वनस्था च सूर्यपुत्र्यवगाहिनी ॥१९०॥ प्रीतिस्था नित्ययंत्रस्था गोलोकस्था विभूतिदा । स्वानुभूतिस्थिता व्यक्ता सर्वलोकनिवासिनी ॥१९२॥ अमृता हृदद्भुता श्रीमन्नारायणसमीडिता । अक्षरापि च कूटस्था महापुरुषसंभवा ॥१९३॥ कृष्ण के अधरामृत का स्वाद लेने वाली, कृष्ण-प्रेम से विनोद करने वाली, मयूर-पंख से सुशोभित मुकुट वाली, कनकचंपा से विभूषित, कुंकुम, महावर तथा कस्तूरी से अलंकृत, पराजित न होने वाली, स्वर्णहार से युक्त, पुष्प धारण करने वाली, हारों से सम्पन्न, रसवती, माधुर्यमधुरा, पद्मा, पद्महस्ता, अत्यन्त प्रसिद्धा, भ्रू- भंग रूपी धनुष पर कटाक्ष रूपी बाण चढ़ाने वाली, अनन्तशेष के शिर पर रहने वाली, नित्य स्थल पर विहार करनेवाली, करुणा रूपी जल के मध्य में रहने वाली, नित्य हाथी पर चढ़ने वाली, आठ भाषाओं को जानने वाली, आठ प्रकार की नायिकाओं के लक्षण से संपन्न, सुनीतिज्ञा, श्रुतिज्ञा, सर्वज्ञा, दुःखहारिणी, रजोगुणेश्वरी, शरत्कालीन चन्द्र के समान मुख वाली, केतकी पुष्प के समान कान्तिवाली, सदा सिंधुवन में रहने वाली, हाथों में चम्पा के पुष्प रखने वाली, पंच शक्तिमयी, कल्याणकारिणी, कुंभस्तनी, नरसंपन्ना, क्षीणा, पुण्या, यशस्विनी, राजसूयजननी, श्री, ईशा, भुवनमोहिनी, महाशोभा, महामाया, महाकांति, महास्मृति, महामोहा, महाविद्या, महाकीर्ति, महारति, ॥१७६-१८४॥महाधैर्या, महावीर्या, महाशक्ति, महाद्युति, महागौरी, महासंपत्ति, महाभोग- विलासिनी, शीघ्र भक्ति प्रदान करने वाली; शोकरहिता, वात्सल्यरस को देने वाली, अंतरंग व्यक्ति को भक्ति समर्पित करने वाली, स्वच्छा, माधुर्यरस की वर्षा करने वाली, भाव एवम् भक्ति प्रदान करने वाली, शुद्ध प्रेम तथा भक्ति प्रदान करने वाली, गोपों को आनन्द देने वाली, अभिरामा, क्रीडाशीला, परेश्वरी, नित्य रमण करने वाली, आत्मा में रमण करने वाली, कृष्ण तथा राम का स्वरूप धारण करने वाली रमा, ईश्वरी, अद्वितीया, संपूर्ण जगत् में व्याप्त होने वाली, विश्व-लीला का प्रकाश करने वाली, सरस्वती की ईश्वरी, दुर्गा की ईश्वरी, जगदीश्वरी,जगद्- विधात्री, विष्णु के वंश में निवास करने वाली, विष्णुवंश में समुत्पन्न, विष्णुवंश में स्तुत होने वाली, कर्त्री, सदा विष्णु- वंश की रक्षा करने वाली,उद्यान में रहने वाली, वन में रहने वाली, यमुना में स्नान करने वाली, प्रेम में निवास करने वाली, नित्य यंत्र में रहनेवाली, गोलोक में रहनेवाली, ऐश्वर्य देने वाली, अपनी अनुभूति में रहने वाली, अव्यक्त स्वरूपा,
७५६ नारदीयपुराणम् औदार्यभावसाध्या च स्थूलसूक्ष्मातिरूपिणी । शिरीषपुष्पमृदुला गांगेयमुकुरप्रभा ॥१९४॥ नीलोत्पलजिताक्षी च सद्रत्नकवरान्विता । प्रेमपर्यंकनिलया तेजोमण्डलमध्यगा ॥१९५॥ कृष्णांगगोपनाऽभेदा लीलावरननायिका । सुधासिंधुसमुल्लासामृतास्यंदविधायिनी ॥१९६॥ कृष्णचित्ता रासचित्ता प्रेमचित्ता हरिप्रिया । अचिंत्यगुणग्रामा कृष्णलीला मलापहा ॥१९७॥ राससिंधुशशांका च रासमंडलमंडिनी । नतव्रता सिंहरीच्छा सुमतिः सुरवंदिता ॥१९८॥ गोपीचूडामणिर्गोपी गणेड्या विरजाधिका । गोपश्रेष्ठा गोपकन्या गोपनारी सुगोपिका ॥१९९॥ गोपधामा सुदामांबा गोपाली गोपमोहिनी । गोपभूषा कृष्णभूषा श्रीवृन्दावनचंद्रिका ॥२००॥ वीणादिघोषनिरता रासोत्सवविकासिनी । कृष्णचेष्टा परिज्ञाता कोटिकंदर्पमोहिनी ॥२०१॥ श्रीकृष्णगुणगानाढ्या देवसुन्दरिमोहिनी । कृष्णचंद्रमनोज्ञा च कृष्णदेवसहोदरी ॥२०२॥ कृष्णामिलाषिणी कृष्णप्रेमानुग्रहवांछिता । क्षेमा च मधुरालापा भुवोमाया सुभद्रिका ॥२०३॥ प्रकृतिः परमानंदा नीपद्रुमतलस्थिता । कृपाकटाक्षा बिम्बोष्ठी रंभा चारुनितंबिनी ॥२०४॥ स्मरकेलिनिधाना च गंडताटंकमंडिता । हेमाद्रिकांतिरुचिरा प्रेमाद्या मदमंथरा ॥२०५॥ कृष्णंचिता प्रेमंचिता रतिंचिता च कृष्णदा । रासंचिता भावंचिता शुद्धंचिता महारसा ॥२०६॥ अखिललोकनिवासिनी, अमृतरूपा, अद्भुतरूपा, श्रीमन्नारायण के समान स्तुत्य होने वाली, अक्षरस्वरूपा, कूटस्था (एकरस परमात्मरूपा), महापुरुष से उत्पन्न होने वाली, उदारभाव से उपासना करने योग्य, अत्यन्त स्थूल एवम् सूक्ष्म रूप वाली, शिरीष पुष्प के समान मृदुल, सुवर्ण तथा शीशे के समान प्रभावानी, नीलकमल को पराजित करने वाले नेत्रों से युक्त, उत्तम रत्नों से सुशोभित चोटी वाली, प्रेम पर्यंक पर शयन करने वाली, तेजोमंडल के बीच गमन करने वाली ॥१९४-१९५॥ कृष्ण की अंगरक्षिका, कृष्ण से अभिन्न, खेल में नायिका का भाग लेने वाली, सुधासिंधु को तरंगित करने वाली, अमृतवर्षा करने वाली, कृष्ण में चित्त को लगाने वाली, रास में दत्तचित्त, प्रेमाद्रं चित्त वाली, हरि की प्रिया, अचिन्त्य गुणों वाली, कृष्ण के साथ विलास करने वाली, मल दूर करने वाली, राससिंधु के लिए चन्द्रमा- स्वरूपा, रासमंडली को मंडित करने वाली, व्रतशीला, सिंह तथा रीछ का वाहन करने वाली, सुन्दर रूप वाली, देवों से वंदिता, गोपियों की चूडामणि, गोपीवृन्द से स्तुत्य, विरजा नाम वाली, उत्तम सखी, गोपों की अतिशय प्रिय, गोपकन्या, गोपनारी, सुगोपिका, गोपधामा, सुदामा की माता, गोपाली, गोपमोहिनी, गोपभूषा, कृष्णभूषा, श्रीवृन्दावन की चंद्रिका, वीणा बजाने में निरत, रासोत्सव करने वाली, कृष्ण की तरह चेष्टा करने वाली, अत्यन्त परिचित, कोटिकंदर्पमोहिनी, श्रीकृष्ण के गुणों का वर्णन करने वाली, देव-सुन्दरियों को मोहित करने वाली, कृष्ण चन्द्र की तरह मनोरम, कृष्णदेव की सहोदरी (अर्थात् योगमायारूप में यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होने वाली), कृष्ण की अभिलाषा करने वाली, कृष्ण के प्रेम एवम् अनुग्रह की इच्छुक, कल्याण करने वाली, मधुर भाषण करने वाली, पृथ्वी पर माया कहलाने वाली, सुभद्रिका, प्रकृति, परमानन्दरूपिणी, कदम्ब वृक्ष के नीचे रहने वाली, कृपाकटाक्ष करने वाली, बिम्बोष्ठी, कदलीस्तम्भ की तरह जंघा वाली, शोभन नितम्ब वाली, कामक्रीडा-निधान, कपोल की शोभा बढाने वाले कर्णाभूषणों से युक्त, सुमेरु पर्वत की तरह मनोहर कांति वाली, आद्यप्रेमस्वरूपा, मद से अलसानेवाली ॥१९६-२०५॥ कृष्ण का चिन्तन करने वाली, प्रेमचिन्तन करने वाली, अतिचिन्तन करने वाली कृष्णभक्ति प्रदान करने वाली, शुद्ध चिन्तन
द्व्यशीतितमोऽध्यायः ७५७ कृष्णादृष्टित्रुटियुगा दृष्टिपक्ष्मविनिंदिनी । कंदर्पजननी मुख्या वैकुण्ठगतिदायिनी ॥२०७॥ रासभावा प्रियाश्लिष्टा प्रेष्ठा प्रथमनायिका । शुद्धा सुधादेहिनी च श्रीरामा रसमञ्जरी ॥२०८॥ सुप्रभावा शुभाचारा स्वर्णदी नर्मदांबिका । गोमती चंद्रभागेड्या सरयूस्ताम्रपर्णिसूः ॥२०६॥ निष्कलंकाचरित्रा च निर्गुणा च निरंजना । एतन्नामसहस्रं तु युगल रूपस्य नारद ॥२१०॥ पठनीयं प्रयत्नेन वृन्दावनरसावहे । महापापप्रशमनं वंध्यात्वविनिवर्तकम् ॥२११॥ दारिद्र्यशमनं रोगनाशनं कामदं महत् । पापापहं वैरिहरं राधामाधवभक्तिदम् ॥२१२॥ नमस्तस्मै भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे । राधासंगसुधा सिंधौ नमोनित्यविहारिणे ॥२१३॥ राधादेवी जगत्कर्त्री जगत्पालनतत्परा । जगल्लयविधात्री च सर्वेशी सर्वसूतिका ॥२१४॥ तस्या नामसहस्रं वै मया प्रोक्तं मुनीश्वर । भुक्तिमुक्तिप्रदं दिव्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥२१५॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे राधाकृष्णसहस्रनामकथनं नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥८२॥ करने वालो, महारास वाली, सुन्दर नेत्र वाली, दृष्टि दोष को मिटाने वाली, कंदर्पजननी, मुख्या, वैकुण्ठ-गति- दायिका, रासभावा, प्रियतम का आलिंगन करने वाली, अत्यन्त प्रियपात्र, प्रथम नायिका, शुद्धा, सुधादेह वाली, श्रीरामा, रसमंजरी, महाप्रभावशालिनी, पवित्र आचरण वाली, गंगा तथा नर्मदा की जननी, गोमती और चन्द्रभागा के द्वारा स्तुत्य, सरयू तथा ताम्रपर्णी नदी को प्रकट करने वाली; निष्कलंकचरित्रा, गुणातीत और निर्मलस्वरूपा ॥२०६-२०९॥ नारद ! युगल रूप (राधा-कृष्ण के) ये सहस्र नाम हैं। वृन्दावन में यत्नपूर्वक इन नामों का पाठ करना चाहिये । ये सहस्र नाम महापापनाशन, वंध्यात्वमोचन, दारिद्र्यभंजक, रोगनाशक, कामदायक, पापहारी, शत्रुताध्वंसक और राधा-कृष्ण की भक्ति देने वाले हैं। अकुंठित मेधा वाले भगवान् कृष्ण को नमस्कार है। राधा-संग रूपी सुधासिंधु में नित्य विहार करने वाले माधव को नमस्कार है । मुनीश्वर ! राधादेवी जगत्कर्त्री, विश्व के पालन में निरत रहने वाली, संसार का ध्वंस करने वाली, सब की ईश्वरी और सब की माता हैं। उनके सहस्र नामों को मैंने बता दिया, जो दिव्य एवम् भुक्तिमुक्तिदायक हैं। इसके बाद क्या सुनना चाहते हो ? २१०-२१५॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में राधाकृष्णसहस्रनामकथन नामक बयासीवां अध्याय समाप्त ॥८२॥
अथ त्र्यशीतितमोऽध्यायः श्रीशौनक उवाच साधु सूत महाभाग जगदुद्धारकारकम् । महातंत्रविधानं नः कुमारोक्तं त्वयोदितम् ॥१॥ अलभ्यमेतत्तंन्त्रेषु पुराणेष्वपि मानद । यदिहोदितमस्मभ्यं त्वयातिकरुणात्मना ॥२॥ नारदो भगवान्सूत लोकोद्धरणतत्परः । भूयः पप्रच्छ किं साधो कुमारं विदुषां वरम् ॥३॥ सूत उवाच श्रुत्वा स नारदो विप्राः युग्मनामसहस्रकम् । सनत्कुमारमप्याह प्रणम्य ज्ञानिनां वरम् ॥४॥ नारद उवाच ब्रह्मंस्त्वया समाख्याता विधयस्तंत्रचोदिताः । तत्रापि कृष्णमंत्राणां वैभवं ह्युदितं महत् ॥५॥ या तत्र राधिका देवी सर्वाद्या समुदाहृता । तस्या अंशावताराणां चरितं मंत्रपूर्वकम् ॥६॥ तंत्रोक्तं वद सर्वज्ञ त्वामहं शरणं गतः । शक्तेस्तंत्राण्यनेकानि शिवोक्तानि मुनीश्वर ॥७॥ यानि तत्सारमुद्धृत्य साकल्येनाभिधेहि नः । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य नारदस्य महात्मनः ॥८॥ सनत्कुमारः प्रोवाच स्मृत्वाराधापदांबुजम् सनत्कुमार उवाच ॥८॥ श्रृणु नारद वक्ष्यामि राधांशानां समुद्भवम्
अध्याय ८३ राधा के अंश से उत्पन्न पाँच प्रकृतियों का लक्षण श्री शौनक बोले—महाभाग सूत ! साधुवाद ! आपने सनत्कुमार द्वारा कथित एवम् जगदुद्धारकारक महातंत्र का विधान हमने बता दिया ! मानदायक ! वह विधान तंत्रों में तथा पुराणों में भी अलभ्य है, जिसे आपने अत्यन्त कृपा करके हमें बतलाया है । सूत ! साधो ! लोगों के उद्धार करने में तत्पर भगवान् नारद ने विद्वद्वर कुमार से पुनः क्या प्रश्न किया ? ॥१-३॥ सूत बोले—विप्रवृन्द ! युगल सहस्र नाम को सुन कर नारद ने महाज्ञानी सनत्कुमार से प्रणामपूर्वक कहा ॥४॥ नारद बोले—ब्रह्मन् ! आपने मंत्र की विधियां बतलाईं, कृष्ण मंत्रों का महान् वैभव भी बतला दिया । अब जो राधिका देवी सब की आदि कही जाती हैं, उनके अंशावतारों का चरित्र मंत्रपूर्वक बता दीजिये, जो तंत्र के अनुकूल हो । सर्वज्ञ ! मैं आपका शरणापन्न हूँ । मुनीश्वर ! शिव ने शक्ति के अनेक तंत्र कहे हैं उन्हीं का सार निकाल कर आप विस्तार से वर्णन कीजिये । महात्मा नारद का यह वचन सुनकर सनत्कुमार राधा के चरणारविन्द का स्मरण करके कहने लगे ॥५-८½॥ सनत्कुमार बोले—नारद सुनो, मैं मंत्रों का साधन बताते हुए राधा के अंशों से उत्पन्न शक्तियों का
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७५६ शक्तीनां परमाश्चर्यं मंत्रसाधनपूर्वकम् । या तु राधा मया प्रोक्ता कृष्णाद्धांगसमुद्भवा ॥१०॥ गोलोकवासिनी सा तु नित्या कृष्णसहायिनी । तेजोमंडलमध्यस्था दृश्यादृश्यस्वरूपिणी ॥११॥ कदाचित्तु तया सार्द्ध स्थितस्य मुनिसत्तम । कृष्णस्य वामभागात् जातो नारायणः स्वयम् ॥१२॥ राधिकायाश्च वामांगान्महालक्ष्मीर्बभूव ह । ततः कृष्णो महालक्ष्मीं दत्त्वा नारायणाय च ॥१३॥ वैकुंठे स्थापयामास शश्वत्पालनकर्मणि । अथ गोलोकनाथस्य लोम्नां विवरतो मुने ॥१४॥ जाताश्चासंख्यगोपालास्तेजसा वयसा समाः । प्राणतुल्यप्रियाः सर्वे बभूवुः पार्षदा विभोः ॥१५॥ राधांगलोमकूपेभ्यो बभूवुर्गोपकन्यकाः । राधातुल्याः सर्वतश्च राधादास्यः प्रियंवदाः ॥१६॥ एतस्मिन्नंतरे विप्र सहसा कृष्णदेहतः । आविर्बभूव सा दुर्गा विष्णुमाया सनातनी ॥१७॥ देवीनां बीजरूपां च मूलप्रकृतिरीश्वरी । परिपूर्णतमा तेजःस्वरूपा त्रिगुणात्मिका ॥१८॥ सहस्रभुजसंयुक्ता नानाशास्त्रा त्रिलोचना । या तु संसारवृक्षस्य बीजरूपा सनातनी ॥१९॥ रत्नसिंहासनं तस्यै प्रददौ राधिकेश्वरः । एतस्मिन्नंतरे तत्र सस्त्रीकस्तु चतुर्मुखः ॥२०॥ ज्ञानिनां प्रवरः श्रीमान् पुमानोंकारमुच्चरन् । कमंडलुधरो जातस्तपस्वी नाभितो हरेः ॥२१॥ स तु संस्तूय सर्वेशं सावित्र्या भार्यया सह । निषसादासने रम्ये विभोस्तस्याज्ञया मुने ॥२२॥ अथ कृष्णो महाभाग द्विधारूपो बभूव ह । वामार्द्धांगो महादेवो दक्षार्द्धो गोपिकापतिः ॥२३॥ पंचवक्त्रस्त्रिनेत्रोऽसौ वामार्द्धांगो मुनीश्वरः । स्तुत्वा कृष्णं समाज्ञप्तो निषसाद हरेः पुरः ॥२४॥ अथ कृष्णश्चतुर्वक्त्रं प्राह सृष्टिं कुरु प्रभो । सत्यलोके स्थितो नित्यं गच्छ मां स्मर सर्वदा ॥२५॥
आश्चर्यजनक वर्णन करता हूँ। जिन राधा को मैंने कृष्ण की अर्द्धांगिनी कहा है, वे नित्य गोलोक में वास करती हुई कृष्ण की सहायता करती हैं। वे तेजोमंडल के मध्य में दृश्य एवम् अदृश्य रूप से विराजमान रहती हैं। मुनिश्रेष्ठ ! किसी समय राधा के साथ अवस्थित कृष्ण के वामभाग से स्वयम् नारायण उत्पन्न हुए और राधिका के वाम अंग से महालक्ष्मी उत्पन्न हुई। तब कृष्ण ने नारायण को महालक्ष्मी देकर निरन्तर पालन करने के लिये उन्हें वैकुण्ठ में स्थापित कर दिया। मुने ! तदनन्तर कृष्ण के लोमकूप से असंख्य गोपाल उत्पन्न हुए, जो समान तेज वाले, समवयस्क एवम् कृष्ण के प्राणतुल्य प्रिय थे। वे सब प्रभु के सभासद हुए ॥९-१५॥ राधा के लोमकूप से गोपकन्यायें उत्पन्न हुईं, जो सब तरह से राधा के तुल्य थीं। वे राधा की आज्ञाकारिणी दासी हुईं। विप्र ! इसी बीच एकाएक कृष्ण के शरीर से विष्णु की सनातनी माया दुर्गा प्रकट हुईं, जो देवियों की बीजरूप, मूल प्रकृति, ईश्वरी, परिपूर्णतमा, तेजःस्वरूपा, त्रिगुणात्मिका, सहस्रभुजाओं से संयुक्त, नानाशास्त्र- धारिणी, त्रिलोचना, संसाररूपी वृक्ष की बीजरूपा तथा सनातनी हैं। राधिकेश्वर ने उन्हें रत्न का सिंहासन प्रदान किया । इसी समय ज्ञानियों में श्रेष्ठ, श्रीमान् पुरुष, कमंडलुधारी एवम् तपस्वी ब्रह्मा ओंकार का उच्चा- रण करते हुए पत्नी सहित हरि की नाभि से उत्पन्न हुए ॥१६-२१॥ भार्या सावित्री के साथ वे सर्वेश्वर कृष्ण की स्तुति कर विभु की आज्ञा से रमणीय आसन पर बैठ गये । महाभाग ! तदुपरांत कृष्ण के दो रूप हो गये । बायें आधे अंग से महादेव हुए और दाहिने अर्धांग से गोपिकापति प्रकट हुए । बायें अर्धांग से समुत्पन्न पांच मुख वाले तथा तीन नेत्र वाले मुनीश्वर शिव कृष्ण की स्तुति कर उनकी आज्ञा से उनके सामने ही बैठ गये । तदनन्तर कृष्ण ने चतुर्मुख से कहा—"प्रभो ! आप सत्यलोक में नित्य वास करते हुए सृष्टि कीजिये और सदा मेरा स्मरण रखिये ॥२२-२५॥
७६० नारदीयपुराणम् एवमुक्तस्तु हरिणा प्रणम्य जगदीश्वरम् । जगाम भार्यया साकं स तु सृष्टिं करोति वै ॥२६॥ पितास्माकं मुनिश्रेष्ठ मानसीं कल्पदैहिकीम् । ततः पश्चात्पंचवक्त्रं कृष्णः प्राह महामते ॥२७॥ दुर्गां गृहाण विश्वेश शिवलोके तपश्चर । यावत्सृष्टिस्तदंते तु लोकान्संहार सर्वतः ॥२८॥ सोऽपि कृष्णं नमस्कृत्य शिवलोकं जगाम ह । ततः कालांतरे ब्रह्मन्कृष्णस्य परमात्मनः ॥२९॥ वक्त्रात्सरस्वती जाता वीणापुस्तकधारिणी । तामादिदेश भगवान् वैकुण्ठं गच्छ मानदे ॥३०॥ लक्ष्मोसमीपे तिष्ठ त्वं चतुर्भुजसमाश्रया । सापि कृष्णं नमस्कृत्य गता नारायणांतिकम् ॥३१॥ एवं पञ्चविधा जाता सा राधा सृष्टिकारणम् । आसां पूर्णस्वरूपाणां मंत्रध्यानाच्चनादिकम् ॥३२॥ वदामि शृणु विपेंद्र लोकानां सिद्धिदायकम् । तारः क्रियायुक् प्रतिष्ठा प्रीतपाढ्या च ततः परम् ॥३३॥ ज्ञानामृता क्षुधायुक्ता वह्नीजायांतको मनुः । सुतपास्तु ऋषिश्चंदो गायत्री देवता मनोः ॥३४॥ राधिका प्रणवो बीजं स्वाहा शक्तिरुदाहृता । षडक्षरैः षडंगानि कुर्याद्विन्दुविभूषितैः ॥३५॥ ततो ध्यायन्स्वहृदये राधिकां कृष्णभामिनीम् । श्वेतचंपकवर्णाभां कोटिचन्द्रसमप्रभाम् ॥३६॥ शरत्पार्वणचन्द्रास्यां नीलेंदीवरलोचनाम् । सुश्रोणीं सुतितंबां च पक्वविंवाधरांवराम् ॥३७॥ मुक्ताकुन्दामदशनां वह्निशुद्धांशुकाान्विताम् । रत्नकेयूरवलयहारकुण्डलशोभिताम् ॥३८॥ गोपीभिः सुप्रियाभिश्च सेवितां श्वेतचामरैः । रासमंडलमध्यस्थां रत्नसिंहासनस्थिताम् ॥३९॥
हरि के इतना कहने पर ब्रह्मा जगदीश्वर को प्रणाम करके भार्या सहित प्रस्थित हो गये । मुनिश्रेष्ठ ! तब से मेरे पिता मानसी एवम् दैहिकी सृष्टि करने लगे । महामतिमन् ! तत्पश्चात् कृष्ण ने पंचमुख शिव से कहा--"विश्वेश ! दुर्गा को स्वीकार कर शिवलोक में तपस्या कीजिये और सृष्टि के अन्त में समस्त लोकों का संहार कीजियेगा" ॥२६-२८॥ ब्रह्मन् ! तब शंकरजी कृष्ण को प्रणाम कर शिवलोक को चले गये । बाद में परमात्मा कृष्ण के मुख से वीणा-पुस्तकधारिणी सरस्वती उत्पन्न हुईं । उन्हें भगवान् ने आदेश दिया—"मानदे ! तुम वैकुण्ठ जाओ और विष्णु आश्रित होकर लक्ष्मी के समीप निवास करो ।" वे भी कृष्ण को प्रणाम कर नारायण के पास चली गईं ॥२९-३१॥ विप्रेन्द्र ! इस प्रकार राधा से पाँच प्रकार की सृष्टि हुई । अब सकल लोकों को सिद्धि प्रदान करने वाले उनके पूर्ण स्वरूप के मन्त्र, ध्यान, पूजन आदि के विषय में तुम सुनो । क्रियायुक्त तार (ह्रीं) देवी का मन्त्र, उनकी प्रतिष्ठा प्रीतिसम्पन्न है, ज्ञानामृत तथा क्षुधा से युक्त स्वाहा देवी मंत्र का अन्तिम भाग है । मंत्र के ऋषि सुतपा हैं, छंद गायत्री है, देवता राधिका हैं, बीज प्रणव है और शक्ति स्वाहा है । बिंदुभूषित छः अक्षरों से षडंगन्यास करना चाहिये । तदनंतर अपने हृदय में कृष्णप्रिया राधिका का ध्यान करना चाहिये, जिनको वर्णच्छवि श्वेत चंपा के समान है, कान्ति कोटि चन्द्रों के तुल्य है, मुख शरत्कालीन चन्द्रमा के सदृश है, नेत्र नील कमल के समान हैं, श्रोणी और नितम्ब मनोहर हैं, अधर पक्वबिंब के सदृश हैं, दांत मोती तथा कुंदपुष्पों के समान हैं, राधिका देवी स्वयं वह्नि के समान शुद्ध वस्त्रों, से अलंकृत और रत्न, केयूर, वलय (चूड़ी), हार तथा कुंडल से सुशोभित हैं । अत्यन्त प्यारी गोपियाँ श्वेत चामर से उनकी सेवा करती हैं । वे रासमंडल के मध्य में रत्न सिंहासन पर विराजमान हैं । इस प्रकार ध्यान कर उन्हें पुष्पांजलि समर्पित करते हुए षोडशोपचार पूजा करे । तत्पश्चात्
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६१ ध्यात्वा पुष्पांजलिं क्षिप्त्वा पूजयेदुपचारकैः । लक्षषट्कं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं हुनेत्तिलैः ॥४०॥ आज्याक्तैर्मातृकापीठे पूजा चावरणेः सह । षट्कोणेषु षडंगानि तद्बाह्येऽष्टदले यजेत् ॥४१॥ मालावतीं माधवीं च रत्नमालां सुशीलिकाम् । ततः शशिकलां पारिजातां पद्मावतीं तथा ॥४२॥ सुन्दरीं च क्रमात्प्राच्यां दिग्विदिक्षु ततो बहिः । इन्द्राद्यान्सायुधानिष्ट्वा विनियोगांस्तु साधयेत् ॥४३॥ राधा कृष्णप्रिया रासेश्वरी गोपीगणाधिपा । निर्गुणा कृष्णपूज्या च मूलप्रकृतिरीश्वरी ॥४४॥ सर्वेश्वरी सर्वपूज्या वैराजजननी तथा । पूर्वाद्याशासु रक्षतु पांतु मां सर्वतः सदा ॥४५॥ त्वं देवि जगतां माता विष्णुमाया सनातनी । कृष्णमायादिदेवी च कृष्णप्राणाधिके शुभे ॥४६॥ कृष्णभक्तिप्रदे राधे नमस्ते मंगलप्रदे । इति सम्प्रार्थ्य सर्वेशों स्तुत्वा हृदि विसर्जयेत् ॥४७॥ एवं यो भजते राधां सर्वाद्यां सर्वमंगलाम् । भुक्त्वेह भोगानखिलांन्सोऽन्ते गोलोकमाप्नुयात् ॥४८॥ अथ तुभ्यं महालक्ष्म्या विधानं वच्मि नारद । यदाराधनतो भूयात्साधको भुक्तिमुक्तिमान् ॥४९॥ लक्ष्मीमायाकामवाणीपूर्वा कमलवासिनी । ङेता वह्निप्रियांतोऽयं मंत्रकल्पद्रुमः परः ॥५०॥ ऋषिर्नारायणश्चास्य छन्दो हि जगती तथा । देवता तु महालक्ष्मीर्द्विद्विवर्णैः षडंगकम् ॥५१॥ श्वेतचंपकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् । ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां भक्तानुकम्पकातरामू ॥५२॥ बिभ्रतीं रत्नमालां च कोटिचन्द्रसमप्रभाम् । ध्यात्वा जपेदर्कलक्षं पायसेन दशांशतः ॥५३॥ जुहुयादेधिते वह्नौ श्रीद्रुकाष्ठैः समर्चयेत् । नवशक्तियुते पीठे ह्यंगैरावरणैः सह ॥५४॥ विभूतिरुन्नतिः कांतिः सृष्टिः कीर्तिश्च सन्नतिः । व्युष्टिरुत्कृष्टिश्च ऋद्धिश्च संप्रोक्ता नव शक्तयः ॥५५॥ छः लाख मंत्र का जप करके घृतयुक्त तिलसे उसका दशांश हवन करे ॥३२-४०॥ मातृकापीठ पर पूजन करना चाहिये । वहां वस्त्र का आवरण (चंदवा) लगाना चाहिये । छः कानों में अष्टदल कमल का निर्माण कर छः अंगों का पूजन करे । पूर्व दिशा में क्रमशः मालावती, माधवी, रत्नमाला, सुशीलिंका, शशिकला, पारिजाता, पद्मावती तथा सुन्दरी की पूजा करे । तदपश्चात् दिशा-विदिशाओं में आयुध सहित इन्द्र आदि देवों की अर्चना कर विनियोग का साधन करे । फिर प्रार्थना करे- "राधा, कृष्णप्रिया, रासेश्वरी, गोपियों की स्वामिनी, निर्गुणा, कृष्णपूज्या, मूलप्रकृति, ईश्वरी, सर्वेश्वरी, सर्वपूज्या तथा वैराजजननी पूर्व आदि दिशाओं में सब ओर से सदा मेरी रक्षा करें। देवि ! तुम जगन्माता विष्णु की माया, सनातनी, कृष्ण की माया तथा आदि- देवी हो । कृष्ण की प्राणाधिक प्रिये ! कल्याणि ! कृष्णभक्तिदायिके ! मंगलप्रदे ! राधे ! तुम्हें नमस्कार है ।" इस प्रकार सर्वेश्वरी की स्तुति एवम् प्रार्थना करके हृदय में उसका विसर्जन करे ॥४१-४७॥ जो व्यक्ति इस तरह सब की आदि तथा अखिलकल्याणदायिनी राधा की आराधना करता है, वह इस लोक में सकल भोगों को भोग कर अन्त में गोलोक को प्राप्त करता है । नारद ! अब मैं तुमसे महालक्ष्मी- पूजन का विधान बतला रहा हूँ, जिनकी आराधना करने से साधक भोग-मोक्ष को प्राप्त करता है। "लक्ष्मी- माया.........'स्वाहा" यह मन्त्र कल्पद्रुम से भी परे है । इसके ऋषि नारायण, छन्द जगती और देवता महालक्ष्मी हैं। दो-दो अक्षरों से षडंगन्यास कर श्वेतचम्पा के समान कान्तिवाली, रत्न के आभूषणों से भूषित, किञ्चित् हास्य से प्रसन्न मुखवाली, भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने वाली, रत्नमाला को धारण करने वाली और कोटि चन्द्रों के समान प्रभा वाली महालक्ष्मी का ध्यान करे । फिर बारह लाख मन्त्र का जप करके उसका दशांश प्रज्वलित वह्नि में बेल की लकड़ी से हवन करे । हवन तो नौ शक्तियों से युक्त पीठ पर अंग तथा आवरण के साथ होना चाहिये ॥४८-५४॥ विभूति, उन्नति, कांति, सृष्टि, कीर्ति, सन्नति, व्युष्टि, उत्कृष्टि ९६-ना० पृ०
७६२ नारदीयपुराणम् अत्रावाह्य च मूलेन मूर्ति संकल्प्य साधकः । षट्कोणेषु षडंगानि दक्षिणे तु गजाननम् ॥५६॥ वामे कुसुमधन्वानं वसूपत्रे ततो यजेत् । उमां श्रीं भारतीं दुर्गां धरणीं वेदमातरम् ॥५७॥ देवीमुषां च पूर्वाद्रौ दिग्विंदिक्षु क्रमेण हि । जह्ननुसूर्यसुते पूज्ये पादप्रक्षालनोद्यते ॥५८॥ शंखपद्मनिधी पूज्यौ पार्श्वयोर्धृतचामरौ । धृतातपत्रं वरुणं पूजयेत्पश्चिमे ततः ॥५९॥ संपूज्य राशीन्परितो यथास्थानं नवग्रहान् । चतुर्दन्तैरावतादीन् दिग्विंदिक्षु ततोऽर्चयेत् ॥६०॥ तद्वबहिर्लोकपालांश्च तदस्त्राणि च तद्बहिः । दूर्वाभिराराज्यसिक्ताभिर्जुहुयादायुषे नरः ॥६१॥ गुडूचीमाज्यसंसिक्तां जुहुयात्सप्तवासरम् । अष्टोत्तरसहस्रं यः स जीवेच्छरदां शतम् ॥६२॥ हुत्वा तिलान्घृताभ्यक्तान्दोर्घमायुष्यमाप्नुयात् । आरभ्यार्कदिनं मंत्री दशाहं घृतसंप्लुतः ॥६३॥ जुहुयादर्कसमिधः शरीरारोग्यसिद्धये । शालिभिर्जुहुतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम् ॥६४॥ अचिरादेव महती लक्ष्मी संजायते ध्रुवम् । उषाजाजीनालिकेररजोभिघृतमिश्रितैः ॥६५॥ हुनेदष्टोत्तरशतं पायसाशी तु नित्यशः । मण्डलाज्जायते सोऽपि कुबेर इव मानवः ॥६६॥ हविषा गुडमिश्रेण होमतो ह्यन्नवान्भवेत् । जपापुष्पाणि जुहुयादष्टोत्तरसहस्रकम् ॥६७॥ तांबूलरसमिश्रं तद्भस्मतिलकं चरेत् । चतुर्णामपि वर्णानां मोहनाय द्विजोत्तमः ॥६८॥ एवं यो भजते लक्ष्मीं साधकेन्द्रो मुनीश्वर । सम्पदस्तस्य जायंते महालक्ष्मीः प्रसीदति ॥६९॥ देहांते वैष्णवं धाम लभते नात्र संशयः । या तु दुर्गा द्विजश्रेष्ठ शिवलोकं गता सती ॥७०॥ तथा ऋद्धि—ये नौ शक्तियां हैं। साधक को चाहिये कि वह उस पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति का आवाहन कर संकल्प करे। पश्चात् छह कोणों में छह अंगों का, दक्षिण दिशा में गणेश का और उत्तर दिशा में कन्दर्प का पूजन करे। पूजन अगस्त वृक्ष के पत्र पर होना चाहिये । तदनन्तर पूर्व आदि में उमा, श्रीं, भारती, दुर्गा, धरणी, वेदमाता, देवी तथा उषा की पूजा करनी चाहिये । (महालक्ष्मी के) चरण पखारने के लिये उद्यत गंगा यमुना का पूजन करना चाहिये। दोनों बगल में चामर धारण करने वालो शंखनिधि तथा पद्मनिधि की अर्चना करे। पश्चिम में छत्र धारण किये हुए वरुण का पूजन करे । फिर यथास्थान नवग्रहों का पूजन करे। दिशा-विदिशाओं में चतुर्दन्त ऐरावत आदि हस्तिर्यों का पूजन करे । ५५-६०॥ तदनन्तर लोकपालों का और फिर उनके अस्त्रों का पूजन कर घृतसिक्त दूर्वा से आयु के लिये हवन करे। जो मनुष्य सात दिन घृताक्त गुडूची (गुरूच) से एक हजार आठ बार हवन करता है, वह सौ वर्षों तक जीता है। घृतयुक्त तिल से हवन करने वाला व्यक्ति दीर्घायु होता है। जो साधक रवि दिन से प्रारम्भ कर दश दिनों तक घृतयुक्त आक की लकड़ी से होम करता है, वह शरीर से नीरोग होता है। जो व्यक्ति नित्य एक हजार आठ बार चावल से होम करता है, उसे अल्प काल में ही महती लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। जो मानव नित्य खीर भोजन करता है तथा उषाकाल में नारियल एवम् घी से अष्टोत्तरशत हवन करता है, वह शीघ्र ही कुबेर तुल्य हो जाता है ॥६१-६६॥ गुडमिश्रित घी से होम करने से अन्न की प्राप्ति होती है। जो द्विजवर चारों वर्णों को मोहित करना चाहता है, वह जपापुष्प से अष्टोत्तर सहस्र हवन करे और उसके भस्म में ताम्बूल का रस मिला कर तिलक लगाये ॥६७-६८॥ मुनीश्वर ! इस प्रकार जो साधक लक्ष्मी की आराधना करता है, उसे सकल संपत्तियों की प्राप्ति होती है, उसके ऊपर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वह देहावसान होने पर वैकुंठ को जाता है, इसमें संशय
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६३ सा शिवाज्ञामनुप्राप्य दिव्यलोकं विनिर्ममे । देवीलोकेति विख्यातं सर्वलोकविलक्षणम् ॥७१॥ तत्र स्थिता जगन्माता तपोनियममास्थिता । विविधान् स्वावतारान्हि त्रिकाले कुरुतेऽनिशम् ॥७२॥ मायाधिका ह्लादिनीयुक् चंद्राढ्या सर्गिणी पुनः । प्रतिष्ठा स्मृतिसंयुक्ता क्षुधया सहिता पुनः ॥७३॥ ज्ञानासृता वह्निजायांतस्ताराद्यो मनुर्मतः । ऋषिः स्याद्वामदेवोऽस्य छंदो गायत्रमीरितम् ॥७४॥ देवता जगतामादिर्दुर्गा दुर्गतिनाशिनी । ताराद्यैकेकवर्णेन हृदयादित्रयं मतम् ॥७५॥ विभिर्वर्मक्षणं द्वाभ्यां सर्वैरस्त्रमुदीरितम् । महामरकतप्रख्यां सहस्रभुजमंडिताम् ॥७६॥ नानास्त्राणि दधतीं त्रिनेत्रां शशिशेखराम् । कंकणांगदहाराढ्यां क्वणन्नूपुरकान्विताम् ॥७७॥ किरीटकुंडलंघरां दुर्गा देवीं विचितयेत् । वसुलक्षं जपेन्मंत्रं तिलैः समधुरैहुनेत् ॥७८॥ पयोऽध्रसा वा सहस्रं नवपद्मात्मके यजेत् । ॥७६॥ प्रभा माया जया सूक्ष्मा विशुद्धानंदिनी पुनः । सुप्रभा विजया सर्वसिद्धिदा पीठशक्तयः ॥८०॥ अद्भिर्मह्रस्वत्रयक्लीबरहितैः पूजयेदिमाः । प्रणवो वज्रनखदंष्ट्रायुधाय महापदात् ॥८१॥ सिंहाय वर्मास्त्रं हृच्च प्रोक्तः सिंहमनुर्मुने । दद्यादासनमेतेन मूत्ति मूलेन कल्पयेत् ॥८२॥ अङ्गावृत्ति पुराभ्यर्च्य शक्तीः पत्रेषु पूजयेत् । जया च विजया कीर्तिः प्रीतिः पश्चात्प्रभा पुनः ॥८३॥ श्रद्धा मेधा श्रुतिश्चैव स्वनामाद्याक्षरादिकाः । पत्राग्रेष्वर्चयेदष्टावायुधानि यथाक्रमात् ॥८४॥ शंखचक्रगदाखड्गपाशांकुशशरांधनुः । लोकेश्वरांस्ततो बाह्ये तेषामस्त्राण्यनंतरम् ॥८५॥ इत्थं जपादिसिमंत्त्री मंत्रे सिद्धे विधानवित् । कुर्यात्प्रयोगानमुना यथा स्वस्वमनीषितम् ॥८६॥ नहीं । द्विजश्रेष्ठ ! जो सती दुर्गा शिवलोक में गईं, उन्होंने शंकर की आज्ञा से दिव्यलोक की सृष्टि की। वह देवीलोक के नाम से प्रसिद्ध है, जो अखिल लोकों से उत्तम है। वहां तप एवम् नियम में अवस्थित जगन्माता तीनों काल निरवच्छिन्न रूप से अपने विविध अवतारों का संपादन करती रहती हैं, माया, ह्लादिनी, चंद्राख्या, सर्गिणी, प्रतिष्ठा, स्मृति, क्षुधा तथा अन्त में स्वाहा और आदि में ओं--यहो मन्त्र बताया गया है। इस मन्त्र के ऋषि वामदेव, छन्द गायत्री और देवता भयंकर पीड़ा का नाश करने वाली जगन्माता दुर्गा है। ओं आदि मन्त्रों के एक-एक वर्ण से हृदय आदि तीन चीजें बताई जाती हैं। तीन अक्षरों से नेत्र और दो अक्षरों से सम्पूर्ण अस्त्र कहे गये हैं। महामरकतमणि के समान कान्ति वाली, सहस्र भुजाओं से अलंकृत, अनेक शस्त्रों को धारण करने वाली, तीन चक्षु वाली, ललाट पर चन्द्र धारण करने वाली, कंगन केयूर तथा हार से विभूषित, शब्दधायमान नूपुर से युक्त ओर मुकुट तथा कुंडल धारण करने वालो दुर्गा देवी का ध्यान करे । तदनन्तर मन्त्र का आठ लाख जप करके मधुर सहित तिल से हवन करे। अथवा खीर से नवपद्मात्मक पीठ पर सहस्रबार हवन करे। प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, आनंदिनी, सुप्रभा, विजया तथा सर्वसिद्धिदा ये नौ पीठशक्तियां हैं ॥६९-८०॥ तीन ह्रस्व तथा क्लीबरहित जल से इन शक्तियों का पूजन करे। मुने! महा- पद से लेकर वज्र, नख, दंष्ट्रा तथा आयुध तक के लिये प्रणव और सिंह के लिये वर्मास्त्र एवम् हृदय कहा गया है। यही सिंह-मंत्र है। इस मंत्र से आसन प्रदान कर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे। पहिले अंगावृत्ति का पूजन कर पत्रों पर शक्तियों की अर्चना करे। जया, विजया, कीर्ति, प्रीति, प्रभा, श्रद्धा, मेधा तथा श्रुति अपने नाम के आद्य अक्षर और शंख, चक्र, गदा, खड्ग, पाश, अंकुश, बाण एवम् धनुष का क्रमशः पूजन करे। तदनन्तर लोकपाल तथा उनके अस्त्रों की पूजा करे विधानवेत्ता मन्त्री इस प्रकार जप आदि से मंत्र को सिद्ध कर अपनी अभीप्सित वस्तु के लिये उस मन्त्र का प्रयोग करे । ॥८१-८६॥ विधिपूर्वक नौ सुन्दर कलशों की
७६४ नारदीयपुराणम् प्रतिष्ठाप्य विधानेन कलशान्नवशोभनान् । रत्नहेमादिसंयुक्तान्घटेषु नवसु स्थितान् ॥८७॥ मध्यस्थे पूजयेद्देवीमितरेषु जयादिकाः । संपूज्य गन्धपुष्पाद्यैरभिषिञ्चेन्नराधिपम् ॥८८॥ राजा विजयते शत्रूञ्जयोऽधिको विजयश्रियम् । प्राप्नोत्यरोगो दीर्घायुः सर्वव्याधिविवर्जितः ॥८९॥ वन्ध्याभिषिक्ता विधिना लभते तनयं वरम् । मन्त्रेणानेन संजप्तमाज्यं क्षुद्रग्रहापहम् ॥९०॥ गर्भिणीनां विशेषेण जप्तं भस्मादिकं तथा । जृम्भश्वासे तु कृष्णस्य प्रविष्टे राधिकामुखम् ॥९१॥ या तु देवी समुद्भूता वीणापुस्तकधारिणी । तस्या विधानं विप्रेंद्र शृणु लोकोपकारकम् ॥९२॥ प्रणवो वाग्भवं माया श्रीः कामः शक्तिरीरिता । सरस्वती चतुर्थ्यंता स्वाहांतो द्वादशाक्षरः ॥९३॥ मनुर्नारायण ऋषिविराट् छन्दः समोरितम् । महासरस्वती चास्य देवता परिकीर्तिता ॥९४॥ वाग्भवेन षडङ्गानि कृत्वा वर्णान्न्यसेद् बुधः । ब्रह्मरंध्रे न्यसेत्तारं लज्जां भ्रूमध्यगां न्यसेत् ॥९५॥ मुखनासिकादिकर्णेषु गुदेषु श्रीमुखार्णकान् । ततो वाग्देवतां ध्यायेद्वीणापुस्तकधारिणीम् ॥९६॥ कर्पूरकुन्दधवलां पूर्णचंद्रोज्ज्वलाननाम् । हंसाधिरूढां भालेन्दुदिव्यालंकारशोभिताम् ॥९७॥ जपेद्द्वादशलक्षाणि ततसहस्रं सितांबुजैः । नागचंपकपुष्पैर्वा जुहुयात्साधकोत्तमः ॥९८॥ मातृकोक्ते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् । वर्णाब्जेनासनं दद्यान्मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ॥९९॥ देव्या दक्षिणतः पूज्या संस्कृता वाङ्मयी शुभा । प्राकृता वामतः पूज्या वाङ्मयो सर्वसिद्धिदा ॥१००॥ पूर्वमंगानि षट्कोणे प्रजाद्याः पूजयेद्बहिः । प्रज्ञा मेधा श्रुतिः शक्तिः स्मृतिर्वागीश्वरी मतिः ॥१०१॥ स्वस्तिश्चेति समाख्याता ब्रह्माद्यास्तदनंतरम् । लोकेशानर्चयेद्भूयस्तदस्त्राणि च तद्बहिः ॥१०२॥
स्थापना करे, जो रत्न, सुवर्ण आदि से युक्त हों। बीच के कलश पर देवी की और इतर कलशों पर जया आदिकों की गंध, पुष्प आदि से अर्चना कर उस जल से राजा का अभिषेक करे। अभिषिक्त राजा शत्रुओं के ऊपर विजय, विजयलक्ष्मी, आरोग्य और दीर्घायु को प्राप्त करता है। वंध्या स्त्री विधिवूर्वक अभिषिक्त होने पर उत्तम पुत्र को प्राप्त करती है। घी को इस मन्त्र से अभिमंत्रित कर देने पर वह घी क्षुद्र ग्रहों का नाशक हो जाता है। उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित भस्म आदि गर्भिणियों के लिये विशेष लाभदायक है। विप्रेन्द्र ! कृष्ण की जंभाई राधिका के मुख में प्रविष्ट होने पर जो वीणा पुस्तक धारिणी देवी उत्पन्न हुई थीं उनके लोकोपकारक विधान को सुनो। उनके द्वादशाक्षर मन्त्र के अन्त में स्वाहा है और मंत्र के अन्तर्गत प्रणव, वाग्भव, माया, श्री, काम, शक्ति तथा सरस्वती हैं। मंत्र के ऋषि नारायण, छंद विराट् और देवता सरस्वती हैं ॥८७-९४॥ बुधजन वाग्भव मन्त्र से षडंगन्यास करके वर्णन्यास करे। ब्रह्मरंध्र में ओंका, भौं के मध्य में लज्जा का और मुख, नासिका, कर्ण एवम् गुदा में श्रीमुखवर्णों का न्यास करे। तदुपरान्त उत्तम साधक वीणा और पुस्तक धारण करने वाली, कर्पूर तथा कुन्दपुष्प के समान शुभ्र वर्ण वाली, पूर्णचंद्र के सदृश मुख वाली, हंस पर आरूढ और चंद्ररूप दिव्य अलंकार से सुशोभित ललाट वाली वाग्देवता (सरस्वती) का ध्यान कर बारह लाख मंत्र का जप करे। फिर उसका दशांश श्वेतकमल या नागचंपा से हवन करे ॥९५-९८॥ तत्पश्चात् मातृकापीठ पर वक्ष्यमाण क्रम से उनकी अर्चना करे। मूल से मूर्ति की कल्पना कर कमल का आसन प्रदान करे। देवी के दक्षिण भाग में पवित्र संस्कृत वाङ्मय देवी की पूजा करे और वामभाग में समस्त सिद्धियों को देने वाली प्राकृत वाङ्मयी देवी की आराधना करे। पहले षट्कोण में छह अंगों का पूजन कर बाद में ब्रह्मा, प्रज्ञा, मेधा, श्रुति, शक्ति, स्मृति, वागीश्वरी, मूर्ति तथा स्वस्ति का पूजन करे। तदनन्तर लोकपाल और उनके अस्त्रों की पूजा करनी चाहिए ॥९९-१०२॥
[Page Header] त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६५
[Sanskrit Text] एवं संपूज्य वाग्देवीं साक्षाद्वाग्वल्लभो भवेत् । ब्रह्मचर्यरतः शुद्धः शुद्धदंतनखादिकः ॥१०३॥ संस्मरन् सर्ववनितात: सततं देवताबिया । कवित्वं लभते धीमान् मासैर्द्वादशभिर्ध्रुवम् ॥१०४॥ पीत्वा तन्मंत्रितं तोयं सहस्रं प्रत्यहं मुने । महाकविर्भवेन्मत्री वत्सरेण न संशयः ॥१०५॥ उरोमात्रोदके स्थित्वा ध्यान्मार्तंडमंडले । स्थितां देवीं प्रतिदिनं त्रिसहस्रं जपेन्मनुम् ॥१०६॥ लभते मंडलात्सिद्धि वाचामप्रतीमां भुवि । पालाशविल्वकुसुमैर्जुहुयान्मधुरोक्षितैः ॥१०७॥ समिद्भिर्वा तदुत्थामिर्यशः प्राप्नोति वाक्पतेः । राजवृक्षसमुद्भूतैः प्रसूनैर्मधुराप्लुतैः ॥१०८॥ तत्समिद्भिश्च जुहुयात्कवित्वमतुलं लभेत् । अथ प्रवक्ष्ये विप्रेन्द्र सावित्रीं ब्रह्मणःप्रियाम् ॥१०८॥ यां समाराध्य ससृजे ब्रह्मा लोकाँश्चराचरान् । लक्ष्मो माया कामपूर्वा सावित्री ङेसन्मन्विता ॥११०॥ स्वाहांतो मनुराख्यातः सावित्र्या वसुवर्णवान् । ऋषिर्ब्रह्मास्य गायत्री छंदः प्रोक्तं च देवता ॥१११॥ सावित्रीं सर्वदेवानां सावित्री परिकीर्तिता । हृदंतिकैर्ब्रह्म विष्णुद्देश्वरसदाशिवैः ॥११२॥ सर्वात्मना च ङेयुक्तै रंगानां कल्पनं मतम् । तप्तकांचनवर्णाभां ज्वलन्तीं ब्रह्मतेजसा ॥११३॥ ग्रीष्ममध्याह्न मार्तंड सहस्रसमविग्रहाम् । ईषद्व्रास्यप्रसन्नास्यां रत्नभूषणभूषिताम् ॥११४॥ वह्निशुद्धांशुकाधानां भक्तानुग्रहकातराम् । सुखदां मुक्तिदां चैव सर्वसंपत्प्रदां शिवाम् ॥११५॥ वेदबीजस्वरूपां च ध्यायेद्वेदप्रसूं सतीम् । ध्यात्वैवं मण्डले विद्वान् त्रिकोणोज्ज्वलकर्णिके ॥११६॥
[Hindi Translation] इस प्रकार वाग्देवी की आराधना करनेवाला व्यक्ति साक्षात् वाचस्पति होता है। जो बुद्धिमान् मानव बारह मास तक दांत, नाखून आदि को पवित्र रखते हुए ब्रह्मचर्य एवम् शुचिता से रहता है और सकल महिलाओं को देवीबुद्धया देखता है, वह कवित्वशक्ति को निश्चित ही प्राप्त करता है। मुने ! जो व्यक्ति प्रत्येक दिन सरस्वती के मन्त्र से सहस्र बार जल को अभिमन्त्रित कर पान करता है, वह एक वर्ष के भीतर महाकवि हो जाता है, इसमें संशय नहीं । जो छातीभर जल में खड़ा होकर सूर्यमंडल में अवस्थित देवी का ध्यान करते हुए प्रतिदिन तीन हजार मंत्र का जप किया करता है, वह पृथ्वी पर अद्वितीय वाक्सिद्धि को प्राप्त करता है। जो मधुर मिश्रित पलाश एवम् बिल्व के पुष्पों से या समिधाओं से होम करता है वह वाक्पति के समान यशस्वी होता है ॥१०३-१०७॥ मधुरमिश्रित राजवृक्ष (सोन्दाल) के पुष्प तथा समिधा से हवन करनेवाला व्यक्ति अतुलनीय कवित्व-शक्ति को प्राप्त करता है। विप्रेन्द्र । अब मैं ब्रह्मा की प्रिया सावित्री के बारे में कहूँगा जिनकी आराधना करके चतुरानन ने चराचर जगत् की सृष्टि की। लक्ष्मी, माया, कामपूर्वा 'ङे' युक्त सावित्री तथा स्वाहा को जोड़कर सावित्री का अष्टाक्षर मन्त्र कहा गया है। इस मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा है, छंद गायत्री है और देवता सावित्री है, जो समस्त देवों की उत्पादयित्री कही जाती है। सर्वतोभावेन 'ङे' से युक्त ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर तथा सदाशिव द्वारा हृदय में अंगों की कल्पना करनी चाहिए ॥१०८-११२॥ तदनन्तर विद्वान् व्यक्ति तप्त सुवर्ण के समान वर्णच्छटा वाली ब्रह्मतेज से जाज्वल्यमान ग्रीष्मऋतु के मध्याह्नकालीन सहस्र सूर्यों के समान शरीरवाली, किंचित् हास्य तथा प्रसन्नता से युक्त मुख वाली, रत्न के आभूषणों से भूषित, वह्नि के समान शुद्ध वस्त्रों से सुसज्जित, भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने के लिये आतुर, सुख, मोक्ष तथा निखिल संप- त्तियों को देने वाली, कल्याणमयी, वेद की बीजस्वरूप, वेदजननी तथा सती सावित्री का ध्यान करे ॥११३- ११५३॥ फिर त्रिकोण तथा उजले कनेल से युक्त सौर पीठ पर दीप्ता आदि नौ शक्तियों के साथ सावित्री देवी का पूजन करे । मूल मंत्र से आवाहन कर देवी की प्रतिमा की पूजा करनी चाहिए। पश्चात् तीन कोणों में
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
७६६ नारदीयपुराणम् सौरे पीठे यजेद्देवीं दीप्तादिनवशक्तिभिः । मूलमंत्रेण क्लृप्तायां मूतौ देवीं प्रपूजयेत् ॥११७॥ कोणेषु त्रिषु संपूज्या ब्राह्म्याद्याः शक्तयो बहिः । आदित्याद्यास्ततः पूज्या उषादिसहिताः क्रमात् ॥११८॥ ततः षडंगान्यभ्यर्च्य केसरेषु यथाविधि । प्रह्लादिनीं प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वंभरां पुनः ॥११९॥ विलासिनीप्रभावत्यौ जयां शांतां यजेत्पुनः । कांति दुर्गासरस्वत्यौ विद्यारूपां ततः परम् ॥१२०॥ विशालसंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् । तमोपहारिणीं सूक्ष्मां विश्वयोनि जयावहाम् ॥१२१॥ पद्मालयां परां शोभां ब्रह्म रूपां ततोऽर्चयेत् । ब्राह्म्याद्याः शारणा बाह्ये पूजयेत्प्रोक्तलक्षणाः ॥१२२॥ ततोऽभ्यर्चद् ग्रहान्बाह्ये शक्राद्यानायुधैः सह । इत्थमावरणैर्देवीः दशभिः परिपूजयेत् ॥१२३॥ अष्टलक्षं जपेन्मंत्रं तत्सहस्रं हुनेत्तिलैः । सर्वपापविनिर्मुक्तो दीर्घमायुः स विंदति ॥१२४॥ अहणाब्जैस्त्रिमध्वक्तैर्जुहुयादयुतं ततः । महालक्ष्मीर्भवेत्तस्य षण्मासान्नात्र संशयः ॥१२५॥ ब्रह्मवृक्षप्रसूनैस्तु जुहुयाद्ब्रह्मतेजसे । बहुना किमिहोक्तेन यथावत्साधिता सती ॥१२६॥ साधकानामिदं विद्या भवेत्कामदुघा मुने । अथ ते संप्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ॥१२७॥ सावित्रीपंजरं नाम सर्वरक्षाकरं नृणाम् । व्योमकेशालकासक्तां सुकिरीटविराजिताम् ॥१२८॥ मेघभ्रू कुटिलाक्रांतां विधिविष्णुशिवाननाम् । गुरुभार्गवकर्णा तां सोमसूर्याग्निलोचनाम् ॥१२९॥ इडापिंगलिकासूक्ष्मावायुनासापुटान्विताम् । संध्याद्विजोष्ठपुटितां लसद्वागुपजिव्हिकाम् ॥१३०॥ संध्यासूर्यमणिग्रीवां मरुद्वाहसमन्वितान् । पर्जन्यहृदयासक्तां वस्वाख्यप्रतिमंडलाम् ॥१३१॥ आकाशोदरविश्रांतां नाभ्यवांतरवीथिकाम् । प्रजापत्याख्यजघनां कटींद्राणीसमाश्रिताम् ॥१३२॥ ऊर्वोर्मलयमेरुभ्यां शोभमानां सरिद्वराम् । सुजानुजह्वू कुशिकां वैश्वदेवाह्वयसंज्ञिकाम् ॥१३३॥ ब्राह्मी आदि शक्तियों की अर्चना कर उषा आदि सहित आदित्य आदि देवों का क्रमशः पूजन करे। तदनन्तर छह अंगों की पूजा कर नागकेसर पुष्पों के ऊपर प्रह्लादिनी, प्रभा, नित्या, विश्वंभरा, विलासिनी, प्रभावती, जया, शान्ता, कांति, दुर्गा, सरस्वती, विद्यारूपा, विशाला, ईशा, व्यापिनी, विमला, तमोपहारिणी, सूक्ष्मा, विश्वयोनि जयावहा, पद्मालया, परा शोभा, ब्रह्मरूपा और शारणा का पूजन करे ॥११६-१२२॥ तत्पश्चात् ग्रहों और आयुधों सहित इन्द्र आदि देवताओं की आराधना करे। इस प्रकार दश आवरणों से देवियों की पूजा करे। आठ लाख मंत्र का जप करे और उतने ही हजार तिल से हवन करे। ऐसा करनेवाला व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त होकर दीर्घायु होता है। तदनन्तर मधु मिलाकर तीन लाल कमलों से होम करना चाहिए। ऐसा करने से वह छह मास के भीतर ही महाधनवान् हो जाता है, इसमें संशय नहीं। ब्रह्मतेज के लिए ब्रह्मवृक्ष के पुष्पों से हवन करना चाहिए। मुने ! अधिक क्या कहूँ। विधिपूर्वक देवी की आराधना करने से साधक को कामधेनु की तरह विद्या- रूपिणी देवी सबकुछ प्रदान करती हैं ॥१२३-१२८॥ अब मैं मनुष्यों की सब तरह से रक्षा करने वाले सावित्री- पंजर नामक अत्यन्त अद्भुत रहस्य को बतलाता हूँ। साधक भगवती के इस रूप का ध्यान करे कि, आकाश उनका केश पाश है, वे सुन्दर मुकुट से शोभायमान हो रही हैं, मेघ उनकी कुटिल भ्रूकुटि है, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव उनके मुख हैं, वृहस्पति एवम् शुक्र उनके कान हैं, सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि उनके नेत्र हैं, इड़ा और पिंगला उनके नासिकापुट है, संध्या अधर एवम् ओष्ठ है, जिह्वा पर वाणी विराजमान रहती है, संध्या-कालीन सूर्य उनकी मणिग्रीवा है, वायु बाहें है, बादल हृदय है, वसुगण मंडल है, आकाश उदर है, नाभि के ऊपर रोमावलि रमणीय है, प्रजापति उनका जघन है, इंद्राणी कमर है, मलयाचल एवम् सुमेरु पर्वत उनके ऊरु हैं, वे बहुत कम- नीय हैं, सरिताओं में श्रेष्ठ है, जाह्नवी एवम् कौशिकी उनके घुटने हैं, वैश्वदेवी उनकी संज्ञा है, पृथ्वी, पर्वत तथा
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६७ पादांघ्रिनखलोमाद्यभूनाद्रुम लक्षिताम् । ग्रहराश्यर्क्षयोगादिमूर्तावयवसंज्ञिकाम् ॥१३४॥ तिथिमासतुं पक्षाद्यैः संकेतनिमिषात्मिकाम् । मायाकल्पितवैचित्र्यसंध्याद्यच्छदनावृताम् ॥१३५॥ ज्वलत्कालानलप्रख्यां तडित्कोटिसमप्रभाम् । कोटिसूर्यप्रतीकाशां शशिकोटिसुशीतलाम् ॥१३६॥ सुधामंडलमध्यस्थां सांद्रानंदामृतात्मिकाम् । वागतीतां मनोऽगम्यां वरदां वेदमातरम् ॥१३७॥ चराचरमयीं नित्यां ब्रह्माक्षरसमन्विताम् । ध्यात्वा स्वात्मविभेदेन सावित्रीपंजरं न्यसेत् ॥१३८॥ पञ्जरस्य ऋषिः सोऽहं छंदो विकृतिरुच्यते । देवता च परो हंसः परब्रह्मादिदेवता ॥१३८॥ धर्मार्थकाममोक्षाप्त्यै विनियोग उदाहृतः । षडंगदेवतामन्त्रैरंगन्यासं समाचरेत् ॥१४०॥ विधामूलेन मेधावी व्यापकं हि समाचरेत् । पूर्वोक्तां देवतां ध्यायेत्साकारां गुणसंयुताम् ॥१४१॥ त्रिपदा हरिजा पूर्वमुखी ब्रह्मास्त्रसंज्ञिका । चतुर्विंशतितत्त्वाढ्या पातु प्राचीं दिशं मम ॥१४२॥ चतुष्पदा ब्रह्मदंडा ब्रह्माणी दक्षिणानना । षड्विंशतत्तत्त्वसंयुक्ता पातु मे दक्षिणां दिशम् ॥१४३॥ प्रत्यङ्मुखी पञ्चपदी पञ्चाशत्तत्त्वरूपिणी । पातु प्रतीचीमनिशं मम ब्रह्मशिरोंकिता ॥१४४॥ सौम्यासborder ब्रह्मा तुर्याढ्या साथर्वांगिरसात्मिका । उदीचीं षट्पदा पातु षष्टितत्त्वकलात्मिका ॥१४५॥ पञ्चाशद्वर्णरचिता नवपादा शताक्षरी । व्योमा संपातु मे वोर्ध्वं शिरो वेदांतसंस्थिता ॥१४६॥ विद्युन्निभा ब्रह्मसन्ध्या मृगारूढा चतुर्भुजा । चापेषुचर्मासिधरा पातु मे पावकीं दिशम् ॥१४७॥ ब्राह्मी कुमारी गायत्री रक्तांगी हंसवाहिनी । बिभ्रत्कमण्डलु चाक्षं स्रुवस्त्रुवौ पातु नैर्ऋतिम् ॥१४८॥
वृक्ष उनके चरण, नख एवम् लोम हैं, ग्रह, राशि, नक्षत्र तथा योग उनके अवयव हैं ॥१२६-१३४॥ तिथि, मास, ऋतु, पक्ष, क्षण और निमेष से वे युक्त हैं, अपनी माया से वे अनेक विचित्रताओं की कल्पना करती हैं, संध्या- रूपो आवरण से उनका शरीर ढंका हुआ है, जाज्वल्यमान कालाग्नि की तरह उनके शरीर में तेज विद्यमान है कोटि विद्युल्लताओं के समान उनकी कान्ति है । कोटि सूर्य के समान उनका स्वरूप हैं, कोटि चंद्रमा के तुल्य वे शीतल हैं, सुधामंडल के मध्य में वे रहती हैं, पूर्ण आनन्दरूपी अमृत का पान करती हैं, वाणी से परे हैं, मनसा गम्य हैं, वरदायिका एवम् वेदमाता हैं, चराचरमयी हैं, नित्या हैं, उन्हें ब्रह्माक्षर कहते हैं । इस प्रकार अनन्यमन से उनका ध्यान कर सावित्री पंजर (मंत्र) का न्यास करे । पंजर के ऋषि सोहम् है, छंद विकृति है, देवता परमहंस हैं और आदि देवता परब्रह्म हैं ॥१३५-१३८॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिये इसका विनियोग किया जाता है । षडंगदेवता के मंत्रो से अंगन्यास करे । विद्वान् ब्यक्ति मूलमंत्र से पूजा करे । पूर्वोक्त देवता का ध्यान साकार रूप में करना चाहिए, जो त्रिगुणमयी हो, तीन चरणवालो, विष्णु से उत्पन्न होने वाली, पूरब की ओर मुखवाली, ब्रह्मास्त्र संज्ञा वाली और चौबीस तत्त्वों से सम्पन्न भगवती पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करे । चार चरणवाली, ब्रह्मदंड कहलाने वाली, दक्षिण की ओर मुखवाली और छब्बीस तत्त्वों से युक्त ब्रह्माणी दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करे । पांच पद वालो, पश्चिम की ओर मुखवाली, और ब्रह्मशिर धारण करने वाली देवी सदा पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करे ॥१४०-१४४॥ उत्तर की ओर मुख वाली, छह पैर वाली, तुरीय ब्रह्म से युक्त अंगिरस अयवं वेद तथा साठ तत्त्वों से सम्पन्न देवी उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करे । पचास वर्णों से निर्मित, नौ चरण एवम् सौ अक्षरों से युक्त तथा वेदान्त निष्ठा ब्योमा देवी मेरे ऊर्ध्व भाग-शिर की रक्षा करे । विद्युत् की तरह आभा वालो, मृग पर आरूढ, चतुर्भुज, धनुष, बाण, कवच तथा खड्ग धारण करने वाली ब्रह्मसंध्या देवी अग्नि कोण में मेरी रक्षा करे । कुमारी, रक्तांगी हंसवाहिनी, कमंडलु
७६८ नारदीयपुराणम्
शुक्लवर्णा च सावित्री युवती वृषवाहना । कपालशूलाक्षस्रग्धारिणी पातु वायवीम् ॥१४८॥ श्यामा सरस्वती वृद्धा वैष्णवी गरुडासना । शंखचक्राभयकरा पातु शैवीं दिशं मम ॥१५०॥ चतुर्भुजा देवमाता गौरांगी सिंहवाहना । वराभयखड्गचर्मभुजा पात्वधरां दिशम् ॥१५१॥ तत्तत्पार्श्वे स्थिताः स्वस्ववाहनायुधभूषणाः । स्वस्वदिक्षु स्थिताः पांतु ग्रहशक्त्यंगसंयुताः ॥१५२॥ मंत्राधिदेवतारूपा मुद्राधिष्ठातृदेवताः । व्यापकत्वेन पांत्वस्मानापादतलमस्तकम् ॥१५३॥ इदं ते कथितं सत्यं सावित्रीपंजरं मया । संध्ययोः प्रत्यहं भक्त्या जपकाले विशेषतः ॥१५४॥ पठनीयं प्रयत्नेन भुक्तिं मुक्तिं समिच्छता । भूतिदा भुवना वाणी महावसुमती मही ॥१५५॥ हिरण्यजननी नन्दा सविसर्गा तपस्विनी । यशस्विनी सती सत्या वेदविच्चिन्मयी शुभा ॥१५६॥ विश्वा तुर्या वरेण्या च निसृणी यमुना भुवा । मोदा देवी वरिष्ठा च धीश्च शांतिमती मही ॥१५७॥ धिषणा योगिनी युक्ता नदी प्रज्ञाप्रचोदनी । दया च यामिनी पद्मा रोहिणी रमणी जया ॥१५८॥ सेनामुखी साममयी बगला दोषवर्जिता । माया प्रज्ञा परा दोग्ध्री मानिनी पोषिणी क्रिया ॥१५९॥ ज्योत्स्ना तीर्थमयी रम्या सौम्यामृतमया तथा । ब्राह्मी हैमी भुजंगी च वशिनी सुंदरी वनी ॥१६०॥ ओंकारहंसिनी सर्वा सुधा सा षड्गुणावती । माया स्वधा रमा तन्वी रिपुघ्नी रक्षणी सती ॥१६१॥ हैमी तारा विधुगतिर्विषघ्नी च वरानना । अमरा तीर्थदा दीक्षा दुर्धर्षा रोगहारिणी ॥१६२॥ नानापापनृशंसघ्नी षट्पदी वज्रिणी रणी । योगिनी विमला सत्या अबला बलदा जया ॥१६३॥ गोमती जाह्नवी रज्वी तपनी जातवेदसा । अचिरा वृष्टिदा ज्ञेया ऋतंतंत्रा ऋतात्मिका ॥१६४॥ सर्वकामदुधा सौम्या भवाहंकारवर्जिता । द्विपदा या चतुष्पदा त्रिपदा या च षट्पदा ॥१६५॥
रुद्राक्षमाला, सुक्र तथा स्रुवा धारण करने वाली ब्राह्मी गायत्री नैर्ऋत्य कोण में मेरी रक्षा करे । शुक्लवर्णा, युवती, वृषवाहना, कपाल, त्रिशूल तथा रुद्राक्ष माला धारण करने वाली सावित्री वायव्य कोण में मेरी रक्षा करे ॥१४५-१४८॥ श्यामा, वृद्धा वैष्णवी, गरुडासना तथा शंख, चक्र एवम् अभयास्त्र धारण करने वाली सरस्वती देवी ईशान कोण में मेरी रक्षा करे । चतुर्भुजा गौरांगी, सिंहवाहना तथा अभयास्त्र, खड्ग एवम् कवच धारण करने वालो देव माता अधर दिशा में मेरी रक्षा करे । उन देवियों की बगल में रहने वाली तत्तत् देवियों, जो अपने अपने वाहन अस्त्र तथा आभूषणों से भूषित एवम् ग्रह, शक्ति और अंगों से युक्त हैं, अपनी अपनी दिशा में मेरी रक्षा करें । मंत्र एवम् मुद्रा की अधिष्ठात्री देवियाँ व्यापक रूप से मेरे मस्तक से लेकर चरण तक की रक्षा करे ॥१५०-१५३॥ इस सत्य सावित्री पंजर को मैंने तुमसे बता दिया । भुक्ति-मुक्ति के इच्छुक व्यक्ति प्रत्येक दिन दोनों संध्या विशेष करके जप काल में इसका पाठ अवश्य करे । भूतिदा, भुवना, वाणी, महावसुमती, मही, हिरण्यजननी, नंदा, सविसर्गा, तपस्विनी, यशस्विनी, सती, सत्या, वेदवित्, चिन्मयी, शुभा, विश्वास, तुर्या, वरेण्या, निसृणी, यमुना, भुवा, मोदा, देवी, वरिष्ठा, धी, शान्ति, मति, मही, धिषणा, योगिनी, नदी, प्रज्ञा, प्रचोदिनी, दया, यामिनी, पद्मा, रोहिणी, रमणी, जया, सेनामुखी, साममयी, बगला, दोषवर्जिता, माया, प्रज्ञा, परा, दोग्धी, मानिनी, पोषिणी, क्रिया, ज्योत्स्ना, तीर्थमयी, रम्या, सौम्या, अमृतमया, ब्राह्मी, हैमी, भुजंगी, वशिनी, सुन्दरी, वनी, ओंकारहंसिनी, सर्वा, सुधा, षड्गुणावती, माया, स्वधा, रमा, तन्वी, रिपुघ्नी, रक्षणी, सती, हैमी, तारा, विधुगति, विषघ्नी वरानना, अमरा, तीर्थदा, दीक्षा, दुर्धर्षा, रोगहारिणी, नानापापनृशंसघ्नी, षट्पदी, वज्रि, रजी, योगिनी, विमला, अबला, सत्या, बलदा, जया, गोमती, जाह्नवी, रज्वी, तपनी, जातवेदसा, अचिरा, वृष्टिदा, ज्ञेया, ऋततंत्रा, ऋतात्मिका, सर्वकामदुधा, सौम्या, भवाहंकारवर्जिता, द्विपदा, चतुष्पदा, त्रिपदा, षट्पदा, अष्टपदी, नवपदी सहस्राक्षा,