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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 776, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 776

द्व्यशीतितमोऽध्यायः ७५७ कृष्णादृष्टित्रुटियुगा दृष्टिपक्ष्मविनिंदिनी । कंदर्पजननी मुख्या वैकुण्ठगतिदायिनी ॥२०७॥ रासभावा प्रियाश्लिष्टा प्रेष्ठा प्रथमनायिका । शुद्धा सुधादेहिनी च श्रीरामा रसमञ्जरी ॥२०८॥ सुप्रभावा शुभाचारा स्वर्णदी नर्मदांबिका । गोमती चंद्रभागेड्या सरयूस्ताम्रपर्णिसूः ॥२०६॥ निष्कलंकाचरित्रा च निर्गुणा च निरंजना । एतन्नामसहस्रं तु युगल रूपस्य नारद ॥२१०॥ पठनीयं प्रयत्नेन वृन्दावनरसावहे । महापापप्रशमनं वंध्यात्वविनिवर्तकम् ॥२११॥ दारिद्र्यशमनं रोगनाशनं कामदं महत् । पापापहं वैरिहरं राधामाधवभक्तिदम् ॥२१२॥ नमस्तस्मै भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे । राधासंगसुधा सिंधौ नमोनित्यविहारिणे ॥२१३॥ राधादेवी जगत्कर्त्री जगत्पालनतत्परा । जगल्लयविधात्री च सर्वेशी सर्वसूतिका ॥२१४॥ तस्या नामसहस्रं वै मया प्रोक्तं मुनीश्वर । भुक्तिमुक्तिप्रदं दिव्यं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥२१५॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे राधाकृष्णसहस्रनामकथनं नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥८२॥ करने वालो, महारास वाली, सुन्दर नेत्र वाली, दृष्टि दोष को मिटाने वाली, कंदर्पजननी, मुख्या, वैकुण्ठ-गति- दायिका, रासभावा, प्रियतम का आलिंगन करने वाली, अत्यन्त प्रियपात्र, प्रथम नायिका, शुद्धा, सुधादेह वाली, श्रीरामा, रसमंजरी, महाप्रभावशालिनी, पवित्र आचरण वाली, गंगा तथा नर्मदा की जननी, गोमती और चन्द्रभागा के द्वारा स्तुत्य, सरयू तथा ताम्रपर्णी नदी को प्रकट करने वाली; निष्कलंकचरित्रा, गुणातीत और निर्मलस्वरूपा ॥२०६-२०९॥ नारद ! युगल रूप (राधा-कृष्ण के) ये सहस्र नाम हैं। वृन्दावन में यत्नपूर्वक इन नामों का पाठ करना चाहिये । ये सहस्र नाम महापापनाशन, वंध्यात्वमोचन, दारिद्र्यभंजक, रोगनाशक, कामदायक, पापहारी, शत्रुताध्वंसक और राधा-कृष्ण की भक्ति देने वाले हैं। अकुंठित मेधा वाले भगवान् कृष्ण को नमस्कार है। राधा-संग रूपी सुधासिंधु में नित्य विहार करने वाले माधव को नमस्कार है । मुनीश्वर ! राधादेवी जगत्कर्त्री, विश्व के पालन में निरत रहने वाली, संसार का ध्वंस करने वाली, सब की ईश्वरी और सब की माता हैं। उनके सहस्र नामों को मैंने बता दिया, जो दिव्य एवम् भुक्तिमुक्तिदायक हैं। इसके बाद क्या सुनना चाहते हो ? २१०-२१५॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में राधाकृष्णसहस्रनामकथन नामक बयासीवां अध्याय समाप्त ॥८२॥