बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 782, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६३ सा शिवाज्ञामनुप्राप्य दिव्यलोकं विनिर्ममे । देवीलोकेति विख्यातं सर्वलोकविलक्षणम् ॥७१॥ तत्र स्थिता जगन्माता तपोनियममास्थिता । विविधान् स्वावतारान्हि त्रिकाले कुरुतेऽनिशम् ॥७२॥ मायाधिका ह्लादिनीयुक् चंद्राढ्या सर्गिणी पुनः । प्रतिष्ठा स्मृतिसंयुक्ता क्षुधया सहिता पुनः ॥७३॥ ज्ञानासृता वह्निजायांतस्ताराद्यो मनुर्मतः । ऋषिः स्याद्वामदेवोऽस्य छंदो गायत्रमीरितम् ॥७४॥ देवता जगतामादिर्दुर्गा दुर्गतिनाशिनी । ताराद्यैकेकवर्णेन हृदयादित्रयं मतम् ॥७५॥ विभिर्वर्मक्षणं द्वाभ्यां सर्वैरस्त्रमुदीरितम् । महामरकतप्रख्यां सहस्रभुजमंडिताम् ॥७६॥ नानास्त्राणि दधतीं त्रिनेत्रां शशिशेखराम् । कंकणांगदहाराढ्यां क्वणन्नूपुरकान्विताम् ॥७७॥ किरीटकुंडलंघरां दुर्गा देवीं विचितयेत् । वसुलक्षं जपेन्मंत्रं तिलैः समधुरैहुनेत् ॥७८॥ पयोऽध्रसा वा सहस्रं नवपद्मात्मके यजेत् । ॥७६॥ प्रभा माया जया सूक्ष्मा विशुद्धानंदिनी पुनः । सुप्रभा विजया सर्वसिद्धिदा पीठशक्तयः ॥८०॥ अद्भिर्मह्रस्वत्रयक्लीबरहितैः पूजयेदिमाः । प्रणवो वज्रनखदंष्ट्रायुधाय महापदात् ॥८१॥ सिंहाय वर्मास्त्रं हृच्च प्रोक्तः सिंहमनुर्मुने । दद्यादासनमेतेन मूत्ति मूलेन कल्पयेत् ॥८२॥ अङ्गावृत्ति पुराभ्यर्च्य शक्तीः पत्रेषु पूजयेत् । जया च विजया कीर्तिः प्रीतिः पश्चात्प्रभा पुनः ॥८३॥ श्रद्धा मेधा श्रुतिश्चैव स्वनामाद्याक्षरादिकाः । पत्राग्रेष्वर्चयेदष्टावायुधानि यथाक्रमात् ॥८४॥ शंखचक्रगदाखड्गपाशांकुशशरांधनुः । लोकेश्वरांस्ततो बाह्ये तेषामस्त्राण्यनंतरम् ॥८५॥ इत्थं जपादिसिमंत्त्री मंत्रे सिद्धे विधानवित् । कुर्यात्प्रयोगानमुना यथा स्वस्वमनीषितम् ॥८६॥ नहीं । द्विजश्रेष्ठ ! जो सती दुर्गा शिवलोक में गईं, उन्होंने शंकर की आज्ञा से दिव्यलोक की सृष्टि की। वह देवीलोक के नाम से प्रसिद्ध है, जो अखिल लोकों से उत्तम है। वहां तप एवम् नियम में अवस्थित जगन्माता तीनों काल निरवच्छिन्न रूप से अपने विविध अवतारों का संपादन करती रहती हैं, माया, ह्लादिनी, चंद्राख्या, सर्गिणी, प्रतिष्ठा, स्मृति, क्षुधा तथा अन्त में स्वाहा और आदि में ओं--यहो मन्त्र बताया गया है। इस मन्त्र के ऋषि वामदेव, छन्द गायत्री और देवता भयंकर पीड़ा का नाश करने वाली जगन्माता दुर्गा है। ओं आदि मन्त्रों के एक-एक वर्ण से हृदय आदि तीन चीजें बताई जाती हैं। तीन अक्षरों से नेत्र और दो अक्षरों से सम्पूर्ण अस्त्र कहे गये हैं। महामरकतमणि के समान कान्ति वाली, सहस्र भुजाओं से अलंकृत, अनेक शस्त्रों को धारण करने वाली, तीन चक्षु वाली, ललाट पर चन्द्र धारण करने वाली, कंगन केयूर तथा हार से विभूषित, शब्दधायमान नूपुर से युक्त ओर मुकुट तथा कुंडल धारण करने वालो दुर्गा देवी का ध्यान करे । तदनन्तर मन्त्र का आठ लाख जप करके मधुर सहित तिल से हवन करे। अथवा खीर से नवपद्मात्मक पीठ पर सहस्रबार हवन करे। प्रभा, माया, जया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, आनंदिनी, सुप्रभा, विजया तथा सर्वसिद्धिदा ये नौ पीठशक्तियां हैं ॥६९-८०॥ तीन ह्रस्व तथा क्लीबरहित जल से इन शक्तियों का पूजन करे। मुने! महा- पद से लेकर वज्र, नख, दंष्ट्रा तथा आयुध तक के लिये प्रणव और सिंह के लिये वर्मास्त्र एवम् हृदय कहा गया है। यही सिंह-मंत्र है। इस मंत्र से आसन प्रदान कर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे। पहिले अंगावृत्ति का पूजन कर पत्रों पर शक्तियों की अर्चना करे। जया, विजया, कीर्ति, प्रीति, प्रभा, श्रद्धा, मेधा तथा श्रुति अपने नाम के आद्य अक्षर और शंख, चक्र, गदा, खड्ग, पाश, अंकुश, बाण एवम् धनुष का क्रमशः पूजन करे। तदनन्तर लोकपाल तथा उनके अस्त्रों की पूजा करे विधानवेत्ता मन्त्री इस प्रकार जप आदि से मंत्र को सिद्ध कर अपनी अभीप्सित वस्तु के लिये उस मन्त्र का प्रयोग करे । ॥८१-८६॥ विधिपूर्वक नौ सुन्दर कलशों की