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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 783, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 783

७६४ नारदीयपुराणम् प्रतिष्ठाप्य विधानेन कलशान्नवशोभनान् । रत्नहेमादिसंयुक्तान्घटेषु नवसु स्थितान् ॥८७॥ मध्यस्थे पूजयेद्देवीमितरेषु जयादिकाः । संपूज्य गन्धपुष्पाद्यैरभिषिञ्चेन्नराधिपम् ॥८८॥ राजा विजयते शत्रूञ्जयोऽधिको विजयश्रियम् । प्राप्नोत्यरोगो दीर्घायुः सर्वव्याधिविवर्जितः ॥८९॥ वन्ध्याभिषिक्ता विधिना लभते तनयं वरम् । मन्त्रेणानेन संजप्तमाज्यं क्षुद्रग्रहापहम् ॥९०॥ गर्भिणीनां विशेषेण जप्तं भस्मादिकं तथा । जृम्भश्वासे तु कृष्णस्य प्रविष्टे राधिकामुखम् ॥९१॥ या तु देवी समुद्भूता वीणापुस्तकधारिणी । तस्या विधानं विप्रेंद्र शृणु लोकोपकारकम् ॥९२॥ प्रणवो वाग्भवं माया श्रीः कामः शक्तिरीरिता । सरस्वती चतुर्थ्यंता स्वाहांतो द्वादशाक्षरः ॥९३॥ मनुर्नारायण ऋषिविराट् छन्दः समोरितम् । महासरस्वती चास्य देवता परिकीर्तिता ॥९४॥ वाग्भवेन षडङ्गानि कृत्वा वर्णान्न्यसेद् बुधः । ब्रह्मरंध्रे न्यसेत्तारं लज्जां भ्रूमध्यगां न्यसेत् ॥९५॥ मुखनासिकादिकर्णेषु गुदेषु श्रीमुखार्णकान् । ततो वाग्देवतां ध्यायेद्वीणापुस्तकधारिणीम् ॥९६॥ कर्पूरकुन्दधवलां पूर्णचंद्रोज्ज्वलाननाम् । हंसाधिरूढां भालेन्दुदिव्यालंकारशोभिताम् ॥९७॥ जपेद्द्वादशलक्षाणि ततसहस्रं सितांबुजैः । नागचंपकपुष्पैर्वा जुहुयात्साधकोत्तमः ॥९८॥ मातृकोक्ते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणक्रमेण ताम् । वर्णाब्जेनासनं दद्यान्मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ॥९९॥ देव्या दक्षिणतः पूज्या संस्कृता वाङ्मयी शुभा । प्राकृता वामतः पूज्या वाङ्मयो सर्वसिद्धिदा ॥१००॥ पूर्वमंगानि षट्कोणे प्रजाद्याः पूजयेद्बहिः । प्रज्ञा मेधा श्रुतिः शक्तिः स्मृतिर्वागीश्वरी मतिः ॥१०१॥ स्वस्तिश्चेति समाख्याता ब्रह्माद्यास्तदनंतरम् । लोकेशानर्चयेद्भूयस्तदस्त्राणि च तद्बहिः ॥१०२॥

स्थापना करे, जो रत्न, सुवर्ण आदि से युक्त हों। बीच के कलश पर देवी की और इतर कलशों पर जया आदिकों की गंध, पुष्प आदि से अर्चना कर उस जल से राजा का अभिषेक करे। अभिषिक्त राजा शत्रुओं के ऊपर विजय, विजयलक्ष्मी, आरोग्य और दीर्घायु को प्राप्त करता है। वंध्या स्त्री विधिवूर्वक अभिषिक्त होने पर उत्तम पुत्र को प्राप्त करती है। घी को इस मन्त्र से अभिमंत्रित कर देने पर वह घी क्षुद्र ग्रहों का नाशक हो जाता है। उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित भस्म आदि गर्भिणियों के लिये विशेष लाभदायक है। विप्रेन्द्र ! कृष्ण की जंभाई राधिका के मुख में प्रविष्ट होने पर जो वीणा पुस्तक धारिणी देवी उत्पन्न हुई थीं उनके लोकोपकारक विधान को सुनो। उनके द्वादशाक्षर मन्त्र के अन्त में स्वाहा है और मंत्र के अन्तर्गत प्रणव, वाग्भव, माया, श्री, काम, शक्ति तथा सरस्वती हैं। मंत्र के ऋषि नारायण, छंद विराट् और देवता सरस्वती हैं ॥८७-९४॥ बुधजन वाग्भव मन्त्र से षडंगन्यास करके वर्णन्यास करे। ब्रह्मरंध्र में ओंका, भौं के मध्य में लज्जा का और मुख, नासिका, कर्ण एवम् गुदा में श्रीमुखवर्णों का न्यास करे। तदुपरान्त उत्तम साधक वीणा और पुस्तक धारण करने वाली, कर्पूर तथा कुन्दपुष्प के समान शुभ्र वर्ण वाली, पूर्णचंद्र के सदृश मुख वाली, हंस पर आरूढ और चंद्ररूप दिव्य अलंकार से सुशोभित ललाट वाली वाग्देवता (सरस्वती) का ध्यान कर बारह लाख मंत्र का जप करे। फिर उसका दशांश श्वेतकमल या नागचंपा से हवन करे ॥९५-९८॥ तत्पश्चात् मातृकापीठ पर वक्ष्यमाण क्रम से उनकी अर्चना करे। मूल से मूर्ति की कल्पना कर कमल का आसन प्रदान करे। देवी के दक्षिण भाग में पवित्र संस्कृत वाङ्मय देवी की पूजा करे और वामभाग में समस्त सिद्धियों को देने वाली प्राकृत वाङ्मयी देवी की आराधना करे। पहले षट्कोण में छह अंगों का पूजन कर बाद में ब्रह्मा, प्रज्ञा, मेधा, श्रुति, शक्ति, स्मृति, वागीश्वरी, मूर्ति तथा स्वस्ति का पूजन करे। तदनन्तर लोकपाल और उनके अस्त्रों की पूजा करनी चाहिए ॥९९-१०२॥