बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७६२ नारदीयपुराणम् अत्रावाह्य च मूलेन मूर्ति संकल्प्य साधकः । षट्कोणेषु षडंगानि दक्षिणे तु गजाननम् ॥५६॥ वामे कुसुमधन्वानं वसूपत्रे ततो यजेत् । उमां श्रीं भारतीं दुर्गां धरणीं वेदमातरम् ॥५७॥ देवीमुषां च पूर्वाद्रौ दिग्विंदिक्षु क्रमेण हि । जह्ननुसूर्यसुते पूज्ये पादप्रक्षालनोद्यते ॥५८॥ शंखपद्मनिधी पूज्यौ पार्श्वयोर्धृतचामरौ । धृतातपत्रं वरुणं पूजयेत्पश्चिमे ततः ॥५९॥ संपूज्य राशीन्परितो यथास्थानं नवग्रहान् । चतुर्दन्तैरावतादीन् दिग्विंदिक्षु ततोऽर्चयेत् ॥६०॥ तद्वबहिर्लोकपालांश्च तदस्त्राणि च तद्बहिः । दूर्वाभिराराज्यसिक्ताभिर्जुहुयादायुषे नरः ॥६१॥ गुडूचीमाज्यसंसिक्तां जुहुयात्सप्तवासरम् । अष्टोत्तरसहस्रं यः स जीवेच्छरदां शतम् ॥६२॥ हुत्वा तिलान्घृताभ्यक्तान्दोर्घमायुष्यमाप्नुयात् । आरभ्यार्कदिनं मंत्री दशाहं घृतसंप्लुतः ॥६३॥ जुहुयादर्कसमिधः शरीरारोग्यसिद्धये । शालिभिर्जुहुतो नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम् ॥६४॥ अचिरादेव महती लक्ष्मी संजायते ध्रुवम् । उषाजाजीनालिकेररजोभिघृतमिश्रितैः ॥६५॥ हुनेदष्टोत्तरशतं पायसाशी तु नित्यशः । मण्डलाज्जायते सोऽपि कुबेर इव मानवः ॥६६॥ हविषा गुडमिश्रेण होमतो ह्यन्नवान्भवेत् । जपापुष्पाणि जुहुयादष्टोत्तरसहस्रकम् ॥६७॥ तांबूलरसमिश्रं तद्भस्मतिलकं चरेत् । चतुर्णामपि वर्णानां मोहनाय द्विजोत्तमः ॥६८॥ एवं यो भजते लक्ष्मीं साधकेन्द्रो मुनीश्वर । सम्पदस्तस्य जायंते महालक्ष्मीः प्रसीदति ॥६९॥ देहांते वैष्णवं धाम लभते नात्र संशयः । या तु दुर्गा द्विजश्रेष्ठ शिवलोकं गता सती ॥७०॥ तथा ऋद्धि—ये नौ शक्तियां हैं। साधक को चाहिये कि वह उस पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति का आवाहन कर संकल्प करे। पश्चात् छह कोणों में छह अंगों का, दक्षिण दिशा में गणेश का और उत्तर दिशा में कन्दर्प का पूजन करे। पूजन अगस्त वृक्ष के पत्र पर होना चाहिये । तदनन्तर पूर्व आदि में उमा, श्रीं, भारती, दुर्गा, धरणी, वेदमाता, देवी तथा उषा की पूजा करनी चाहिये । (महालक्ष्मी के) चरण पखारने के लिये उद्यत गंगा यमुना का पूजन करना चाहिये। दोनों बगल में चामर धारण करने वालो शंखनिधि तथा पद्मनिधि की अर्चना करे। पश्चिम में छत्र धारण किये हुए वरुण का पूजन करे । फिर यथास्थान नवग्रहों का पूजन करे। दिशा-विदिशाओं में चतुर्दन्त ऐरावत आदि हस्तिर्यों का पूजन करे । ५५-६०॥ तदनन्तर लोकपालों का और फिर उनके अस्त्रों का पूजन कर घृतसिक्त दूर्वा से आयु के लिये हवन करे। जो मनुष्य सात दिन घृताक्त गुडूची (गुरूच) से एक हजार आठ बार हवन करता है, वह सौ वर्षों तक जीता है। घृतयुक्त तिल से हवन करने वाला व्यक्ति दीर्घायु होता है। जो साधक रवि दिन से प्रारम्भ कर दश दिनों तक घृतयुक्त आक की लकड़ी से होम करता है, वह शरीर से नीरोग होता है। जो व्यक्ति नित्य एक हजार आठ बार चावल से होम करता है, उसे अल्प काल में ही महती लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। जो मानव नित्य खीर भोजन करता है तथा उषाकाल में नारियल एवम् घी से अष्टोत्तरशत हवन करता है, वह शीघ्र ही कुबेर तुल्य हो जाता है ॥६१-६६॥ गुडमिश्रित घी से होम करने से अन्न की प्राप्ति होती है। जो द्विजवर चारों वर्णों को मोहित करना चाहता है, वह जपापुष्प से अष्टोत्तर सहस्र हवन करे और उसके भस्म में ताम्बूल का रस मिला कर तिलक लगाये ॥६७-६८॥ मुनीश्वर ! इस प्रकार जो साधक लक्ष्मी की आराधना करता है, उसे सकल संपत्तियों की प्राप्ति होती है, उसके ऊपर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वह देहावसान होने पर वैकुंठ को जाता है, इसमें संशय