सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 780, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 780

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६१ ध्यात्वा पुष्पांजलिं क्षिप्त्वा पूजयेदुपचारकैः । लक्षषट्कं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं हुनेत्तिलैः ॥४०॥ आज्याक्तैर्मातृकापीठे पूजा चावरणेः सह । षट्कोणेषु षडंगानि तद्बाह्येऽष्टदले यजेत् ॥४१॥ मालावतीं माधवीं च रत्नमालां सुशीलिकाम् । ततः शशिकलां पारिजातां पद्मावतीं तथा ॥४२॥ सुन्दरीं च क्रमात्प्राच्यां दिग्विदिक्षु ततो बहिः । इन्द्राद्यान्सायुधानिष्ट्वा विनियोगांस्तु साधयेत् ॥४३॥ राधा कृष्णप्रिया रासेश्वरी गोपीगणाधिपा । निर्गुणा कृष्णपूज्या च मूलप्रकृतिरीश्वरी ॥४४॥ सर्वेश्वरी सर्वपूज्या वैराजजननी तथा । पूर्वाद्याशासु रक्षतु पांतु मां सर्वतः सदा ॥४५॥ त्वं देवि जगतां माता विष्णुमाया सनातनी । कृष्णमायादिदेवी च कृष्णप्राणाधिके शुभे ॥४६॥ कृष्णभक्तिप्रदे राधे नमस्ते मंगलप्रदे । इति सम्प्रार्थ्य सर्वेशों स्तुत्वा हृदि विसर्जयेत् ॥४७॥ एवं यो भजते राधां सर्वाद्यां सर्वमंगलाम् । भुक्त्वेह भोगानखिलांन्सोऽन्ते गोलोकमाप्नुयात् ॥४८॥ अथ तुभ्यं महालक्ष्म्‍या विधानं वच्मि नारद । यदाराधनतो भूयात्साधको भुक्तिमुक्तिमान् ॥४९॥ लक्ष्मीमायाकामवाणीपूर्वा कमलवासिनी । ङेता वह्निप्रियांतोऽयं मंत्रकल्पद्रुमः परः ॥५०॥ ऋषिर्नारायणश्चास्य छन्दो हि जगती तथा । देवता तु महालक्ष्मीर्द्विद्विवर्णैः षडंगकम् ॥५१॥ श्वेतचंपकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् । ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां भक्तानुकम्पकातरामू ॥५२॥ बिभ्रतीं रत्नमालां च कोटिचन्द्रसमप्रभाम् । ध्यात्वा जपेदर्कलक्षं पायसेन दशांशतः ॥५३॥ जुहुयादेधिते वह्नौ श्रीद्रुकाष्ठैः समर्चयेत् । नवशक्तियुते पीठे ह्यंगैरावरणैः सह ॥५४॥ विभूतिरुन्नतिः कांतिः सृष्टिः कीर्तिश्च सन्नतिः । व्युष्टिरुत्कृष्टिश्च ऋद्धिश्च संप्रोक्ता नव शक्तयः ॥५५॥ छः लाख मंत्र का जप करके घृतयुक्त तिलसे उसका दशांश हवन करे ॥३२-४०॥ मातृकापीठ पर पूजन करना चाहिये । वहां वस्त्र का आवरण (चंदवा) लगाना चाहिये । छः कानों में अष्टदल कमल का निर्माण कर छः अंगों का पूजन करे । पूर्व दिशा में क्रमशः मालावती, माधवी, रत्नमाला, सुशीलिंका, शशिकला, पारिजाता, पद्मावती तथा सुन्दरी की पूजा करे । तदपश्चात् दिशा-विदिशाओं में आयुध सहित इन्द्र आदि देवों की अर्चना कर विनियोग का साधन करे । फिर प्रार्थना करे- "राधा, कृष्णप्रिया, रासेश्वरी, गोपियों की स्वामिनी, निर्गुणा, कृष्णपूज्या, मूलप्रकृति, ईश्वरी, सर्वेश्वरी, सर्वपूज्या तथा वैराजजननी पूर्व आदि दिशाओं में सब ओर से सदा मेरी रक्षा करें। देवि ! तुम जगन्माता विष्णु की माया, सनातनी, कृष्ण की माया तथा आदि- देवी हो । कृष्ण की प्राणाधिक प्रिये ! कल्याणि ! कृष्णभक्तिदायिके ! मंगलप्रदे ! राधे ! तुम्हें नमस्कार है ।" इस प्रकार सर्वेश्वरी की स्तुति एवम् प्रार्थना करके हृदय में उसका विसर्जन करे ॥४१-४७॥ जो व्यक्ति इस तरह सब की आदि तथा अखिलकल्याणदायिनी राधा की आराधना करता है, वह इस लोक में सकल भोगों को भोग कर अन्त में गोलोक को प्राप्त करता है । नारद ! अब मैं तुमसे महालक्ष्मी- पूजन का विधान बतला रहा हूँ, जिनकी आराधना करने से साधक भोग-मोक्ष को प्राप्त करता है। "लक्ष्मी- माया.........'स्वाहा" यह मन्त्र कल्पद्रुम से भी परे है । इसके ऋषि नारायण, छन्द जगती और देवता महालक्ष्मी हैं। दो-दो अक्षरों से षडंगन्यास कर श्वेतचम्पा के समान कान्तिवाली, रत्न के आभूषणों से भूषित, किञ्चित् हास्य से प्रसन्न मुखवाली, भक्तों के ऊपर अनुग्रह करने वाली, रत्नमाला को धारण करने वाली और कोटि चन्द्रों के समान प्रभा वाली महालक्ष्मी का ध्यान करे । फिर बारह लाख मन्त्र का जप करके उसका दशांश प्रज्वलित वह्नि में बेल की लकड़ी से हवन करे । हवन तो नौ शक्तियों से युक्त पीठ पर अंग तथा आवरण के साथ होना चाहिये ॥४८-५४॥ विभूति, उन्नति, कांति, सृष्टि, कीर्ति, सन्नति, व्युष्टि, उत्कृष्टि ९६-ना० पृ०