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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 773, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 773

७५४ नारदीयपुराणम् कृष्णप्रबोधनकरी कृष्णशेषान्नभोर्जनी । पद्मकेशरमध्यस्था संगीतागमवेदिनी ॥१६४॥ कोटिकल्पांतभ्रू भंगा अप्राप्तप्रलयाच्युता । सर्वसत्त्वनिधिः पद्मशंखादिनिधिसेविता ॥१६५॥ अणिमादिगुणैश्वर्या देववृन्दविमोहिनी । सर्वानन्दप्रदा सर्वा सुवर्णलतिकाकृतिः ॥१६६॥ कृष्णाभिसारसंकेता मालिनी नृत्यपंडिता । गोपीसिंधुसकाशाढ्या गोपमंडपशोभिनी ॥१६७॥ श्रीकृष्णप्रीतिदा भीता प्रत्यंगपुलकांचिता । श्रीकृष्णालिंगनरता गोविंदविरहाक्षमा ॥१६८॥ अनंतगुणसंपन्ना कृष्णकीर्तनलालसा । बीजत्रयमयी मूर्तिः कृष्णानुग्रहवांञ्छिता ॥१६९॥ विमलादिनिषेव्या च ललिताद्यर्चिता सती । पद्मवृन्दस्थिता हृष्टा त्रिपुरापरिसंविता ॥१७०॥ वृन्तावत्यर्चिता श्रद्धा दुर्ज्ञेया भक्तवल्लभा । दुर्लभासांद्रसौख्यात्मा श्रेयोहेतुः सुभोगदा ॥१७१॥ सारंगा शारदा बोधा सद्बृंदावनचारिणी । ब्रह्मानन्दा चिदानन्दा ध्यानानन्दार्धमात्रिका ॥१७२॥ गंधर्वा सुरतज्ञा च गोविंदप्राणसंगमा । कृष्णांगभूषणा रत्नभूषणा स्वर्णभूषिता ॥१७३॥ श्रीकृष्णहृदयावासमुक्ताकनकालि(सि)का । सद्रत्नकंकणयुता श्रीमन्नीलगिरिस्थिता ॥१७४॥ स्वर्णनूपुरसंपन्ना स्वर्णकिंकिणिमंडिता । अशेषरासकौतुका रंभोरूस्तनुमध्यमा ॥१७५॥ पराकृतिः परानन्दा परस्वर्गविहारिणी । प्रसूनकब्री चित्रा महासिंदूरसुन्दरी ॥१७६॥ कैशोरवयसा बाला प्रमदाकुलशेखरा । कृष्णाधरसुधास्वादा श्यामप्रेमविनोदिनी ॥१७७॥ शिखिपिच्छलसच्चूडा स्वर्णचंपकभूषिता । कुंकुमालक्तकस्तूरीमंडिता चापराजिता ॥१७८॥

वाली, वृन्दावन के कुंजों में विहार करने वाली, कृष्ण को जगाने वाली, कृष्ण से बचे अन्न को खाने वाली, पद्मकेसर के मध्य में रहने वाली, संगीत एवम् आगम शास्त्र को जानने वाली, भ्रूभंग से करोड़ों कल्पों का अन्त कर देने वाली, प्रलय में भी नष्ट न होने वाली, अखिल प्राणियों की निधि, पद्म शंख आदि निधियों से सेवित ॥१६१-१६५॥ अणिमा आदि ऐश्वर्यों से युक्त, देव समूह को मोहित करने वाली, सबको आनन्द देने वाली, स्वर्णलता के समान आकृति वाली, कृष्ण की अभिसारिका, माला धारण करने वाली, नृत्य करने में कुशल, गोपीसमुदायरूपी सिंधु में प्राप्त होने वाली, गोपमंडप को सुशोभित करने वाली, श्रीकृष्ण को प्रीति देने वाली, उनसे डरने वाली, प्रत्यंग में हर्ष से रोमाञ्चित होने वाली, श्रीकृष्ण के आलिंगन में निरत रहने वाली, गोविंद के विरह को न सहने वाली, अनंत गुणों से सम्पन्न, कृष्ण-कीर्तन की लालसा करने वाली, तीनों बीजों की मूर्ति, कृष्ण के अनुग्रह की इच्छा करने वाली, विमला आदि से सेवित, ललिता आदि से अर्चित, सती, कमलराशि पर अवस्थित, हृष्टा, त्रिपुरा से सुसेवित, वृन्तावती से पूजित, श्रद्धा, दुर्ज्ञेया, भक्तवल्लभा, दुर्लभा, अत्यन्त सुखोपभोग करने वाली, कल्याणहेतु, सौभाग्य देने वाली, आभूषणयुक्ता, शारदा, बुद्धिरस्वरूपा, सुन्दर वृन्दावन में विचरण करने वाली, ब्रह्मानन्दा, चिदानंदा, ध्यानानंदा, अर्धमात्रिका, गंधर्वा, सुरतज्ञा, गोविंद की प्राणप्रिया, कृष्ण के अंगों को भूषित करने वाली, रत्नभूषणा, स्वर्णभूषिता, श्रीकृष्ण के हृदय में वास करने वाली, मोती एवम् सोने का आभूषण धारण करने वाली, उत्तम रत्नों के बने कंगन पहनने वाली, रत्नाढ्य नीलगिरि पर रहने वाली, सोने का नूपुर पहनने वाली, सोने की किंकिणियों से आभूषित, महारास के लिए उत्कण्ठित रहने वाली, कदली के समान जंघा वाली ॥१६६--१७५॥ क्षीण कटि वाली, उत्तम आकृति वाली, विशिष्ट आनंद का उपभोग करने वाली, स्वर्ग में अत्यन्त विहार करने वाली, केशपाश (जूड़े) को पुष्पों से सुसज्जित करने वाली, चित्र-विचित्र रूप बनाने वाली, महासिंदूर से सौंदर्य को बढ़ानेवाली, किशोर अवस्था वाली, बाला, ललनाओं की शिरोमुकुट,