बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 772, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्व्यशीतितमोऽध्यायः ७५३ तिलोत्तमा त्रिकालस्था त्रिकालज्ञाप्यधीश्वरी । त्रिवेदज्ञा त्रिलोकज्ञा तृतीयांतनिवासिनो ॥१५०॥ दुर्गराराध्या रमारोध्या विश्वाराध्या चिदात्मिका । देवाराध्या पराराध्या ब्रह्मारोध्या परात्मिका शिवारोध्या प्रेमसाध्या भक्ताराध्या रसात्मिका । कृष्णप्राणार्पिणी भामा शुद्धप्रेमविलासिनी ॥१५२॥ कृष्णाराध्या भक्तिसाध्या भक्तवृन्दनिवेविता । विश्वाधारा कृपाधारा जीवधारातिनायिका ॥१५३॥ शुद्धप्रेममयी लज्जा नित्यसिद्धा शिरोमणिः । दिव्यरूप दिव्यभोगा दिव्यवेषा मुदान्विता ॥१५४॥ दिव्यांगनावृन्दसारा नित्यनूतनयौवना । परब्रह्मावृता ध्येया महारूपा महोज्ज्वला ॥१५५॥ कोटिसूर्यप्रभा कोटिचन्द्रबिम्बाधिकच्छविः । कोमलामृतवागाद्या वेदाद्या वेददुर्लभा ॥१५६॥ कृष्णासक्ता कृष्णभक्ता चन्द्रावलिनिषेविता । कलाषोडशसम्पूर्णा कृष्णदेहार्द्धधारिणी ॥१५७॥ कृष्णबुद्धिः कृष्णसारा कृष्णरूपविहारिणी । कृष्णकान्ता कृष्णधना कृष्णमोहनकारिणी ॥१५८॥ कृष्णदृष्टिः कृष्णगोत्री कृष्णदेवी कुलोद्वहा । सर्वभूतस्थितावात्मा सर्वलोकन मस्कृता ॥१५९॥ कृष्णदात्री प्रेमधात्री स्वर्णगात्री मनोरमा । नगधात्री यशोदात्री महादेवी शुभंकरी ॥१६०॥ श्रीशेषदेवजननी अवतारगणप्रसूः । उत्पलांकारविंदांका प्रसादांका द्वितीयका ॥१६१॥ रथांका कुंजरांका च कुंडलांकपदस्थिता । छत्रांका विद्युदंका च पुष्पमालांकितापि च ॥१६२॥ दंडांका मुकुटांका च पूर्णचन्द्रा शुकांकिता । कृष्णान्नाहारपाका च वृन्दाकुंजविहारिणी ॥१६३॥ लक्ष्मियों के समान सौभाग्यवती, पापरहिता, करोड़ मुक्त जीवों के समान सुख प्राप्त करने वाली, सौम्य स्वभाव वाली, कोटि लक्ष्मी के समान विलास करने वाली, तिलोत्तमा से अधिक सुन्दरी, त्रिकालस्था, त्रिकालज्ञा, ईश्वरी, त्रिवेदज्ञा, त्रिलोकज्ञा, चतुर्थ (नाद) के अन्त में निवास करने वाली, दुर्गा से आराध्य, लक्ष्मी से आराध्य, विश्व से आराध्य, चिदात्मिका, देवाराध्य, पराराध्य, ब्रह्माराराध्य, परात्मिका, शिवाराराध्य, प्रेमसाध्य, भक्ताराध्य, रसात्मिका, कृष्ण को प्राण समर्पण करने वाली, भामा, शुद्ध प्रेम से विलास करने वाली, कृष्ण से आराध्य, भक्ति से साध्य, भक्तवृन्द से सुसेवित, विश्व की आधार, कृपा को आधार, जीवों को आधार, अतिनायिका, शुद्ध- प्रेममयी, लज्जा, नित्यसिद्धा, शिरोमणि, दिव्यरूला, दिव्यभोगा दिव्यवेषा, हर्षयुक्ता, दिव्याँगनाओं में सबसे उत्तम, नित्य नूतन यौवन धारण करनेवाली, परब्रह्म से आवृत, ध्यान करने योग्य, महारूपवाली, अत्यन्त उज्ज्वल, कोटि सूर्य के समान प्रभावानी, करोड़ चन्द्रबिंबों से अधिक छवि वाली, कोमल तथा अमृतोपम वचन बोलने वाली, आद्या, वेदाद्या, वेददुर्लभा, कृष्ण में आसक्त, कृष्णभक्त, चन्द्रावलि से सुसेवित, सोलहों कला से परि- पूर्ण, कृष्ण का अद्धं शरीर धारण करने वाली, कृष्णबुद्धि, कृष्णसारा, कृष्णरूप से विहार करने वाली, कृष्ण- कांता, कृष्णधना, कृष्ण को मोहित करनेवाली, कृष्णदृष्टि, कृष्णगोत्री, कृष्णदेवी, वंश धारण करनेवाली, अखिल प्राणियों में स्थित, आत्मरूपिणी, सर्वलोकवन्द्या, कृष्णरात्री, प्रेमधात्री, स्वर्णगात्री, मनोरमा, नगधात्री, यशोदात्री, महादेवी, शुभंकरी ॥१४७--१६०॥ श्रीशेषदेव की जननी, अवतार-समूह का प्रसव करने वाली, नीलकमल से अंकित, लाल कमल से चिह्नित, प्रसाद गुण से युक्त, अद्वितीय, रथ के चिह्न से युक्त, हाथी के चिह्न से युक्त, कुंडलांकित आसन पर बैठने वाली, छत्रांकित, बिजली का चिह्न धारण करने वाली, पुष्पमाला से अंकित, दंड एवं मुकुट के चिह्न धारण करने वाली, पूर्णचंद्रा, शुक के चिह्न के युक्त, कृष्ण के लिये भोजन बनाने ६५ ना० पु०