बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 771, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें७५२ नारदीयपुराणम् चारुरूपा चारुवक्त्रा चारुहेमांगदा शुभा । श्रीकृष्णवेणुसंगीता मुरलीहारिणी शिवा ॥१३४॥ भद्रा भगवती शांता कुमुदा सुन्दरी प्रिया । कृष्णक्रोडा कृष्णरतिः श्रीकृष्णसहचारिणी ॥१३५॥ वंशीवटप्रियस्थाना युग्मायुग्मस्वरूपिणी । भांडीरवासिनी शुभ्रा गोपीनाथप्रिया सखी ॥१३६॥ श्रुतिनिःश्वसिता दिव्या गोविन्दरसदायिनी । श्रीकृष्णप्रार्थनीशाना महानन्दप्रदायिनी ॥१३७॥ वैकुंठजनसंसेव्या कोटिलक्ष्मीसुखावहा । कोटिकंदर्पलावण्या रतिकोटिरतिप्रदा ॥१३८॥ भक्तिग्राह्या भक्तिरूपा लावण्यसरसो उमा । ब्रह्मरुद्रादिसंराध्या नित्यं कौतूहलान्विता ॥१३९॥ नित्यलीला नित्यकामा नित्यशृंगारभूषिता । नित्यवृन्दावनरसा नन्दनन्दनसंयुता ॥१४०॥ गोपिकामण्डलीयुक्ता नित्यं गोपालसंगता । गोरसक्षेपणी शूरा सानन्दा नन्ददायिनी ॥१४१॥ महालीला प्रकृष्टा च नागरी नगचारिणी । नित्यमाघूर्णिता पूर्णा कस्तूरीतिलकान्विता ॥१४२॥ पद्मा श्यामा मृगाक्षी च सिद्धिरूपा रसावहा । कोटिचन्द्रानना गौरी कोटिकोकिलसुस्वरा ॥१४३॥ शीलसौन्दर्यनिलया नन्दनन्दनलालिता । अशोकवनसंवासा भांडीरवनसङ्गता ॥१४४॥ कल्पद्रुमतलाविष्टा कृष्णा विश्वा हरिप्रिया । अजागम्या भवागम्या गोवर्द्धनकृतालया ॥१४५॥ यमुनातीरनिलया शश्वद्गोविन्दजल्पिनी । शश्वन्मानवती स्निग्धा श्रीकृष्णपरिवन्दिता ॥१४६॥ कृष्णस्तुता कृष्णवृता श्रीकृष्णहृदयालया । देवद्रुमफला सेव्या वृन्दावनरसालया ॥१४७॥ कोटितीर्थमयी सत्या कोटितीर्थफलप्रदा । कोटियोगसुदुष्प्राप्या कोटियज्ञदुराश्रया ॥१४८॥ मनसा शशिलेखा च श्रीकोटिसुभगाऽनघा । कोटिमुक्तसुखा सौम्या लक्ष्मीकोटिविलासिनी ॥१४९॥
द्वारा मुरली में जिनके नाम और यश का गान किया जाता है); मुरलीहारिणी, शिवा, भद्रा, भगवती, शांता, कुमुदा, सुन्दरी, प्रिया, कृष्णक्रीडा, कृष्णरति, श्रीकृष्ण की सहचारिणी, वंशीवट को अपना प्रिय स्थान समझने वाली, युगलरूपा और एकरूपा, भांडीरवासिनी, शुभ्रा, गोपीनाथप्रिया, सखी ॥१२८-१३६॥ श्रुति के निःश्वास से उत्पन्न, दिव्या, गोविन्दरसदायिनी, श्रीकृष्ण को प्रार्थना करने वाली, ईश्वरी, महानन्दप्रदायिनी, वैकुण्ठवासियों से सेवनीया, कोटि लक्ष्मी के समान सुख देने वाली, कोटि कन्दर्प के समान सुन्दरी, करोड़ रतियों के बराबर रति देने वाली, भक्ति से ग्रहण करने योग्य, भक्तिरूपा, लावण्यसरोवर, उमा, ब्रह्मा और रुद्र आदि से पूज्य, नित्यलीला करने वाली, नित्यकाम, नित्यशृंगार से विभूषित नित्य कौतूहल से युक्त, नित्य वृन्दावन का रस लेने वाली, श्रीकृष्ण के साथ रहने वाली; गोपियों की मण्डली से युक्त, नित्य गोपाल से संगति करने वाली, गोरस को फेंकने वाली, शूरा, आनन्दसहित, आनन्ददायिनी, महा- लीला करने वाली, उत्तमा, नागरी, नगचारिणी, नित्य घूमने वाली, पूर्णा, कस्तूरी का तिलक लगाने वाली, पद्मा, श्यामा, मृगाक्षी, सिद्धिरूपा, रस देने वाली, करोड़ चन्द्रमा के समान मुख वाली, गौरी, करोड़ कोयल के समान सुस्वर वाली, शील और सौन्दर्य की आधारभूता, नन्दनन्दन से लालित, अशोकवन में वास करने वाली, भांडीरवन में जाने वाली, कल्पद्रुम की लताओं से आवेष्टित होने वाली, कृष्णा, विश्वा, हरिप्रिया, विष्णु से प्राप्य, शंकर से प्राप्य, गोवर्धन पर रहने वाली, यमुनातीर पर रहने वाली, सदा गोविन्द नाम का उच्चारण करने वाली, सदा मान करने वाली, स्निग्धा, श्रीकृष्ण से परिवन्दित ॥१३७-१४६॥ कृष्ण से स्तुत, कृष्ण से आवृत्त, श्रीकृष्ण के हृदय में रहने वाली, कल्पवृक्ष के फलों का उपभोग करने वाली, सेव्या, वृन्दावन के रस का आस्वादन करने वाली, कोटितीर्थमयी, सत्या, कोटि तीर्थों का फल देने वाली, करोड़ों प्रकार के योगसाधनों से दुष्प्राप्य, करोड़ों यज्ञ करने से भी दुष्प्राप्य, मनसा नाम से प्रसिद्ध, शशिलेखा, करोड़