बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 770, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्व्यशीतितमोऽध्यायः ७५१ राधाकुण्डरतिर्धन्यः सर्वादोलसमाश्रितः । सदामधुवनानन्दी सदावृन्दावनप्रियः ॥११८॥ अशोकवनसन्नद्धः सदातिलकसंगतः । सदागोवर्द्धनरतिः सदा गोकुलवल्लभः ॥११९॥ भांडीरवटसंवासी नित्यं वंशोवटस्थितः । नन्दग्रामकृतावासो वृषभानुग्रहप्रियः ॥१२०॥ गृहीतकामिनीरूपो नित्यं रासविलासकृत् । वल्लवीजनसङ्गोप्ता वल्लवीजनवल्लभः ॥१२१॥ देवशर्मा कृपाकर्ता कल्पपादपसंस्थितः । शिलानुगन्धनिलयः पादचारी घनच्छविः ॥१२२॥ अतसीकुसुमप्रख्यः सदा लक्ष्मीकृपाकरः । त्रिपुरारि प्रियकरो ह्युग्रधन्वापराजितः ॥१२३॥ षड्धूरध्वंसकर्ता च निकुंभप्राणहारकः । वज्रनाभपुरध्वंसी पौंड्रकप्राणहारकः ॥१२४॥ बहुलाश्वप्रीतिकर्ता द्विजवर्यप्रियंकरः । शिवसंकटहारी च वृकासुरविनाशनः ॥१२५॥ भृगुसत्कारकारी च शिवसात्त्विकताप्रदः । गोकर्णपूजकः सांबकुष्ठविध्वंसकारणः ॥१२६॥ वेदस्तुतो वेदवेत्ता यदुवंशविवर्द्धनः । यदुवंशविनाशी च उद्धवोद्धारकारकः ॥१२७॥ राधा च राधिका चैव आनंदा वृषभानुजा । वृन्दावनेश्वरी पुण्या कृष्ण मानसहारिणी ॥१२८॥ प्रगल्भा चतुरा कामा कामिनी हरिमोहिनी । ललिता मधुरा माध्वी किशोरी कनकप्रभा ॥१२९॥ जितचंद्रा जितमृगा जितसिंहा जितद्विपा । जितरंभा जितपिका गोविन्दहृदयोद्भवा ॥१३०॥ जितबिंबा जितशुका जितपद्मा कुमारिका । श्रीकृष्णार्कषणा देवो नित्यं युग्मस्वरूपिणी ॥१३१॥ नित्यं विहारिणी कांता रसिका कृष्णवल्लभा । आमोदिनी मोदवतो नंदनंदनभूषिता ॥१३२॥ दिव्यांबरा दिव्यहारा मुक्तामणिविभूषिता । कुञ्जप्रिया कुञ्जवासा कुञ्जनायकनायिका ॥१३३॥ में बंध कर नित्य क्रीड़ा करने वाले, व्रज के ईश्वर, राधाकुण्ड से अनुराग रखने वाले, धन्य, सदा झूले पर झूलने वाले, सदा मधुवन में आनन्द करने वाले, वृन्दावन के शाश्वत प्रेमी, अशोकवन में रहने वाले, तिलक लगाने वाले, गोवर्द्धन से स्नेह करने वाले, सदा गोकुलवल्लभ, भांडीरवट पर वास करने वाले, वंशीवट पर स्थित, नन्दीग्राम में वास करने वाले, वृषभानु-कुमारी के प्रिय, कामिनी का रूप धारण करने वाले, नित्य रासलीला करने वाले, गोपोजनों के संरक्षक, गोपियों के प्रिय, देवशर्मा के ऊपर कृपा करने वाले, कल्पवृक्ष पर रहने वाले, सुगन्धित पदार्थों से युक्त, पैदल चलने वाले, मेघ के समान कान्ति वाले, अलसी के पुष्प के सदृश आभा वाले, सदा लक्ष्मीवान्, शिव के प्रियकर्ता, उग्रधन्वा से अपराजित, षड्धुर के ध्वंसक, निकुंभ के प्राण-हर्ता, वज्रनाभपुर के विध्वंसी, पौंड्रकप्राणहारी, बहुलाश्व से प्रीति करने वाले, द्विजवर्य के प्रिय करने वाले, शिव के संकट को दूर करने वाले, वृकासुर के विनाशक, भृगु का सत्कार करने वाले, शिव को सात्त्विकता प्रदान करने वाले, गोकर्णपूजक, सांब के कुष्ठ-विध्वंस के कारण, वेदस्तुत, वेदवेत्ता, यदुवंश को बढ़ाने वाले, यदुवंशविनाशी, उद्धव के उद्धारकर्ता ॥११६-१२७॥ राधा, राधिका, आनन्दा, वृषभानुजा, वृन्दावनेश्वरी, पुण्या, कृष्णमानसहारिणी, प्रगल्भा, चतुरा, कामा, कामिनी, हरिमोहिनी, ललिता, मधुरा, माध्वी, किशोरी, कनकप्रभा, जितचंद्रा जितमृगा, जितसिंहा, जितद्विपा, जित- रंभा, जितपिका, गोविन्दहृदयोद्भवा, जितबिंबा, जितशुका, जितपद्मा, कुमारिका, श्रीकृष्ण को आकर्षित करने वाली, नित्य युगल रूप को धारण करने वाली, नित्य विहार करने वाली, कांता, रसिका, कृष्णवल्लभा, आमोदिनी, मोदवती, नन्दनन्दन-भूषिता, दिव्याम्बरा, दिव्यहारा, मुक्तामणिविभूषिता, कुन्जप्रिया, कुञ्जवासा, कुञ्जनायक- नायिका, चा रूपा, चारुवक्त्रया, सुन्दर सुवर्ण के केयूर को धारण करने वाली, शुभा, श्रीकृष्णवेणुसंगीता (श्रीकृष्ण