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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 774, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 774

द्वयशीतितमोऽध्यायः ७५५ हेमहारान्वितापुष्पा हाराढ्या रसवत्यपि । माधुर्यं मधुरा पद्मा पद्महस्ता सुविश्रुता ॥१७८॥ भ्रूभंगाभंगकोदंडकटाक्षशरसंधिनी । शेषदेवा शिरस्था च नित्यस्थलविहारिणी ॥१७९॥ कारुण्यजलमध्यस्था नित्यमत्ताधिरोहिणी । अष्टभाषवती चाष्टनायिका लक्षणान्विता ॥१८०॥ सुनीतिज्ञा श्रुतिज्ञा च सर्वज्ञा दुःखहारिणी । रजोगुणेश्वरी चैव जरच्चंद्रनिभानना ॥१८१॥ केतकीकुसुमाभासा सदा सिंधुवनस्थिता । हेमपुष्पाधिककरा पञ्चशक्तिमयी हिता ॥१८२॥ स्तनंकुभी नराढ्या च क्षीणापुष्या यशस्विनी । वैराजसूयजननी श्रीशा भुवनमोहिनी ॥१८३॥ महाशोभा महामाया महाकांतिर्महास्मृतिः । महामोहा महाविद्या महाकीर्तिर्महारतिः॥१८४॥ महाधैर्या महावीर्या महाशक्तिर्महाद्युतिः । महागौरी महासंपन्महाभोगविलासिनो ॥१८५॥ समया भक्तिदाशोका वात्सल्यरसदायिनी । सुहृद्भक्तिप्रदा स्वच्छ। माधुर्यरसवर्षिणी ॥१८६॥ भावभक्तिप्रदा शुद्धप्रेमभक्तविधाधिनी । गोपरामाभिरामा च क्रीडारामा परेश्वरी ॥१८८॥ नित्यरामा चात्मरामा कृष्णरामा रमेश्वरी । एकानेकजगद्व्याप्ता विश्वलीलाप्रकाशिनी ॥१८८॥ सरस्वतीशा दुर्गेशा जगदीशा जगद्विधिः । विष्णुवंशविकासा च विष्णुवंशसमुद्भवा ॥१८६॥ विष्णुवंशस्तुता कर्त्री विष्णुवंशावनी सदा । आरामस्था वनस्था च सूर्यपुत्र्यवगाहिनी ॥१९०॥ प्रीतिस्था नित्ययंत्रस्था गोलोकस्था विभूतिदा । स्वानुभूतिस्थिता व्यक्ता सर्वलोकनिवासिनी ॥१९२॥ अमृता हृदद्भुता श्रीमन्नारायणसमीडिता । अक्षरापि च कूटस्था महापुरुषसंभवा ॥१९३॥ कृष्ण के अधरामृत का स्वाद लेने वाली, कृष्ण-प्रेम से विनोद करने वाली, मयूर-पंख से सुशोभित मुकुट वाली, कनकचंपा से विभूषित, कुंकुम, महावर तथा कस्तूरी से अलंकृत, पराजित न होने वाली, स्वर्णहार से युक्त, पुष्प धारण करने वाली, हारों से सम्पन्न, रसवती, माधुर्यमधुरा, पद्मा, पद्महस्ता, अत्यन्त प्रसिद्धा, भ्रू- भंग रूपी धनुष पर कटाक्ष रूपी बाण चढ़ाने वाली, अनन्तशेष के शिर पर रहने वाली, नित्य स्थल पर विहार करनेवाली, करुणा रूपी जल के मध्य में रहने वाली, नित्य हाथी पर चढ़ने वाली, आठ भाषाओं को जानने वाली, आठ प्रकार की नायिकाओं के लक्षण से संपन्न, सुनीतिज्ञा, श्रुतिज्ञा, सर्वज्ञा, दुःखहारिणी, रजोगुणेश्वरी, शरत्कालीन चन्द्र के समान मुख वाली, केतकी पुष्प के समान कान्तिवाली, सदा सिंधुवन में रहने वाली, हाथों में चम्पा के पुष्प रखने वाली, पंच शक्तिमयी, कल्याणकारिणी, कुंभस्तनी, नरसंपन्ना, क्षीणा, पुण्या, यशस्विनी, राजसूयजननी, श्री, ईशा, भुवनमोहिनी, महाशोभा, महामाया, महाकांति, महास्मृति, महामोहा, महाविद्या, महाकीर्ति, महारति, ॥१७६-१८४॥महाधैर्या, महावीर्या, महाशक्ति, महाद्युति, महागौरी, महासंपत्ति, महाभोग- विलासिनी, शीघ्र भक्ति प्रदान करने वाली; शोकरहिता, वात्सल्यरस को देने वाली, अंतरंग व्यक्ति को भक्ति समर्पित करने वाली, स्वच्छा, माधुर्यरस की वर्षा करने वाली, भाव एवम् भक्ति प्रदान करने वाली, शुद्ध प्रेम तथा भक्ति प्रदान करने वाली, गोपों को आनन्द देने वाली, अभिरामा, क्रीडाशीला, परेश्वरी, नित्य रमण करने वाली, आत्मा में रमण करने वाली, कृष्ण तथा राम का स्वरूप धारण करने वाली रमा, ईश्वरी, अद्वितीया, संपूर्ण जगत् में व्याप्त होने वाली, विश्व-लीला का प्रकाश करने वाली, सरस्वती की ईश्वरी, दुर्गा की ईश्वरी, जगदीश्वरी,जगद्- विधात्री, विष्णु के वंश में निवास करने वाली, विष्णुवंश में समुत्पन्न, विष्णुवंश में स्तुत होने वाली, कर्त्री, सदा विष्णु- वंश की रक्षा करने वाली,उद्यान में रहने वाली, वन में रहने वाली, यमुना में स्नान करने वाली, प्रेम में निवास करने वाली, नित्य यंत्र में रहनेवाली, गोलोक में रहनेवाली, ऐश्वर्य देने वाली, अपनी अनुभूति में रहने वाली, अव्यक्त स्वरूपा,