सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 786, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 786

त्र्यशीतितमोऽध्यायः ७६७ पादांघ्रिनखलोमाद्यभूनाद्रुम लक्षिताम् । ग्रहराश्यर्क्षयोगादिमूर्तावयवसंज्ञिकाम् ॥१३४॥ तिथिमासतुं पक्षाद्यैः संकेतनिमिषात्मिकाम् । मायाकल्पितवैचित्र्यसंध्याद्यच्छदनावृताम् ॥१३५॥ ज्वलत्कालानलप्रख्यां तडित्कोटिसमप्रभाम् । कोटिसूर्यप्रतीकाशां शशिकोटिसुशीतलाम् ॥१३६॥ सुधामंडलमध्यस्थां सांद्रानंदामृतात्मिकाम् । वागतीतां मनोऽगम्यां वरदां वेदमातरम् ॥१३७॥ चराचरमयीं नित्यां ब्रह्माक्षरसमन्विताम् । ध्यात्वा स्वात्मविभेदेन सावित्रीपंजरं न्यसेत् ॥१३८॥ पञ्जरस्य ऋषिः सोऽहं छंदो विकृतिरुच्यते । देवता च परो हंसः परब्रह्मादिदेवता ॥१३८॥ धर्मार्थकाममोक्षाप्त्यै विनियोग उदाहृतः । षडंगदेवतामन्त्रैरंगन्यासं समाचरेत् ॥१४०॥ विधामूलेन मेधावी व्यापकं हि समाचरेत् । पूर्वोक्तां देवतां ध्यायेत्साकारां गुणसंयुताम् ॥१४१॥ त्रिपदा हरिजा पूर्वमुखी ब्रह्मास्त्रसंज्ञिका । चतुर्विंशतितत्त्वाढ्या पातु प्राचीं दिशं मम ॥१४२॥ चतुष्पदा ब्रह्मदंडा ब्रह्माणी दक्षिणानना । षड्विंशतत्तत्त्वसंयुक्ता पातु मे दक्षिणां दिशम् ॥१४३॥ प्रत्यङ्मुखी पञ्चपदी पञ्चाशत्तत्त्वरूपिणी । पातु प्रतीचीमनिशं मम ब्रह्मशिरोंकिता ॥१४४॥ सौम्यासborder ब्रह्मा तुर्याढ्या साथर्वांगिरसात्मिका । उदीचीं षट्पदा पातु षष्टितत्त्वकलात्मिका ॥१४५॥ पञ्चाशद्वर्णरचिता नवपादा शताक्षरी । व्योमा संपातु मे वोर्ध्वं शिरो वेदांतसंस्थिता ॥१४६॥ विद्युन्निभा ब्रह्मसन्ध्या मृगारूढा चतुर्भुजा । चापेषुचर्मासिधरा पातु मे पावकीं दिशम् ॥१४७॥ ब्राह्मी कुमारी गायत्री रक्तांगी हंसवाहिनी । बिभ्रत्कमण्डलु चाक्षं स्रुवस्त्रुवौ पातु नैर्ऋतिम् ॥१४८॥

वृक्ष उनके चरण, नख एवम् लोम हैं, ग्रह, राशि, नक्षत्र तथा योग उनके अवयव हैं ॥१२६-१३४॥ तिथि, मास, ऋतु, पक्ष, क्षण और निमेष से वे युक्त हैं, अपनी माया से वे अनेक विचित्रताओं की कल्पना करती हैं, संध्या- रूपो आवरण से उनका शरीर ढंका हुआ है, जाज्वल्यमान कालाग्नि की तरह उनके शरीर में तेज विद्यमान है कोटि विद्युल्लताओं के समान उनकी कान्ति है । कोटि सूर्य के समान उनका स्वरूप हैं, कोटि चंद्रमा के तुल्य वे शीतल हैं, सुधामंडल के मध्य में वे रहती हैं, पूर्ण आनन्दरूपी अमृत का पान करती हैं, वाणी से परे हैं, मनसा गम्य हैं, वरदायिका एवम् वेदमाता हैं, चराचरमयी हैं, नित्या हैं, उन्हें ब्रह्माक्षर कहते हैं । इस प्रकार अनन्यमन से उनका ध्यान कर सावित्री पंजर (मंत्र) का न्यास करे । पंजर के ऋषि सोहम् है, छंद विकृति है, देवता परमहंस हैं और आदि देवता परब्रह्म हैं ॥१३५-१३८॥ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिये इसका विनियोग किया जाता है । षडंगदेवता के मंत्रो से अंगन्यास करे । विद्वान् ब्यक्ति मूलमंत्र से पूजा करे । पूर्वोक्त देवता का ध्यान साकार रूप में करना चाहिए, जो त्रिगुणमयी हो, तीन चरणवालो, विष्णु से उत्पन्न होने वाली, पूरब की ओर मुखवाली, ब्रह्मास्त्र संज्ञा वाली और चौबीस तत्त्वों से सम्पन्न भगवती पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करे । चार चरणवाली, ब्रह्मदंड कहलाने वाली, दक्षिण की ओर मुखवाली और छब्बीस तत्त्वों से युक्त ब्रह्माणी दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करे । पांच पद वालो, पश्चिम की ओर मुखवाली, और ब्रह्मशिर धारण करने वाली देवी सदा पश्चिम दिशा में मेरी रक्षा करे ॥१४०-१४४॥ उत्तर की ओर मुख वाली, छह पैर वाली, तुरीय ब्रह्म से युक्त अंगिरस अयवं वेद तथा साठ तत्त्वों से सम्पन्न देवी उत्तर दिशा में मेरी रक्षा करे । पचास वर्णों से निर्मित, नौ चरण एवम् सौ अक्षरों से युक्त तथा वेदान्त निष्ठा ब्योमा देवी मेरे ऊर्ध्व भाग-शिर की रक्षा करे । विद्युत् की तरह आभा वालो, मृग पर आरूढ, चतुर्भुज, धनुष, बाण, कवच तथा खड्ग धारण करने वाली ब्रह्मसंध्या देवी अग्नि कोण में मेरी रक्षा करे । कुमारी, रक्तांगी हंसवाहिनी, कमंडलु