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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 785, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 785

यहाँ पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

७६६ नारदीयपुराणम् सौरे पीठे यजेद्देवीं दीप्तादिनवशक्तिभिः । मूलमंत्रेण क्लृप्तायां मूतौ देवीं प्रपूजयेत् ॥११७॥ कोणेषु त्रिषु संपूज्या ब्राह्म्याद्याः शक्तयो बहिः । आदित्याद्यास्ततः पूज्या उषादिसहिताः क्रमात् ॥११८॥ ततः षडंगान्यभ्यर्च्य केसरेषु यथाविधि । प्रह्लादिनीं प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वंभरां पुनः ॥११९॥ विलासिनीप्रभावत्यौ जयां शांतां यजेत्पुनः । कांति दुर्गासरस्वत्यौ विद्यारूपां ततः परम् ॥१२०॥ विशालसंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् । तमोपहारिणीं सूक्ष्मां विश्वयोनि जयावहाम् ॥१२१॥ पद्मालयां परां शोभां ब्रह्म रूपां ततोऽर्चयेत् । ब्राह्म्याद्याः शारणा बाह्ये पूजयेत्प्रोक्तलक्षणाः ॥१२२॥ ततोऽभ्यर्चद् ग्रहान्बाह्ये शक्राद्यानायुधैः सह । इत्थमावरणैर्देवीः दशभिः परिपूजयेत् ॥१२३॥ अष्टलक्षं जपेन्मंत्रं तत्सहस्रं हुनेत्तिलैः । सर्वपापविनिर्मुक्तो दीर्घमायुः स विंदति ॥१२४॥ अहणाब्जैस्त्रिमध्वक्तैर्जुहुयादयुतं ततः । महालक्ष्मीर्भवेत्तस्य षण्मासान्नात्र संशयः ॥१२५॥ ब्रह्मवृक्षप्रसूनैस्तु जुहुयाद्ब्रह्मतेजसे । बहुना किमिहोक्तेन यथावत्साधिता सती ॥१२६॥ साधकानामिदं विद्या भवेत्कामदुघा मुने । अथ ते संप्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ॥१२७॥ सावित्रीपंजरं नाम सर्वरक्षाकरं नृणाम् । व्योमकेशालकासक्तां सुकिरीटविराजिताम् ॥१२८॥ मेघभ्रू कुटिलाक्रांतां विधिविष्णुशिवाननाम् । गुरुभार्गवकर्णा तां सोमसूर्याग्निलोचनाम् ॥१२९॥ इडापिंगलिकासूक्ष्मावायुनासापुटान्विताम् । संध्याद्विजोष्ठपुटितां लसद्वागुपजिव्हिकाम् ॥१३०॥ संध्यासूर्यमणिग्रीवां मरुद्वाहसमन्वितान् । पर्जन्यहृदयासक्तां वस्वाख्यप्रतिमंडलाम् ॥१३१॥ आकाशोदरविश्रांतां नाभ्यवांतरवीथिकाम् । प्रजापत्याख्यजघनां कटींद्राणीसमाश्रिताम् ॥१३२॥ ऊर्वोर्मलयमेरुभ्यां शोभमानां सरिद्वराम् । सुजानुजह्वू कुशिकां वैश्वदेवाह्वयसंज्ञिकाम् ॥१३३॥ ब्राह्मी आदि शक्तियों की अर्चना कर उषा आदि सहित आदित्य आदि देवों का क्रमशः पूजन करे। तदनन्तर छह अंगों की पूजा कर नागकेसर पुष्पों के ऊपर प्रह्लादिनी, प्रभा, नित्या, विश्वंभरा, विलासिनी, प्रभावती, जया, शान्ता, कांति, दुर्गा, सरस्वती, विद्यारूपा, विशाला, ईशा, व्यापिनी, विमला, तमोपहारिणी, सूक्ष्मा, विश्वयोनि जयावहा, पद्मालया, परा शोभा, ब्रह्मरूपा और शारणा का पूजन करे ॥११६-१२२॥ तत्पश्चात् ग्रहों और आयुधों सहित इन्द्र आदि देवताओं की आराधना करे। इस प्रकार दश आवरणों से देवियों की पूजा करे। आठ लाख मंत्र का जप करे और उतने ही हजार तिल से हवन करे। ऐसा करनेवाला व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त होकर दीर्घायु होता है। तदनन्तर मधु मिलाकर तीन लाल कमलों से होम करना चाहिए। ऐसा करने से वह छह मास के भीतर ही महाधनवान् हो जाता है, इसमें संशय नहीं। ब्रह्मतेज के लिए ब्रह्मवृक्ष के पुष्पों से हवन करना चाहिए। मुने ! अधिक क्या कहूँ। विधिपूर्वक देवी की आराधना करने से साधक को कामधेनु की तरह विद्या- रूपिणी देवी सबकुछ प्रदान करती हैं ॥१२३-१२८॥ अब मैं मनुष्यों की सब तरह से रक्षा करने वाले सावित्री- पंजर नामक अत्यन्त अद्भुत रहस्य को बतलाता हूँ। साधक भगवती के इस रूप का ध्यान करे कि, आकाश उनका केश पाश है, वे सुन्दर मुकुट से शोभायमान हो रही हैं, मेघ उनकी कुटिल भ्रूकुटि है, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव उनके मुख हैं, वृहस्पति एवम् शुक्र उनके कान हैं, सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि उनके नेत्र हैं, इड़ा और पिंगला उनके नासिकापुट है, संध्या अधर एवम् ओष्ठ है, जिह्वा पर वाणी विराजमान रहती है, संध्या-कालीन सूर्य उनकी मणिग्रीवा है, वायु बाहें है, बादल हृदय है, वसुगण मंडल है, आकाश उदर है, नाभि के ऊपर रोमावलि रमणीय है, प्रजापति उनका जघन है, इंद्राणी कमर है, मलयाचल एवम् सुमेरु पर्वत उनके ऊरु हैं, वे बहुत कम- नीय हैं, सरिताओं में श्रेष्ठ है, जाह्नवी एवम् कौशिकी उनके घुटने हैं, वैश्वदेवी उनकी संज्ञा है, पृथ्वी, पर्वत तथा