बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७६८ नारदीयपुराणम्
शुक्लवर्णा च सावित्री युवती वृषवाहना । कपालशूलाक्षस्रग्धारिणी पातु वायवीम् ॥१४८॥ श्यामा सरस्वती वृद्धा वैष्णवी गरुडासना । शंखचक्राभयकरा पातु शैवीं दिशं मम ॥१५०॥ चतुर्भुजा देवमाता गौरांगी सिंहवाहना । वराभयखड्गचर्मभुजा पात्वधरां दिशम् ॥१५१॥ तत्तत्पार्श्वे स्थिताः स्वस्ववाहनायुधभूषणाः । स्वस्वदिक्षु स्थिताः पांतु ग्रहशक्त्यंगसंयुताः ॥१५२॥ मंत्राधिदेवतारूपा मुद्राधिष्ठातृदेवताः । व्यापकत्वेन पांत्वस्मानापादतलमस्तकम् ॥१५३॥ इदं ते कथितं सत्यं सावित्रीपंजरं मया । संध्ययोः प्रत्यहं भक्त्या जपकाले विशेषतः ॥१५४॥ पठनीयं प्रयत्नेन भुक्तिं मुक्तिं समिच्छता । भूतिदा भुवना वाणी महावसुमती मही ॥१५५॥ हिरण्यजननी नन्दा सविसर्गा तपस्विनी । यशस्विनी सती सत्या वेदविच्चिन्मयी शुभा ॥१५६॥ विश्वा तुर्या वरेण्या च निसृणी यमुना भुवा । मोदा देवी वरिष्ठा च धीश्च शांतिमती मही ॥१५७॥ धिषणा योगिनी युक्ता नदी प्रज्ञाप्रचोदनी । दया च यामिनी पद्मा रोहिणी रमणी जया ॥१५८॥ सेनामुखी साममयी बगला दोषवर्जिता । माया प्रज्ञा परा दोग्ध्री मानिनी पोषिणी क्रिया ॥१५९॥ ज्योत्स्ना तीर्थमयी रम्या सौम्यामृतमया तथा । ब्राह्मी हैमी भुजंगी च वशिनी सुंदरी वनी ॥१६०॥ ओंकारहंसिनी सर्वा सुधा सा षड्गुणावती । माया स्वधा रमा तन्वी रिपुघ्नी रक्षणी सती ॥१६१॥ हैमी तारा विधुगतिर्विषघ्नी च वरानना । अमरा तीर्थदा दीक्षा दुर्धर्षा रोगहारिणी ॥१६२॥ नानापापनृशंसघ्नी षट्पदी वज्रिणी रणी । योगिनी विमला सत्या अबला बलदा जया ॥१६३॥ गोमती जाह्नवी रज्वी तपनी जातवेदसा । अचिरा वृष्टिदा ज्ञेया ऋतंतंत्रा ऋतात्मिका ॥१६४॥ सर्वकामदुधा सौम्या भवाहंकारवर्जिता । द्विपदा या चतुष्पदा त्रिपदा या च षट्पदा ॥१६५॥
रुद्राक्षमाला, सुक्र तथा स्रुवा धारण करने वाली ब्राह्मी गायत्री नैर्ऋत्य कोण में मेरी रक्षा करे । शुक्लवर्णा, युवती, वृषवाहना, कपाल, त्रिशूल तथा रुद्राक्ष माला धारण करने वाली सावित्री वायव्य कोण में मेरी रक्षा करे ॥१४५-१४८॥ श्यामा, वृद्धा वैष्णवी, गरुडासना तथा शंख, चक्र एवम् अभयास्त्र धारण करने वाली सरस्वती देवी ईशान कोण में मेरी रक्षा करे । चतुर्भुजा गौरांगी, सिंहवाहना तथा अभयास्त्र, खड्ग एवम् कवच धारण करने वालो देव माता अधर दिशा में मेरी रक्षा करे । उन देवियों की बगल में रहने वाली तत्तत् देवियों, जो अपने अपने वाहन अस्त्र तथा आभूषणों से भूषित एवम् ग्रह, शक्ति और अंगों से युक्त हैं, अपनी अपनी दिशा में मेरी रक्षा करें । मंत्र एवम् मुद्रा की अधिष्ठात्री देवियाँ व्यापक रूप से मेरे मस्तक से लेकर चरण तक की रक्षा करे ॥१५०-१५३॥ इस सत्य सावित्री पंजर को मैंने तुमसे बता दिया । भुक्ति-मुक्ति के इच्छुक व्यक्ति प्रत्येक दिन दोनों संध्या विशेष करके जप काल में इसका पाठ अवश्य करे । भूतिदा, भुवना, वाणी, महावसुमती, मही, हिरण्यजननी, नंदा, सविसर्गा, तपस्विनी, यशस्विनी, सती, सत्या, वेदवित्, चिन्मयी, शुभा, विश्वास, तुर्या, वरेण्या, निसृणी, यमुना, भुवा, मोदा, देवी, वरिष्ठा, धी, शान्ति, मति, मही, धिषणा, योगिनी, नदी, प्रज्ञा, प्रचोदिनी, दया, यामिनी, पद्मा, रोहिणी, रमणी, जया, सेनामुखी, साममयी, बगला, दोषवर्जिता, माया, प्रज्ञा, परा, दोग्धी, मानिनी, पोषिणी, क्रिया, ज्योत्स्ना, तीर्थमयी, रम्या, सौम्या, अमृतमया, ब्राह्मी, हैमी, भुजंगी, वशिनी, सुन्दरी, वनी, ओंकारहंसिनी, सर्वा, सुधा, षड्गुणावती, माया, स्वधा, रमा, तन्वी, रिपुघ्नी, रक्षणी, सती, हैमी, तारा, विधुगति, विषघ्नी वरानना, अमरा, तीर्थदा, दीक्षा, दुर्धर्षा, रोगहारिणी, नानापापनृशंसघ्नी, षट्पदी, वज्रि, रजी, योगिनी, विमला, अबला, सत्या, बलदा, जया, गोमती, जाह्नवी, रज्वी, तपनी, जातवेदसा, अचिरा, वृष्टिदा, ज्ञेया, ऋततंत्रा, ऋतात्मिका, सर्वकामदुधा, सौम्या, भवाहंकारवर्जिता, द्विपदा, चतुष्पदा, त्रिपदा, षट्पदा, अष्टपदी, नवपदी सहस्राक्षा,