बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुरशीतितमोऽध्यायः ७६६ अष्टापदी नवपदी सहस्राक्षरात्मिका। अष्टोत्तरशतं नाम्नां सावित्र्या यः पठेन्नरः ॥१६६॥ स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् । एतत्ते कथितं विप्र पंचप्रकृतिलक्षणम् ॥१६७॥ मंत्राराधनपूर्वं च विश्वकामप्रपूरणम् ॥१६८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे पञ्चप्रकृतिमन्त्रादिनिरूपणं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥८३॥ चतुरशीतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच कलिकल्पान्तरे ब्रह्मन् ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः। लोकपद्मे तपस्यस्य सृष्टयर्थं संबभूवतुः ॥१॥ विष्णुकर्णमलोद्भूतावरुरौ मधुकैटभौ। तौ जातमात्रौ पयसि लोकप्रलयलक्षणे ॥२॥ जानुमात्रे स्थितौ दृष्ट्वा ब्रह्माणं कमलस्थितम्। प्रवृत्तावुत्तमालक्ष्य तुष्टाव जगदंबिकाम् ॥३॥ ततो देवी जगत्कर्त्री शर्वी शक्तिरनुत्तमा। नारायणाक्षिसंस्थाना निद्रा प्रीता बभूव ह ॥४॥ तस्या मंत्रादिकं सर्वं कथयिष्यामि तच्छृणु। सारुणा क्रोधनी शांतिश्चंद्रालंकृतशेखरा ॥५॥ एकाक्षरीबीजमन्त्रऋषिः शक्तिरुदाहृता। गायत्री च भवेच्छन्दो देवता भुवनेश्वरी ॥६॥ अक्षरस्वरूपी—ये एक सो आठ नाम सावित्री देवी के कहे गये हैं। जो व्यक्ति इन नामों का पाठ करेगा, वह दीर्घायु सुखी, पुत्री, विजयी तथा विनयी होगा। विप्र ! यह मैं राधिका की पंचप्रकृतिलक्षण सृष्टि बतला दी, इनके मंत्र जप तथा आराधना करने से समस्त कामनायें पूरी होती हैं ॥१५४-१६८॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में पंचप्रकृति और मंत्र आदि निरूपण नामक तिरासीवाँ अध्याय समाप्त ॥८३॥ अध्याय ८४ जप होम की विधि सहित देवी-मंत्र का निरूपण सनत्कुमार बोले- ब्रह्मन् ! कलिकल्प में अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा जब सृष्टि के निमित्त लोकपद्म पर तप कर रहे थे तब विष्णु के कर्णमल से मधु और कैटभ नामक दो असुर उत्पन्न हुए, जिनके घुटने तक ही जग- प्रलयकारी जल हुआ था। उत्पन्न होते ही वे कमलस्थित ब्रह्मा को देख कर उन्हें खाने के लिये यत्न करने लगे। तब चतुरानन ने जगदंबा की स्तुति की। स्तुति से जगत्कर्त्री, अत्युत्तमा शैवी शक्ति तथा विष्णु के नेत्र पर संस्थान करने वाली निद्रा देवी प्रसन्न हुईं। उनके मंत्र आदि सबकुछ मैं तुमसे बता देता हूँ, सुनो ॥१-४१/२॥ अरुणा, क्रोधनी, शांति, चन्द्रमा से अलंकृत ललाटवाली और एकाक्षरी-यह बीज मंत्र है। इसके ऋषि एवम् शक्ति भी कही गई है। गायत्री इसका छंद है और भुवनेश्वरी देवता है। छह दीर्घ मात्राओं से युक्त ९७—ना० पु०