बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७७० नारदीयपुराणम् षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । संहारसृष्टिमार्गेण मातृकान्यस्तविग्रहः ॥७॥ मन्त्रन्यास ततः कुर्याद्देवताभावसिद्धये । हृल्लेखां मूर्ध्नि वदने गगनां हृदयांबुजे ॥८॥ रक्तां करालिकां गुह्ये महोच्छुष्मा पदद्वये । ऊर्ध्वप्राग्दक्षिमोदीच्यपश्चिमेषूत्तरेऽपि च ॥६॥ सद्यादिह्रस्वबीजायान्यस्तव्या भूतसंप्रभाः । अंगानि विन्यसेत्पश्चाज्जातियुक्तानि षट् क्रमात् ॥१०॥ ब्रह्माणं विन्यसेद्भाले गायत्र्या सह संयुतम् । सावित्र्या सहितं विष्णुं कपोले दक्षिणे न्यसेत् ॥११॥ वागीश्वर्या समायुक्तं वामंगंडं महेश्वरम् । श्रिया धनपतिं न्यस्य वामकर्णाग्रके पुनः ॥१२॥ रत्या स्मरं मुखे न्यस्य पुण्यागणपतिं न्यसेत् । सव्यकर्णोपरि निधाकर्णगंडांतरालयोः ॥१३॥ न्यस्तव्यं वदने मूलं रूपश्चैवांस्ततो न्यसेत् । कण्ठमूले स्तनद्वंद्वे वामांसे हृदयांबुजे ॥१४॥ सव्यांसे पार्श्वयुगले नाभिदेशे च देशिकः । भालांश्च पार्श्वजठरे पार्श्वोऽसावरके हृदि ॥१५॥ ब्रह्माण्याद्यास्तनौ न्यस्य विधिना प्रोक्तलक्षणाः । मूलेन व्यापकं देहे न्यस्य देवीं विचिंतयेत् ॥१६॥ उद्यद्दिवाकरनिभां तुंगरोजां त्रिलोचनाम् । स्मेरास्यामिंदुमुकुटां वरपाशांकुशाभयाम् ॥१७॥ रदलक्षं जपेन्मत्रं त्रिमध्वक्तैर्हुनेत्ततः । अष्टद्रव्यैर्दशांशेन ब्रह्मवृक्षसमिद्भरैः ॥१८॥ द्राक्षाखर्जूरवातामशर्करानालिकेरकम् । तन्दुलाज्यतिलं विप्र द्रव्याष्टकमुदाहृतम् ॥१६॥ दद्यादर्घ्यं दिनेशाय तत्र संचित्य पार्वतीम् । पद्दमष्टदलं बाह्ये वृत्तं षोडशभिद्दलैः ॥२०॥ विलिखेत्कर्णिकामध्ये षट्कोणमतिसुन्दरम् । ततः संपूजयेत्पीठं नवशक्तिसमन्वितम् ॥२१॥ जयाख्या विजया पश्चादजिताह्यापराजिता । नित्या विलासिनी दोग्ध्री त्वघोरा मंगला नव ॥२२॥ बीज मंत्र से क्रमशः षडंगन्यास करना चाहिये । साधक संहार एवम् सृष्टिमार्ग से मातृकान्यास कर देवता की भावसिद्धि के लिये मन्त्रन्यास करे । मस्तक पर हृल्लेखा, मुख में गगना, हृदयकमल में रक्ता, गुह्यप्रदेश में करालिका, चरणद्वय पर महोच्छुष्मा और ऊपर, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवम् उत्तर में भूत के समान प्रभा वाली सद्या आदि तथा ह्रस्व, बीज आदि का न्यास करे । पश्चात् जातियुक्त छह अंगों का क्रमशः न्यास करना चाहिये ॥५-१०॥ ललाट पर गायत्री सहित ब्रह्मा का और दक्षिण कपोल पर सावित्री सहित विष्णु का न्यास करना चाहिये । वाम कपोल पर वागीश्वरी सहित महेश्वर का और वामकर्ण के अग्रभाग में लक्ष्मी सहित कुबेर का न्यास करे । मुख में रति सहित कन्दर्प का और बायें कान पर पुण्यासहित गणपति का न्यास करे ॥११-१२१/२॥ कान तथा तथा कपोल के मध्य में निधा का और वदन में मूलमन्त्र का न्यास करे । तदनन्तर कण्ठमूल, स्तनद्वय, वामस्कन्ध, दक्षिणस्कन्ध, हृदयकमल, पाश्र्वयुगल तथा नाभिदेश में चैत्रों का न्यास कर उदर, स्कन्ध तथा हृदय के एक देश में भालों का न्यास करे । फिर स्तन पर उक्तलक्षणा ब्रह्माणी आदि देवियों का न्यास कर देह में मूलमन्त्र से व्यापक का न्यास करे । तत्पश्चात् उदीयमान दिवाकर के समान तेजवाली, उत्तुंग कुच वाली, तीन नेत्रवाली, किंचित् हास्य-युक्त मुख वाली, चन्द्रमुकुट वाली, उत्तम पाश, अंकुश तथा अभ- यास्त्र धारण करने वाली देवी का ध्यान कर बत्तीस लाख मन्त्रों का जप करे । फिर त्रिमधु (घी, चीनी और मधु) मिश्रित अष्ट द्रव्य एवम् ब्रह्मवृक्ष की समिधा से उसका दशांश हवन करे ॥१३-१८॥ विप्र ! दाख खजूर, बादाम, शर्करा, नारियल, तन्दुल, घी तथा तिल -ये अष्ट द्रव्य कहलाते हैं । तदनन्तर सूर्य को अर्घ्य प्रदान कर पार्वती का ध्यान करे और कर्णिका के मध्य में अष्टदल, षोडशदल तथा परम सुन्दर षट्कोण का निर्माण करे । फिर नौ शक्तियों के साथ पीठ की पूजा करे । जया, विजया, अजिता, अपराजिता, नित्या,