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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 790, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 790

चतुरशीतितमोऽध्यायः ७७१ बीजाढ्यमासनं दत्त्वा मूर्तिं तेनैव कल्पयेत् । तस्यां संपूजयेद्देवीमावाह्यावरणैः क्रमात् ॥२३॥ मध्यप्राग्द्याम्यसौम्येषु पूजयेदंगदेवताः । षट्कोणेषु यजेन्मन्त्री पश्चान्मिथुनदेवताः ॥२४॥ इन्द्रकोणे लसद्दंडकुण्डिकाक्षगुणामयाम् । गायत्रीं पूजयेन्मन्त्री ब्रह्माणमपि तादृशम् ॥२५॥ रक्षःकोणे शंखचक्रगदापंकजधारिणीम् । सावित्रीं पीतवसनां यजेद्विष्णुं च तादृशम् ॥२६॥ वायुकोणे परश्वक्षमालाभयवरान्विताम् । यजेत्सरस्वतीमच्छां रुद्रं तादृशलक्षणम् ॥२७॥ वह्निकोणे यजेद्रत्नकुम्भं मणिकरंडकम् । कराभ्यां बिभ्रतों पीतां तुन्दिलं धनदायकम् ॥२८॥ आलिंग्य सव्यहस्तेन वामे तांबूलधारिणीम् । धनदांकसमारूढां महालक्ष्मीं प्रपूजयेत् ॥२९॥ पश्चिमे मदनं बाणपाशांकुशशरासनम् । धारयंतं जपारक्तं पूजयेद्रक्तभूषणम् ॥३०॥ सव्येन पतिमाश्लिष्य वामेनोत्पलधारिणीम् । पाणिना रमणांकस्थां रतिं सम्यक्समर्चयेत् ॥३१॥ ऐशान्ये पूजयेत्सम्यक् विघ्नराजं प्रियान्वितम् । सृणिपाशधरं कांतं वरांगासृक्कलांगुलिम् ॥३२॥ माध्वीपूर्णकपालाढ्यं विघ्नराजं दिगंबरम् । पुष्करे विगलद्रत्नस्फुरच्चषकधारिणम् ॥३३॥ सिंदूरसदृशाकारामुद्दाममदविभ्रमाम् । धूतरक्तोत्पलामन्यपाणिना तु ध्वजस्पृशाम् ॥३४॥ आश्लिष्टकांतामरुणां पुष्टिभर्तेद्दिगंबराम् । कर्णिकायां निधी पूज्यौ षट्कोणस्याथ पार्श्वयोः ॥३५॥ अंगानि केसरेष्वेताः पश्चात्पत्रेषु पूजयेत् । अनंगकुसुमा पश्चाद्द्वितीयानंगमेखला ॥३६॥ अनंगगमना तद्वदनंगमदनातुरा । भुवनपाला गगनवेगा षष्ठी चैव ततः परम् ॥३७॥

विलासिनी, दोग्ध्री, अघोरा और मंगला—ये नौ शक्तियां हैं। बीजमन्त्र से उन्हें आसन देकर उसी मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे । उसी प्रतिमा में अंगो सहित देवी का आवाहन कर पूजा करे ॥१९-२३॥ साधक उत्तर दिशा में मध्यप्राज्ञा आदि अंगदेवताओं का पूजन कर षट्कोण में मिथुन देवताओं की आराधना करे। ईशान कोण में दंड, कुंडिका, रुद्राक्ष, यज्ञोपवीत तथा अभयास्त्र धारण करनेवाली गायत्री तथा तत्स्वरूप ब्रह्मा की पूजा करके नैर्ऋत्य कोण में शंख, चक्र, गदा, पद्म और पीतवस्त्र धारण करनेवाली सावित्री तथा उसी रूप के विष्णु की पूजा करे । वायुकोण में रुद्राक्षमाला तथा अभयास्त्र धारण करने वाली शुक्लवर्णा सरस्वती एवम् तादृश रुद्र की पूजा कर अग्निकोण में रत्न के घड़े तथा मणि की डाली को हाथों में धारण करनेवाली, पीतवर्णा वाली, दाहिने हाथ से तुन्दिल (बड़े पेट वाले) पति कुबेर का आलिंगन करनेवाली, बायें हाथ में तांबूल धारण करने वाली और धनपति को गोद में बैठने वाली महालक्ष्मी का पूजन करे ॥२४-२९॥ पश्चिम दिशा में बाण, पाश, अंकुश तथा धनुष धारण करने वाले, जपापुष्प के समान रक्तवर्ण वाले और रक्त आभूषण पहनने वाले पति कामदेव की दाहिने हाथ से आलिंगन करने वाली, बायें हाथ में कमल धारण करनेवाली और कांत की गोदी में बैठनेवाली रति की सम्यक् प्रकार से अर्चना करे ॥३०-३१॥ ईशान कोण में अंकुश तथा पाश धारण करने वाले, कमनीय, हाथी के समान शिर वाले, मद्यपूर्ण कपाल धारण करनेवाले, दिगंबर तथा सूंड़ से उत्तम रत्नों के बने मद्यपान पात्र (प्याला) को उठाने वाले, गणेश और सिंदूर के सदृश आकृतिवाली, अत्यन्त मद से विह्वल, एक हाथ में लाल कमल तथा दूसरे हाथ में पताका धारण करनेवाली, प्रियतम का आलिंगन करनेवाली, लाल वर्णवाली एवम् दिगंबर पुष्टि की अर्चना करे। षटकोण की दोनों बगल में कर्णिका पर निधियों का और केसरीं पर अंगों का पूजन करे ॥३२-३५॥ पश्चात् पत्रों पर अनंगकुसुमा, अनंगमेखला, अनंगगमना, अनंगमदनातुरा, भुवनपाला, षष्ठी, शशिखा और गगनलेखा इन आठ शक्तियों की पूजा करें।