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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 792, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 792

चतुरशीतितमोऽध्यायः ७७३ बभूव लोकपालांस्तु जित्वा भुंक्ते जगत्त्रयम् । ततस्तत्पीडिता देवा वैकुंठं शरणं ययुः ॥५३॥ ततो देवी महालक्ष्मीश्चक्राद्यंगोत्थतेजसा । श्रीर्बभूव मुनिश्रेष्ठ मूर्ता व्याप्तजगत्त्रया ॥५४॥ स्वयं सा महिषादींस्तु निहत्य जगदीश्वरी । अरविंदवनं प्राप्ता भजतामिष्टदायिनी ॥५५॥ तस्याः समर्धनं वक्ष्ये संक्षेपेण शृणु द्विज । मृत्युक्रोधेन गुरुणा बिंदुभूषितमस्तका ॥५६॥ बीजमन्त्रः श्रियः प्रोक्तो भजतामिष्टदायकः । ऋषिर्भृगुर्निवृच्छंदो देवता श्रीः समीरिंता ॥५७॥ षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । ततो ध्यायेज्जगद्देयां श्रियं संपत्तिदायिनीम् ॥५८॥ कांचनाभां गजैः श्वेतैश्चतुर्भिः स्वकरोद्धृतैः । हिरण्मया मृतघटैः सिच्यमानां सरोजगाम् ॥५९॥ वराभयाब्जस्रग्घस्तां क्षौमवस्त्रां किरीटिनीम् । सिद्धलक्षं जपेन्मन्त्रं तत्सहस्रं हुनेत्तथा ॥६०॥ सुगंधकुसुमैरिष्ट्वा कमलैर्मधुरप्लुतैः । महालक्ष्मुदिते पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् ॥६१॥ यजेत्पूर्व्वददंगानि दिग्दलेष्वर्चयेत्ततः । वासुदेवं संकर्षणं प्रद्युम्नमनिरुद्धकम् ॥६२॥ हिमपीततमालेंद्रनोलाभांन्पीतवाससः । शंखचक्रगदापद्मधारीन्रस्तांश्चतुर्भुजान् ॥६३॥ विदिगंतेषु पत्रेषु दभ्रकादीन्यजेद्गजान् । दमकं पुण्डरीकं च गुग्गुलं च कुरंटकम् ॥६४॥ यजेच्छंखनिधिं देव्यां दक्षिणे प्रमदान्वितम् । मुक्तामाणिक्यसंकाशौ किंचित्स्मितमुखांबुजौ ॥६५॥ अन्योन्यालिंगनपरी शंखापंकजधारिणौ । विगलद्रत्नवर्ष्याभ्यां शंखाभ्यां मूर्ध्नि लांछितौ ॥६६॥ तुंदिलं कंबुकनिधिं वसुधारां घनस्तनीम् । वामतः पंकजविधिं प्रियया सहितं यजेत् ॥६७॥ पीड़ित देवगण विष्णु को शरण में गये ॥४७-५३॥ मुनिश्रेष्ठ ! वहां सब देवताओं के तेज से सांगोपांग महालक्ष्मी का आविर्भाव हुआ, जिनके तेज से तीनों जगत् व्याप्त हो गये । वे जगदीश्वरी देवी स्वयं महिषासुर आदि को निहत कर कमलवन में चली गईं । वे भक्तों की कामना पूरी करती हैं। मैं संक्षेप से उनका पूजन बतला देता हूँ, सुनो ! मृत्यु, क्रोध, गुरु एवम् बिंदु से भूषित मस्तक वाला अक्षर महालक्ष्मी का बीजमन्त्र है, जो साधकों के लिये इष्टदायक है। इस मन्त्र के ऋषि भृगु हैं, छंद निवृत् है और देवता श्री हैं ॥५४-५७॥ छह दीर्घ अक्षरों से युक्त बीजमन्त्र से क्रमशः षडंगन्यास करे । तदनन्तर विश्वविख्यात एवम् संपत्तिदायिनी लक्ष्मी का ध्यान करे । 'लक्ष्मी कमलों पर बैठी हैं, उनके हाथों में अभयास्त्र तथा पद्ममाला है, रेशमी वस्त्र पहने हुई हैं, मुकुट सुशोभित हो रहा है और सुवर्ण के समान कान्तिवाले चार श्वेत गज स्वर्णमय अमृतघटों को अपनी सूड़ों से उठाकर उनके ऊपर अमृत वर्षण कर रहे हैं।' तत्पश्चात् आठ लाख मन्त्र का जप करके उतने हजार सुगंधित पुष्पों तथा मधुरमिश्रित कमलों से होम करे । फिर महालक्ष्मी के नाम से प्रसिद्ध पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना करके पहिले की तरह अंगों का पूजन करे ॥५८-६२॥ चारों दिशाओं में हिम, पीत, तमाल, इन्द्र और नील वर्ण वाले, पीताम्बर, शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी तथा चतुर्भुज वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न एवम् अनिरुद्ध की पूजा करे । दिशाओं के कोनों में दमक, पुण्डरीक, गुग्गुल तथा कुरंट नामक गजों की अर्चना करे । देवी के दक्षिण भाग में पत्नी सहित शंखनिधि की आराधना करे । उन दोनों का वर्ण मुक्ता और मणि के समान है, मुखारविन्द किंचित हास्य से युक्त है, दोनों परस्परालिंगन में आसक्त हैं, शंख और कमल धारण किये हुए हैं, दोनों के मस्तक पर उत्तम रत्नों की वर्षा करने वाले शंखों का चिह्न विराजमान है। शंख निधि तुन्दिल हैं। और उनकी पत्नी (वसुधारा) पीनस्तनी है। देवी के वाम भाग में प्रिया सहित पंकजविधि की अर्चना करे