बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 793, कुल 1008 में से
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७७४ नारदीयपुराणम् सिन्दूराभौ भुजश्लिष्टौ रक्तपद्मोत्पलान्वितौ । निःसरद्रत्नवर्षाभ्यां पद्माभ्यां मूर्ध्नि लांछितौ ॥६८॥ तुन्दिलं पंकजविधिं तत्त्वां वसुमतीमपि । दलाग्रेषु यजेदेता बलाकाद्याः समंततः ॥६९॥ बलाकी विमला चैव कमला वनमालिका । विभीषिका मालिका च शांकरी वसुमालिका ॥७०॥ पंकजद्वयधारिण्यो मुक्ताहारसमप्रभाः । लोकेशान्पूजयेदंते वज्राद्यस्त्राणि तद्बहिः ॥७१॥ इत्थं यो भजते देवी' विधिना साधकोत्तमः । धनधान्यसमृद्धः स्याच्छ्रियमाप्नोत्यनिंदिताम् ॥७२॥ वक्षःप्रमाणसलिले स्थित्वा मन्त्रमिमं जपेत् । त्रिलक्षमर्कगं ध्यायन्स भवेत्कमलालयः ॥७३॥ विष्णोगेहस्यबिल्वस्य मूले लक्षत्रयं जपेत् । साधको यः स लभते वांछितं धनसंचयम् ॥७४॥ अशोकवह्रावाज्याक्तैस्तंडुलैर्वशयेज्जगत् । होमेन खादिरे वह्नौ तंडुलैर्मधुरोक्षितैः ॥७५॥ राजा वश्यो भवेच्छीघ्रं महालक्ष्मीश्च वर्द्धते । बिल्वच्छायामधिंवसन्बिल्वमिश्रहविष्यभुक् ॥७६॥ संवत्सरत्रयं हुत्वा तत्फलैरथवांबुजैः । साधकेंदो महालक्ष्मीं चक्षुषा पश्यति ध्रुवम् ॥७७॥ अथ कल्पांतरे ब्रह्म देवराजविलुंपकौ । जातौ शुंभनिशुंभौ द्वावसुरौ लोककंटकौ ॥७८॥ ततो भ्रष्टाधिकारैस्तु शक्राद्यैः संस्तुता भुने । महासरस्वती देवी तदा चावततार ह ॥७९॥ हिमालये महापुण्ये शैलोद्देशेऽतिशोभने । ततः शुंभादिकान्हत्वा दैवतैः परिपूजिता ॥८०॥ वरं दत्त्वाविशद्देवी मानसं नाम वै सरः । तस्या मंत्रं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो मुने ॥८१॥ ज्ञानामृता शशधरा क्रांतमालोपशोभिता । वाग्बीजं तेन चांगानि कल्पयेत्साधकोत्तमः ॥८२॥
॥६३-६७॥ उनकी आभा सिंदूर के समान हैं, दोनों परस्पर बाँहें मिलाये हुए हैं, हाथों में रक्तकमल शोभाय- मान हैं, मस्तक पर रत्न-वर्षण करने वाले पद्मों का लांछन है, पंकजनिधि तुन्दिल हैं और उनकी पत्नी धनवती है। पत्रों के ऊपर शंखनिधि आदि देवों की चारों ओर दो-दो कमल धारण करनेवाली तथा मुक्ताहार के समान प्रभा वाली, बलाकी, विमला, कमला, वनमालिका, विभीषिका, मालिका, शांकरी, तथा वसुमालिका की पूजा करनी चाहिये। अन्त में लोकपाल तथा उनके वज्र आदि अस्त्रों का पूजन करे। जो साधक श्रेष्ठ इस प्रकार विधि से देवी की आराधना करता है, वह धन-धान्य से परिपूर्ण होता है तथा अनिन्द्य लक्ष्मी को प्राप्त करता है। ॥६८-७३॥ छाती भर जल में स्थित होकर जो सूर्य का ध्यान करते हुए तीन लाख मन्त्र का जप करता है, वह महालक्ष्मीवान् होता है। जो साधक विष्णुमन्दिरस्थ बिल्ववृक्ष के मूल में तीन लाख मन्त्र का जप करता है, वह वांछित धन को प्राप्त करता है। अशोक की समिधा से प्रज्वलित की गई अग्नि में जो घृतमिश्रित चावल से होम करता है वह जगत् को वश में करता है, जो खैर के अग्नि में मधुरमिश्रित चावल से होम करता है वह राजा को शीघ्र वशीभूत कर लेता है और उसे अत्यन्त श्री की प्राप्ति होती है। जो साधक बिल्ववृक्ष की छाया में तीन वर्षों तक वास करता है तथा बिल्वमिश्रित हविष्य भक्षण करते हुए बिल्वफलों से या कमलों से हवन करता है, वह निश्चय ही महालक्ष्मी को आँखों से देखता है ॥७४-७७॥ ब्रह्मन् ! कल्पान्तर में इन्द्र के लूटनेवाले शुम्भ और निशुम्भ नामक दो जनतापकारक असुर हुए। मुने ! उसके द्वारा अपने-अपने अधिकार से वंचित किये गये शक्र आदि देवों ने महासरस्वती की स्तुति की। प्रसन्न होकर देवी ने हिमालय के महापवित्र तथा अति रमणीय शिखर पर अवतार ग्रहण किया। देवताओं ने उनकी अर्चना की। उन्होंने शुम्भ आदि को निहत कर देवों को वरदान देकर मानस सरोवर में प्रवेश किया। मुने ! मैं उनका मंत्र बता रहा हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। "ज्ञानामृता' ..... 'वाग्" यह बीज मंत्र है,