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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 794

चतुरशीतितमोऽध्यायः ७७५ ऋषिः सदाशिवश्चास्य छंदोऽनुष्टुबुदाहृतम् । देवता वाक्समाख्याता भजतामिष्टदायिनी ॥८३॥ श्वेतांबरां विसश्वेतां वीणापुस्तकधारिणीम् । दिव्यैराभरणैर्युक्तां ध्यायेद्देवीं निरंतरम् ॥८४॥ महासरस्वतीपीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । देवीं संपुजयेत्तस्यामंगाद्यावरणैः सह ॥८५॥ आदावंगावृतिः पश्चादंबिकाद्यास्तमेरिताः । द्वितीया मातृभिः प्रोक्ता तृतीयाप्यष्टशक्तिभिः ॥८६॥ चतुर्थी पंचमी प्रोक्ता द्वात्रिंशच्छक्तिभिः पुनः । चतुःषष्ट्या स्मृता षष्ठी शक्तिभिर्लोकनायकैः ॥८७॥ सप्तमी पुनरेतेषामस्त्रैः स्यादष्टमावृतिः । एवं पूज्या जगद्धात्री श्रीमती वाग्भवाभिधा ॥८८॥ स्थानेषु पूर्वमुक्तेषु यजेदंगानि साधकः । अम्बिका वाग्भवा दुर्गा श्रीशक्तिश्चोक्तलक्षणा ॥८६॥ ब्रह्माद्याश्च ततः पूज्याः कराली विकराल्युमा । सरस्वती श्रीदुर्गा च लक्ष्मीश्चैव धृतिः स्मृतिः ॥६०॥ श्रद्धा मेधा रतिः कांतिरार्या षोडश शक्तयः । खड्गखेटकधारिण्यः श्यामाः पूज्याः स्वलंकृताः ॥६१॥ विषघ्नी पुष्टयः प्रज्ञा सिनीवाली कुहूः पुनः । रुद्रवीर्या प्रभा नंदा पोषणा बुद्धिदा शुभा ॥६२॥ कालरात्रिमंहारात्रिर्भद्रकाली कपर्दिनी । विकृतिर्दंडिमुण्डिन्यौ संडुखंडा शिखण्डिनी ॥६३॥ निशुम्भशुम्भमथनी चण्डमुण्डविनाशिनी । इन्द्राणी चैव रुद्राणी शंकराद्र्धशरीरिणी ॥६४॥ नारी नारायणी चैव त्रिशूलिन्यपि पालिनी । अम्बिका ह्लादिनी चैव द्वात्रिंशच्छक्तयः सितः ॥६५॥ चक्रहस्ताः पिशाचास्याः संपूज्याश्चारूभूषणाः । पिंगलाक्षी विशालाक्षी समृद्धिर्बुद्धिरैव च ॥६६॥ श्रद्धा स्वाहा स्वधा भिक्षा माया संज्ञा वसुंधरा । त्रिलोकधात्री गायत्री सावित्री त्रिदेशेश्वरी ॥६७॥ सरूपा बहुरूपा च स्कंदमाता श्रुतप्रिया । विमला कमला पश्चादरुणी पुनरारुणी ॥६८॥ प्रकृतिर्विकृतिः सृष्टिः स्थितिः संहृतिरेव च । सन्ध्या माता सती हंसी मर्डिका वज्रिका परा ॥६६॥

उत्तम साधक इसी से अंगों की कल्पना करे ॥७८-८२॥ मन्त्र के ऋषि सदाशिव हैं, छंद अनुष्टुप् है और देवता वाक् हैं, जो भक्तों की कामना पूर्ण करती हैं, साधक श्वेतवस्त्रा, विश्व में सब से शुक्ला, वीणापुस्तकधारिणी और दिव्य आभूषणों से अलंकृता देवो का निरंतर ध्यान करे । महासरस्वती पीठ पर मूलमंत्र से मूर्ति की कल्पना करके उसमें अंग आदि आवरणों के साथ देवी की अर्चना करे । पहिले अंगावृति पश्चात् अंबिका आदि का पूजन करे । फिर मातृवृन्द आठ शक्तियाँ सोलह शक्तियाँ बत्तीस शक्तियाँ, चौंसठ शक्तियाँ, लोकपाल तथा उनके अस्त्र-इन सबकी पूजा करे । इस प्रकार वाग्भवा श्रीमती जगद्धात्री की आराधना करनी चाहिये ॥८३-८८॥ साधक पूर्वोक्त स्थानों में अंगों की अर्चना करने के उपरान्त ब्राह्मी आदि का पूजन कर अम्बिका, वाग्भवी, दुर्गा, उक्तलक्षणा श्रीशक्ति, कराली, विकराली उमा, सरस्वती, श्रीदुर्गा, लक्ष्मी, धृति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, रति, कांति तथा आर्या-इन सोलह शक्तियों की पूजा करे। फिर खड्ग तथा खेटक (अस्त्र विशेष) धारण करने वाली सुमंडित श्यामाओं की अर्चना करे । विषघ्नी, पुष्टि, प्रज्ञा, शिनीवाली, कुहू, रुद्रवीर्या, प्रभा, नंदा, पोषणा, बुद्धिदा, शुभा कालरात्रि, महारात्रि, भद्रकाली, कपर्दिनी, विकृति, दंडिनी, मुंडिनी, संडुखंडा, शिखंडिनी, निशुंभमथनी, चंडमुंडविनाशिनी, इन्द्राणी, रुद्राणी, शंकराघंशरीरिणी, नारी, नारायणी, त्रिशूलिनी, पालिनी, अम्बिका, ह्लादिनी तथा सिता-ये बत्तीस शक्तियाँ हैं । ॥८९-९५॥ चक्रहस्ता, पिशाचास्या चारूभूषणा, पिंगलाक्षी, विशालाक्षी, समृद्धि, बुद्धि, श्रद्धा, स्वहा, स्वधा, भिक्षा, माया, संज्ञा, वसुंधरा, त्रिलोकधात्री, भयत्री, सावित्री त्रिदेशेश्वरी, सरूपा, बहुरूपा, स्कंदमाता, श्रुतप्रिया, विमला, कमला, आरूणी, प्रकृति, विकृति, सृष्टि, स्थिति, संहृति, संध्या माता, सती हंसी, मर्दिका, वज्रिका, देवमाता, भगवती, देवकी, कमलासना, त्रिमुखो, सप्तवदना, सुरासुर-