बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७७५ नारदीयपुराणम् देवमाता भगवती देवकी कमलासना । त्रिमुखीं सप्तवदना सुरासुरविमर्दिनी ॥१००॥ लंबोष्ठी चोर्ध्वकेशी च बहुशिश्ना वृकोदरी । रथरेखाह्वया पश्चाच्छशिरेखा तथापरा ॥१०१॥ गगनवेगा पवनवेगा वेगा च तदनंतरम् । ततो भुवनपालाख्या ततः स्यान्मदनातुरा ॥१०२॥ अनंगानंगवदना तथैवानंगमेखला । अनंगकुसुमा विश्वरूपा सुरभयंकरी ॥१०३॥ अक्षोभ्या सप्तवाहिन्या वज्ररूपा शुचिव्रता । वरदाऽथाय वागीशी चतुःषष्टिसमीरिताः ॥१०४॥ चापबाणधराः सर्वा ज्वालाजिह्वा महाप्रभाः । दंष्ट्रिण्यश्चोर्ध्वकेश्यस्ता युद्धोत्कांतमानसाः ॥१०५॥ सर्वाभरणसंदीप्ता पूजनीयाः प्रयत्नतः । लोकपाः पूर्ववत्पूज्यास्तद्ध्वजादिकास्त्वपि ॥१०६॥ जपेत्षोडशलक्षं च तद्दशांशं हुनेत्सुधीः । आज्येन खादिरे वह्नौ ततः सिद्धो भवेन्मनुः ॥१०७॥ कमलैरयुतं हुत्वा राजानं वशमानयेत् । उत्पलैर्जुह्वतो नूनं महालक्ष्मीः प्रजायते ॥१०८॥ पलाशकुसुमैर्हुत्वा वत्सरेण कविर्भवेत् । राजीलवणहोमेन वनितां वशमानयेत् ॥१०६॥ भूमौ भोगांस्तु भुक्त्वाते विष्णुलोकमवाप्नुयात् । वाणीबीजजपाद्यत्तो नात्र कार्या विचारणा ॥११०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे देवीमंत्रनिरूपणं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥८४॥
बिमर्दिनी, लंबोष्ठी, ऊर्ध्वकेशी, बहुशिश्ना, वृकोदरी, रथरेखा, शशिरंखा, गगनवेगा, पवनवेगा, वेगा, भुवनपाला, मदनातुरा, अनंगा, अनंगवदना, अनंगमेखला, अनंगकुसुमा, विश्वरूपा, सुरभयंकरी, अक्षोभ्या, सप्तवाहिनी, वज्ररूपा, शुचिव्रता, वरदा और वागीशी-ये चौंसठ शक्तियाँ हैं ॥६६-१०४॥ ये सब धनुष एवम् बाण धारण करने वाली, जाज्वल्यमान जिह्वा वाली, महाकान्ति वाली, दंष्ट्रिणी, ऊर्ध्वकेशी, युद्धाभिलाषिणी तथा सब प्रकार के आभूषणों से भूषिता हैं। इनकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। पहिले की तरह लोकपाल तथा उनके वज्र आदि का भी पूजन करे। विद्वान् व्यक्ति सोलह लाख मंत्र का जप करके उसका दशांश खैर के अग्नि में घी से हवन करे ! इससे मंत्र की सिद्धि होती है। कमलों से दश हजार हवन करने से राजा वश में आते हैं। रक्तकमलों से हवन करने वाला व्यक्ति महालक्ष्मी को प्राप्त करता है। एक वर्ष तक पलाश पुष्प से होम करने वाला कवि होता है। राई और नमक से हवन करने वाला व्यक्ति वनिता को वशीभूत करता है। सरस्वती के बीज मंत्र का जप करने वाला पृथ्वी पर भोगों को भोगकर अन्त में विष्णुलोक को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं ॥१०५-११०॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में देवीमन्त्रनिरूपण नामक चौरासीवां अध्याय समाप्त ॥८४॥