बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 798, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें७७६ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः यो हविष्याशनरतो दिवा देवीं स्मरन् जपेत् । नक्तं निधुवनासक्तो लक्षं स स्याद्धरापतिः ॥२६॥ रक्तांभोजैर्हुनेन्मन्त्री धनैर्जयति वित्तपम् । बिल्वपत्रैर्भवेद्राज्यं रक्तपुष्पैर्वशीकृतिः ॥३०॥ असृजा महिषादीनां कालिकां यस्तु तर्पयेत् । तस्य स्युरचिरादेव करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥३१॥ यो लक्षं प्रजपेन्मन्त्रं शवमारुह्य मन्त्रवित् । तस्य सिद्धो मनुः सद्यः सर्वेप्सितफलप्रदः ॥३२॥ तेनाश्वमेधप्रमुखैर्यागैरिष्टं सुजन्मना । दत्तं दानं तपस्तप्तं उपास्ते यस्तु कालिकाम् ॥३३॥ ब्रह्मा विष्णुः शिवो गौरी लक्ष्मीर्गणपती रविः । पूजिताः सकला देवा यः कालीं पूजयेत्सदा ॥३४॥ अथापरः सरस्वत्या ह्यवतारो निगद्यते । यां निषेव्य नरा लोके कृतार्थाः स्युर्न संशयः ॥३५॥ आप्यायिनी चन्द्रयुक्ता माया च वदनांतरे । सकामिका क्रुधा शांतिश्चन्द्रांलंकृतमस्तका ॥३६॥ दीपिका सासना चन्द्रयुगस्त्रं मनुरीरितः । मुनिरक्षोभ्य उद्दिष्टश्छन्दस्तु बृहती मतम् ॥३७॥ ताराख्या देवता बीजं द्वितीयञ्च चतुर्थकम् । शक्तिः षड्दीर्घयुक्तेन द्वितीयेनांगकल्पनम् ॥३८॥ षोढा न्यासं ततः कुर्यात्तारायाः सर्वसिद्धिदम् । श्रीकण्ठादोन्यसेद्रुद्रान्मातृकावर्णपूर्वकान् ॥३६॥ मातृकोक्तस्थले माया तृतीयक्रोधपूर्वकान् । चतुर्थीनमसायुक्तान्प्रथमो न्यास ईरितः ॥४०॥ शवपीठसमासीनां नीलकांतिं त्रिलोचनाम् । अर्द्धन्दुशेखरां नानाभूषणाढयां स्मरन्न्यसेत् ॥४१॥ द्वितीये तु ग्रहन्यासं कुर्यात्तां समनुस्मरन् । त्रिबीजस्वरपूर्वं तु रवत्सूर्य हृदि न्यसेत् ॥४२॥ को प्राप्त कर चिरकाल तक सुखोपभोग करता है। जो हविष्यभोजी होकर दिन में देवी का स्मरण करते हुए एक लाख मन्त्र का जप करता है और रात्रि में रतिक्रीड़ा में आसक्त रहता है, वह महीपति होता है। रक्त- कमल से हवन करनेवाला साधक धन में कुबेर को जीत लेता है। बिल्वपत्रों से हवन करने वालों को राज्य की प्राप्ति होती है। रक्तपुष्पों से होम करनेवाला वशीकरणसिद्धि को प्राप्त करता है ॥२७-३०॥ जो व्यक्ति महिष आदि के शोणित से कालिका को तृप्त करता है उसे सकल सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। जो मन्त्रवेत्ता शव पर आरूढ़ होकर लाख बार मन्त्र का जप करता है, वह तुरन्त अभीष्ट फलदायक मन्त्र को सिद्ध कर लेता है। जो सुजन्मा व्यक्ति कालिका की उपासना करता है, वह मानो अश्वमेध आदि यज्ञ, दान तथा तप करता है। जो सदा काली का पूजन करता हो, वह मानो ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी, लक्ष्मी, गणेश तथा सूर्य आदि सकल देवों की पूजा करता है ॥३१-३४॥ इसके उपरान्त मैं सरस्वती के दूसरे अवतार का वर्णन करता हूँ, जिनकी आराधना करके मनुष्य कृतार्थ हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। आप्यायिनी, चन्द्रयुक्ता, वदनान्तरवर्तिनी, माया, सकामिका, क्रुधा, शान्ति, चन्द्रमा से अलंकृत मस्तकवाली, दीपिका, सासना, और चन्द्रयुक्त अस्त्र (खड्ग) - यह उनका मन्त्र है। इस मन्त्र के ऋषि अक्षोभ्य हैं, छंद बृहती है और देवता तारा हैं। द्वितीय अक्षर बीज है और चतुर्थ अक्षर शक्ति है। छः दीर्घों से युक्त द्वितीय अक्षर से अंगों को कल्पना करे। तत्पश्चात् अखिल सिद्धिदायक तारा के षडंगन्यास करे। मातृका वर्ण पुरस्सर श्रीकंठ आदि रुद्रों का न्यास करके मातृकोक्त स्थल में तृतीय क्रोधपूर्वक माया का न्यास करे। तदनन्तर शव के पीठ पर आसीन नीलकांति, त्रिलोचना, विविध आभूषणों से भूषिता तथा ललाट पर अर्धचन्द्र को धारण करनेवाली देवी का ध्यान करके न्यास करना चाहिये, इसे प्रथम न्यास कहते हैं, पुनः उन्हीं का स्मरण करते हुए ग्रहों का न्यास करे। इसे द्वितीय न्यास कहते हैं॥३५-४१॥ तीन बीजस्वर के साथ रक्त सूर्यं का हृदय में न्यास करे। पवर्ग पूर्वक शुक्ल चन्द्र का दोनों भौंहों पर न्यास करे। कवर्ग पूर्वक रक्त मंगल का