बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८० नारदीयपुराणम्
तथा षवर्गपूर्वं तु शुक्लं सोमं भ्रुवोर्द्वये । कवर्गपूर्वं रक्ताभं मंगलं लोचनत्रयम् ॥४३॥ चवर्गाद्यं बुधं श्यामं न्यसेद्वक्षःस्थले बुधः । तवर्गाद्यं पीतवर्णं कण्ठकूपे बृहस्पतिम् ॥४४॥ तवर्गाद्यं श्वेतवर्णं घटिकायां तु भार्गवम् । नीलवर्णं पवर्गार्थं नाभिदेशे शनैश्चरम् ॥४५॥ शवर्गार्थं धूम्रवर्णं ध्यात्वा राहुं मुखे न्यसेत् । त्रिबीजपूर्वकश्चैवं ग्रह्न्यासः समीरितः ॥४६॥ तृतीयं लोकपालानां न्यासं कुर्यात्प्रयत्नतः । मायादिवीजत्रितयं पूर्वकं सर्वसिद्धये ॥४७॥ स्वमस्तके ललाटादि विश्वत्रष्टस्वधउर्ध्वतः । ह्रस्वदीर्घकादिकाष्टवर्गपूर्वान्दिशाधिपान् ॥४८॥ शिवशक्त्यभिधे न्यासं चतुर्थे तु समाचरेत् । त्रिबीजपूर्वकान्न्यस्येत्षट् शिवाञ्छक्तिसंयुतान् ॥४९॥ आधारादिषु चक्रेषु स्वचक्रवर्णपूर्वकम् । ब्रह्माणं डाकिनोयुक्तं वादिसान्तांर्णपूर्वकम् ॥५०॥ मूलाधारे विन्यसेच्च चतुर्दलसमन्वितम् । श्रीविष्णुं राकिणीयुक्तत्वादिलांतार्णपूर्वकम् ॥५१॥ स्वाधिष्ठानाभिधे चक्रे लिंगस्थे षड्दले न्यसेत् । रुद्रं तु डाकिनीयुक्तं दादिकांतांणपूर्वकम् ॥५२॥ चक्रे दशदले न्यस्येन्नाभिस्थे मणिपूरके । ईश्वरं कादिठान्तार्णपूर्वकं शाकिनीयुतम् ॥५३॥ विन्यसेद्द्वादशदले हृदयस्थे त्वनाहते । सदाशिवं शाकिनीं च षोडशस्वरपूर्वकम् ॥५४॥ कण्ठस्थे षोडशदले विशुद्धाख्ये प्रविन्धसेत् । आज्ञाचक्रे परशिवं हाकिनीसंयुतं न्यसेत् ॥५५॥ लक्षार्णपूर्वं भ्रू मध्यसंस्थितेऽतिमनोहरे । तारादिपंचमं न्यासं कुर्यात्सर्वेष्टसिद्धये ॥५६॥ अष्टौ वर्गान्स्वरद्वंद्वपूर्वकान् बीजसंयुतान् । ताराद्या न्यासपूर्वाश्च प्रयोज्या अष्टशक्तयः ॥५७॥ तारायोग्रा महोग्रापि वञ्चा काली सरस्वती । कामश्वेरी च चामुंडा इत्यष्टौ तारिकाः स्मृताः ॥५८॥
नेत्रों पर न्यास करे । विद्वान् साधक चवर्गाद्य श्याम बुध का वक्षःस्थल पर न्यास करे । पीतवर्ण वाले दवर्गाद्य बृहस्पति का कंठकूप में न्यास करे ॥४२-४४॥ श्वेतवर्ण वाले तवर्गाद्य शुक्र का घटिका (नितम्ब) पर न्यास करे । नीलवर्ण वाले पवद्यि शनैश्चर का नाभि देश में न्यास करे । धूम्रवर्ण वाले शवर्गार्थ राहु का मुख में न्यास करे । ग्रहों का त्रिबीज पूर्वक न्यास इसी तरह कहा गया है ॥४५-४६॥ अब तीसरा न्यास लोकपालों का कहा गया है, जिसे यत्न पूर्वक करना चाहिये । मायादि तीन बीजों के साथ इसे करने से सब प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं । अपने मस्तक और ललाट पर, आठों दिशाओं में नीचे एवम् ऊपर ह्रस्व दीर्घ आदि अष्ट वर्ग पूर्वक दिक्पालों का न्यास करना चाहिये ॥४७-४८॥ चौथा न्यास शिवशक्ति नामक है । शक्तियुक्त छः रुद्रों का त्रिबीज पूर्वक न्यास करना चाहिये । आधार आदि चक्रों में अपने चक्र के वर्णों के साथ इनका न्यास करे । तवर्ण पूर्वक डाकिनीयुक्त ब्रह्मा का न्यास करके मूलाधार में चतुर्दल समन्वित श्री विष्णु का न्यास करना चाहिये, जो राकिणी से और पवर्ग के अन्तिम वर्ण से युक्त हों स्वाधिष्ठान संज्ञक लिंगस्थ षड्दल चक्र में डाकिनीयुक्त रुद्र का 'ड' आदि 'फ' अन्तवर्णपूर्वक न्यास करना चाहिये मणिपूर नामक नाभिस्थ दशदल चक्र में लाकिनीयुक्त ईश्वर का 'क' आदि 'ठ' अन्तवर्ग पूर्वक न्यास करना चाहिये ॥४९-५३॥ अनाहत संज्ञक हृदयस्थ द्वादशदल चक्र में शाकिनी युक्त सदाशिव का सोलहस्वर पूर्वक न्यास करना चाहिये । विशुद्ध नामक कंठस्थित षोडशदलात्मक आज्ञाचक्र में हाकिनीयुक्त परशिव का न्यास करना चाहिये । सकल इष्ट सिद्धि के लिये अत्यन्त मनोहर भ्रूमध्य में लक्षवर्ण पूर्वक तारादि पंचम न्यास करना चाहिये । स्वर एवम् बिन्दु पूर्वक बीज संयुक्त अष्ट वर्गों का न्यास करके तारिका आदि आठ शक्तियों का न्यास करे । तारा, उग्रा, महोग्रा, वज्रा, काली, सरस्वती, कामेश्वरी और चामुंडा ये आठ तारिकायें कहलाती हैं । ब्रह्मरन्ध्र, ललाट, भ्रूमध्य, कंठदेश, हृदय, नाभि तथा मूलाधार में क्रमशः इनका न्यास करे । तदनन्तर सकल सिद्धि-