बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 800, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशीतितमोऽध्यायः ७८१ ब्रह्मरन्ध्रे ललाटे च भ्रूमध्ये कण्ठदेशतः । हृदि नाभौ फले मूलाधारे चेताः क्रमान्न्यसेत् ॥५९॥ अङ्गन्यासं ततः कुर्यात्पीठाख्यं सर्वसिद्धिदम् । आधारे कामरूपाख्यं बीजं ह्रस्वार्णपूर्वकम् ॥६०॥ हृदि जालन्धरं बीजं दीर्घपूर्वं प्रविन्यसेत् । ललाटे पूर्णगिर्याख्यं कवर्गार्चं न्यसेत्सुधीः ॥६१॥ उड्डीयानं चवर्गाय केशसन्धौ प्रविन्यसेत् । कण्ठे तु मथुरापीठं दशमं यादिकं न्यसेत् ॥६२॥ षोढा न्यासस्तु तारायाः प्रोक्तोऽभीष्टप्रदायकः । हृदि श्रीमदेकजटां तारिणीं शिरसि न्यसेत् ॥६३॥ वज्रोदके शिखां पातु उग्रतारां तु चर्मणि । महोग्रा वत्सरे नेत्रे पिंगाग्रैकजटास्त्रके ॥६४॥ षड्दीर्घयुक्तमायाया एतान्यष्टौ षडंगके । अंगुष्ठादिवंगुलीषु एवं विन्यस्य यत्नतः ॥६५॥ तर्जनीमध्यमाभ्यां तु कृत्वा तालत्रयं ततः । छोटिकामुद्रया कुर्याद्दिग्बन्धं देवतां स्मरन् ॥६६॥ विद्यया तारपुटया व्यापकं सप्तधा चरेत् । उग्रतारां ततो ध्यायेत्सद्यो वावेऽतिसिद्धिदाम् ॥६७॥ लयान्धावंबुजन्मस्थां नीलाभां दिव्यभूषणाम् । कम्बुं खड्गं कपालं च नीलाब्जं दधतीं करैः ॥६८॥ नागश्रेष्ठालंकृतांगीं रक्तनेत्रत्रयां स्मरेत् । जपेल्लक्षचतुष्कं हि दशांशं रक्तपद्मकैः ॥६९॥ हुनेत्क्षीराज्यसंमिश्रैः शंखं संस्थाप्य संजपेत् । नारीं पश्यन्स्पृशन्गच्छन्महानिशि बलिं चरेत् ॥७०॥ श्मशाने शून्यसदने देवागारेऽथ निर्जने । पर्वते वनमध्ये वा शवमारुह्य मंत्रवित् ॥७१॥ समरे शत्रुनिहतं यद्वा षाण्मासिकं शिशुम् । विद्यां साधयतः शीघ्रं साधितैवं प्रसिद्ध्यति ॥७२॥ मेघा प्रज्ञा प्रभा विद्या धीवृत्तिस्मृतिबुद्धयः । विश्वेश्वरीति संप्रोक्ताः पीठस्य नव शक्तयः ॥७३॥ भृगुमन्विन्दुसंयुक्तं मेघवर्त्म सरस्वती । योगपीठामने हार्दं पीठस्य मनुरीरितः ॥७४॥ दत्वानेनासनं मूत्ति मूलमंत्रेण कल्पयेत् । पूजयेद्विधिवद्देवींत द्विधानमयोच्यते ॥७५॥ दायक पीठ से एक अंग न्यास को करे । ॥५४-५६॥ आधार में ह्रस्ववर्ण पूर्वक कामरूप संज्ञक बीज का, हृदय में दीर्घ पूर्वक जालंधर नामक बीज का, ललाट पर कवर्ग पूर्वक पूर्णगिरि नामक बीज का, केश संधि में चवर्ग पूर्वक उड्डीयान नामक बीज का और कंठ में य' पूर्वक मथुरापीठ नामक दशम बीज का न्यास करे । कामना- दायक तारा के छः न्यास कहे जाते हैं । हृदय में श्रीमदेकजटा का, मस्तक पर तारिणी का, शिखा पर वज्रोदका का, त्वचा पर उग्र तारा का, छाती पर महोग्रा का और नेत्रों में पिंगाग्रैकजटा का न्यास करे । छः दीर्घों से युक्त माया का अंगुष्ठ आदि अंगुलियों में यत्नपूर्वक न्यास करके तर्जनी और मध्यमा से तीन बार ताली बजावे ॥६०-६५॥ फिर छोटिका मुद्रा से देवतास्मरण पूर्वक दिग्बन्ध करके तारामंत्र से संपुटित विद्या से सात बार सर्वांग सम्बन्धि न्यास करे । तदनन्तर सद्यः सिद्धि प्रदान करनेवाली, नीलवर्णवाली, दिव्य आभूषणवाली, हाथों में शंख, खड्ग, कपाल तथा नीलकमल धारण करनेवाली, उत्तम नाग से अलंकृत कार्यवाली और तीन लाल आँखों वाली उग्रतारा का ध्यान करके चार लाख मंत्र का जप करे और उसका दशांश दूध तथा घी मिलाये रक्त कमलों से हवन करे । फिर शंख की स्थापना कर के जप करे और महानिशा में नारी का दर्शन एवम् स्पर्श करते हुए बलि चढ़ावे ॥६६-७०॥ श्मशान, शून्य गृह, देवालय, निर्जनस्थान, पर्वत अथवा वनमध्य में शव के ऊपर आरूढ़ होकर मंत्रवेत्ता विद्या का साधन करे । शव छः महिने शिशु का हो या समर में शत्रुद्वारा निहत सैनिक का । ऐसा करने से विद्या शीघ्र सिद्ध हो जाती है । मेघा, प्रज्ञा, प्रभा, विद्या, धी, वृत्ति, स्मृति, बुद्धि तथा विश्वेश्वरी-ये नौ पीठ शक्तियाँ हैं ॥७१-७३॥ "भृगुमन् ....." यह मन्त्र है । इस मन्त्र से आसन देकर मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे । तद- नन्तर विधिपूर्वक देवी की आराधना करे । विधान इस प्रकार है-"तारो माया...... स्वाहा" यह बलिमंत्र है।