बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८२ नारदीयपुराणम् तारो माया भगं ब्रह्मा जटे सूर्यः सदीर्घकम् । यक्षाधिपतये तंद्री सोपनीतं बलिं ततः ॥७६॥ गृहयुग्मं शिवा स्वाहा बलिमंत्रोऽयमीरितः । दद्यान्नित्यं बलिं तेन मध्यरात्रे चतुष्पथे ॥७७॥ जलदानादिकं मंत्रैर्विदध्याद्दशभिस्ततः । ध्रुवो वज्रोदके वर्म फट्सप्तार्णो जलग्रहे ॥७८॥ ताराद्या वह्निजायांता माया हि क्षालने मता । तारो मायाः भृगुः कर्णी विशुद्धं धर्मवर्मतः ॥७९॥ सर्वपापानि शाम्यंते छेतो नेत्रयुतं जलम् । कल्पान्तनयनस्वाहा मंत्र आचमने मतः ॥८०॥ ध्रुवो मणिधरीत्यंते वज्रिण्यक्षियुता मृतिः । खरिविद्यायुग्ग्रिजश्च सर्ववांते बकोऽब्जवान् ॥८१॥ कारिण्यंते दीर्घवर्म अस्त्रं वह्निप्रियांतितः । त्रयोविंशतिवर्णात्मा शिखाया बंधने मनुः ॥८२॥ प्रणवो रक्षयुगलं दीर्घवर्मास्त्रठद्वयम् । नवार्णेनामुना मंत्रो कुर्याद्भूमिविशोधनम् ॥८३॥ नारांते सर्वविघ्नानुत्सारयेति पदं ततः । हुं फट् स्वाहा गुणैर्दर्भा मनुर्विघ्ननिवारणम् ॥८४॥ मायाबीजं जपापुष्पनिभं नाभौ विचिंतयेत् । तदुत्थेनाग्निना देहं दहेत्सार्द्धंस्वपाप्मना ॥८५॥ ताराबीजं सुवर्णाभं चिंतयेद्धृदि मंत्रवित् । पवनेन तदुत्थेन पापभस्म क्षिपेद्भुवि ॥८६॥ तुरीयं चन्द्रकुन्दाभं बीजं ध्यात्वा ललाटतः । तदुत्थसुधयादेहं स्वयं वै देवतानिशम् ॥८७॥ अनया भूतशुद्ध्या तु देवी सादृश्यमाप्नुयात् । तारोऽनंतो भृगुः कर्णी पद्मनाभयुतो बली ॥८८॥ खे वज्ररेखे क्रोधाख्यं बीजं पावकवल्लभा । अमुना द्वादशार्णेन रचयेन्मंडलं शुभम् ॥८९॥ तारो यथागता निद्रा सद्कूषेकभृगुविषम् । सदीर्घंस्मृतिरौ साक्षौ महाकालो भगान्वितः ॥९०॥ क्रोधोऽस्त्रं मनुवर्णोऽयं मनुः पुष्पाविशोधने । तारः पाशः परा स्वाहा पंचार्णश्चित्तशोधने ॥९१॥ मनवो दश संप्रोक्ता अर्घ्यस्थापनमुच्यते । सेंदुभ्यां मासतो माया भुवं संसृज्य भूगृहम् ॥९२॥ वृत्तं त्रिकोणसंयुक्तं कुर्यान्मंडलमंत्रतः । यजेत्तत्राधारशक्ति वह्निमंडलमध्यगाम् ॥ वह्निमंडलमभ्यर्च्य महाशंखं निधापयेत् ॥९३॥ वामकर्णेन्दुयुक्तेन फडंतेन विहायसा । प्रक्षालितं भृगुदंडी विमूर्तींडुयुतं पठेत् ॥९४॥
इससे मध्यरात्रि में चौराहे पर नित्य बलि अर्पण करे। तत्पश्चात् दश मन्त्रों से जलदान आदि करना चाहिये। "ध्रुवों......स्वाहा" इस मन्त्र से आचमन करना चाहिये। "ध्रुवो मणिधरी......त्रयोविंशतिवर्णात्मा इससे शिखा बांधे। "प्रणवो......द्वयम्" इससे भूमिशोधन करना चाहिये। नारांते......वर्णः" इसके जप से विघ्नों का निवारण होता है। साधक नाभि में जपापुष्प सदृश माया बीज का चिन्तन करे और कल्पना करे कि मायाबीज रूपी अग्नि से मेरा शरीर पापसहित जल गया। तदनन्तर हृदय में सुवर्णतुल्य प्रकाशमान तारा- बीज का ध्यान करके कल्पना करे कि ताराबीज रूपी वायु ने मेरे पापरूपी भस्म को उड़ा डाला। पुन: चन्द्र और कुन्द समान धवल तुरीय बीज का ध्यान करके भावना करे कि तुरीय बीजरूपी अमृत का पान कर मैं स्वयं देवतुल्य हो गया हूँ। इस प्रकार भूतशुद्धि करनेवाला साधक देवी के सादृश्य को प्राप्त करता है। "तारो ......पावकवल्लभा" इस मन्त्र से पवित्र मण्डल की रचना करे ॥७४-८९॥ "तारो यथागता...... मनुवर्णः" इससे पुष्पादि शोधन करे। "तारः पाशः परा स्वाहा" इससे चित्त शुद्धि करनी चाहिये। अर्घ्यदान में दश मन्त्र कहे गये हैं। "सेंदुभ्याम्......त्रिकोण संयुक्तम्" इससे मंडल का निर्माण कर उस पर वह्नि मण्डल के मध्य में जानेवाली आधारशक्ति की अर्चना करे। फिर अग्निमंडल का पूजन कर "वामकर्ण...... इंदुयुतम्" इस मन्त्र का पाठ करते हुए महाशंख की स्थापना करे। तत्पश्चात् वक्ष्यमाण चारों मन्त्रों का