बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 802, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशीतितमोऽध्यायः ७८३ ततोऽर्चयेन्महाशंखं जपन्मन्त्रचतुष्टयम्। दीर्घत्रयान्विता माया काली सृष्टिः सदीर्घसः ॥९५॥ प्रतिमासंयुतं मासं यवनं हृदयं ततः । एकादशार्णः प्रथमो महाशंखाचंने मनुः ॥९६॥ हंसो हरिमृजंगेशयुक्तो दीर्घत्रयेदुयुक् । तारिण्यंते कपाल पशो द्वादशाक्षरः ॥९७॥ स्वं दीर्घत्रयसम्बाढद्यमेषो वामदगन्वितः । लोकपालाय हृदयं तृतीयोऽयं शिवाक्षरः ॥९८॥ मायास्त्रीबोजमर्डेदुयुतं स्वं स्वर्गखादिमः । पालाय सर्वाधाराय सर्वः सर्वोद्भवस्तथा ॥९९॥ सर्वशुद्धिमयश्चेति डेंताः सर्वासुरांतिकम्। रुधिरा रतिदीर्घा च वायुः शुभ्रानिलःसुरा ॥१००॥ भाजनाय भगो सत्यो विकपालाय हृन्मनुः । तुर्यो रसेषु वर्णोऽयं महाशंखप्रपूजने ॥१०१॥ नवार्कमंडलं चेष्ट्वा सलिलं मूलमन्त्रतः । प्रपूरयेत्सुधाबुद्ध्या गंधपुष्पाक्षतादिभिः ॥१०२॥ मुद्रां त्रिखंडां संदर्य पूजयेच्चंद्रमंडलम् । वाक्सत्यपद्मागगने रेफानुग्रहबिंदुयुक् ॥१०३॥ मूलमंत्रो विपद्धंसमनुसर्गसमन्वितम् । अष्टकृत्वोऽमुना मंत्री मंत्रयेत्प्रयतो जलम् ॥१०४॥ मायया संदिशं क्षिप्त्वा खं योनिं च प्रदर्शयेत् । तत्र वृत्ताष्टषट्कोणं ध्यात्वा देवीं विचिंतयेत् ॥१०५॥ पूर्वोक्तां पूजयेत्त्वेलां मूलेनाथ प्रतर्पयेत् । तर्जनीमध्यमानामाकनिष्ठामिर्महेश्वरीम् ॥१०६॥ सांगुष्ठानिश्चतुर्वारं महाशंखस्थिते जले । खरेंफमनुबिंद्वाढ्यं भृगुर्मन्विदुयुतया ॥१०७॥ धूवाद्येन नमोतेन तर्पदानंद भैरवम् । ततस्तेनार्धतोयेन प्रोक्षेत्पूजनसाधनम् ॥१०८॥ योनिमुद्रां प्रदर्श्यापि प्रणमेद्भवतारिणीम् । विधानमर्घ संप्रोक्तं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥१०६॥ पूर्वोक्ते पूजयेत्पीठे पद्मे षट्कोणकणिके । धरागुहावृते रम्ये देवीं रम्योपचारकैः ॥११०॥ महीगृहे चतुर्विश्व गणेशदीन्प्रपूजयेत् । पाशांकुशौ कपालं च त्रिशूलं दधतं करैः ॥१११॥ अलंकारचयोपेतं गणेशं प्राक्तमर्चयेत् । कपालशूले हस्ताभ्यां दधतं सर्पभूषणम् ॥११२॥
जप करते हुए महाशंख की आराधना करनी चाहिये ॥९०-९४३॥ "दीर्घत्रयान्विता ······हृदयं ततः” यह महाशंख पूजन का पहला मन्त्र है। "हंसो······अन्तः" यह दूसरा मन्त्र । "स्वम्······हृदयम्” यह तीसरा मन्त्र है। "माया······हृन्मनुः” यह चौथा मन्त्र है। इसके बाद नवीन सूर्यमंडल की अर्चना करके अमृतबुद्ध्या जल में मूलमन्त्र से गंध, पुष्प, अक्षत आदि डाले। त्रिखंडा मुद्रा को दिखा कर चंद्रमंडल की पूजा करे। साधक “वाक् ····अनुसर्ग समन्वितम्” इस मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित करके ऊपर को मार्जन करे। फिर माया तथा खयोनि मुद्रा को दिखाकर घिरे हुए अष्टकोण एवम् षट्कोण पीठ का ध्यान करे और वहां देवी की चिन्तना करके मूलमन्त्र से उनकी पूजा करे ॥९५-१०५३॥ तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अंगु- लियों द्वारा महाशंखस्थित जलसे महेश्वरी तर्पण करके “एवम् ···नमः” इस मन्त्र से आनन्द भैरव को तृप्त करे। तदनन्तर अर्घ जल से पूजन सामग्री को सिक्त करके योनिमुद्रा दिखावे ओर भवतारिणी को प्रणाम करे। अर्घसम्बन्धी विधान सर्व सिद्धिदायक है। भूमि-गृह से आवृत, रमणीय, षट्कोण तथा पद्म एवम् कणिका से युक्त पीठ पर मनोहर उपचारों से देवी की आराधना करनी चाहिये । महीगृह में चारों तरफ गणेश आदि का पूजन करे। हाथों में पाश, अंकुश, कपाल तथा त्रिशूल धारण करने वाले ओर समस्त अलंकारों से विभूषित गणेश की पूरव दिशा में पूजा करे ॥१०६-१११३॥ करों में कपाल तथा त्रिशूल धारण करने वाले, सर्प रूपी आभूषण से भूषित, अपने गण से वेष्टित ओर मनोरम बटुक की दक्षिण दिशा में पूजा करे। हाथों में खङ्ग, शूल, कपाल डमरू धारण करने वाले, कृष्णवर्ण, दिगंबर तथा क्रूर क्षेत्रपाल की पश्चिम दिशा में पूजा करे।